पीएम मोदी की 'संत मुद्रा' के मायने क्या हैं?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसद के दोनों सदनों में दिए गए बयान उपदेशात्मक और आदर्शों से ओत-प्रोत हैं, पर उनसे वास्तविक सवालों के जवाब नहीं मिलते.

लगता नहीं कि विपक्ष इन सवालों को आसानी से भूलकर सरकार को बचकर निकलने का मौका देगा.

राज्यसभा में सीपीएम नेता सीताराम येचुरी के एक नोटिस को सभापति ने विचार के लिए स्वीकार कर लिया है.

येचुरी ने असहिष्णुता व सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के मुद्दे पर एक पंक्ति का यह प्रस्ताव दिया है.

देखना होगा कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस प्रस्ताव को पास कराने में मदद करेंगे या नहीं. और यह भी कि इस प्रस्ताव का इस्तेमाल सरकार की निंदा के रूप में होगा या नहीं.

दोनों सदनों में प्रधानमंत्री के बयान सकारात्मक जरूर हैं, पर वे विपक्ष के भावी प्रहारों की पेशबंदी जैसे लगते हैं. प्रधानमंत्री की यह संत-मुद्रा बताती है कि वे राजनीतिक दबाव में हैं.

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मोदी जी ने किसी भी सवाल का सीधे जवाब नहीं दिया है. जबकि देश उम्मीद रखता है कि वे उन सारे सवालों के जवाब दें जो इस बीच उठाए गए हैं.

गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने सम्मान वापस करने वाले लेखकों और कलाकारों से मिलने की इच्छा व्यक्त की है. गृह मंत्री के बजाय प्रधानमंत्री को ऐसा कदम उठाना चाहिए था.

दादरी में मोहम्मद अख़लाक की हत्या से देश में दहशत का माहौल बना था. उसके बाद कुछ मंत्रियों और सांसदों के बयानों से माहौल और बिगड़ा.

प्रोफेसर कलबुर्गी की हत्या को लेकर लेखकों, कलाकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपना आक्रोश व्यक्त किया तो बजाय हमदर्दी जताने के उनकी आलोचना हुई.

इसके बाद सम्मान वापसी को देशद्रोह साबित करने की कोशिश की गई. बात-बात पर लोगों को पाकिस्तान जाने की सलाह दी गई. इन बातों को बेहतर तरीके से सुलझाया जा सकता था. ऐसा हुआ नहीं.

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शायद पार्टी के किसी कोने में ऐसा महसूस किया गया था कि बिहार चुनाव में यह सब उपयोगी होगा. लेकिन वास्तव में यह नासमझी थी.

यह रणनीति भाजपा को कमज़ोर कर रही है और विपक्ष को लाभ पहुँचा रही है.

बिहार के बाद गुजरात के स्थानीय निकाय चुनावों के परिणाम बता रहे हैं कि भाजपा की लोकप्रियता में कमी आ रही है.

पिछले साल शीत सत्र के पहले केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति के एक बयान से विपक्ष को मदद मिली थी.

उसके कारण प्रधानमंत्री पर दबाव पड़ा और उन्होंने राज्यसभा में जाकर खेद व्यक्त किया.

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पिछले साल ही उत्तर प्रदेश के उप चुनावों में ‘लव जिहाद’ और योगी आदित्‍यनाथ की रणनीति फेल हुई थी. इस साल बिहार में भी ऐसा ही हुआ.

इन विफलताओं के बावजूद माना जाता है कि यह पार्टी की सोची-समझी योजना है. पहले उसके नेता जहरीले बयान देते हैं और फिर माफ़ी माँग लेते हैं. सच यह है कि जनता को यह लुका-छिपी पसंद नहीं आती.

पिछले साल राज्यसभा में मोदी ने कहा था, "मैंने बहुत कठोरता से इस प्रकार की भाषा को नामंजूर किया है. चुनाव की गर्मा-गर्मी में भी हमें ऐसी भाषा से बचने की कोशिश करनी चाहिए."

असहिष्णुता के छींटे कांग्रेस पर भी पड़ते हैं. कश्मीरी पंडितों और सन 1984 के सिख विरोधी दंगों की बातें भी इस दौरान उठी हैं. हाल में कांग्रेस के नेता पी चिदंबरम ने माना कि सलमान रुश्दी की किताब पर पाबंदी लगाना अनुचित था.

मौजूदा बहस में कहा जा रहा है कि 1984 में राज-व्यवस्था ने कमजोरी नहीं दिखाई होती तो 2002 में गुजरात की स्थिति दूसरी होती.

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भारतीय लोकतंत्र से जुड़ा यह व्यापक महत्व का मसला है. राज-व्यवस्था, धर्म-निरपेक्षता और सहिष्णुता के सवालों पर खुले दिलो-दिमाग से संसद के भीतर और बाहर विचार-विमर्श लगातार चलाने की ज़रूरत है.

भारतीय अर्थ-व्यवस्था उठान पर है. नई युवा पीढ़ी जातीय-साम्प्रदायिक परिभाषाओं से बाहर निकलना चाहती है.

2014 के चुनाव में नरेंद्र मोदी को समर्थन देने वालों में बड़ी संख्या इस वर्ग की थी. यह तबका असहिष्णुता का समर्थन नहीं करता.

राजनीतिक लिहाज से सरकार दबाव में है. प्रधानमंत्री को कहना पड़ा, "तू-तू, मैं-मैं से देश नहीं चलता. मिलकर साथ-साथ चलता है." उन्हें यह भी कहना पड़ा कि किसी को अपनी देशभक्ति साबित करने की ज़रूरत नहीं है.

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सरकार को आर्थिक मोर्चे पर सफलता साबित करनी है तो उसे उदारीकरण के अधूरे काम को पूरा करना होगा. इन मामलों में उसका कांग्रेस के साथ सैद्धांतिक टकराव नहीं है.

जिस तरह से मोदी ने प्रधानमंत्रियों के स्वतंत्रता दिवस के भाषणों का तत्काल जवाब देने की बात कहकर राहुल गांधी का मज़ाक बनाया था, उसका जवाब किसी न किसी रूप में मिलना ही है.

अब बैकरूम बातचीत भी चल रही है. प्रधानमंत्री ने सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह से रूबरू मुलाकात की है. कांग्रेस इन स्थितियों और राज्यसभा में अपनी बढ़त का फायदा भी उठाना चाहेगी. और क्यों न उठाए?

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