दवाइयों की ऑनलाइन बिक्री का विरोध क्यों?

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भारत में ऑनलाइन रिटेल का बाज़ार बढ़ रहा है. फ्लिपकार्ट, स्नैपडील और अमेजन जैसे ऑनलाइन स्टोरों के उपभोक्ताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है.

ऑनलाइन कारोबार करने वाली कंपनियों की संख्या भी उसी अनुपात में बढ़ने लगी है. इनमें से कुछ कंपनियों की भारत के दवा बाज़ार पर भी नज़र है जो 12 अरब डॉलर यानी क़रीब 780 अरब रुपए का है.

इसे लेकर दवा विक्रेताओं में नाराज़गी देखने को मिल रही है. हाल में भारत के क़रीब साढ़े आठ लाख दवा विक्रेताओं ने दवाओं की ऑनलाइन बिक्री के विरोध में एक दिन की हड़ताल की थी.

दवा विक्रेताओं की एक मांग है कि ऑनलाइन दवा बेचने वाली वेबसाइटों पर रोक लगाई जाए.

दरअसल दवाओं के रिटेल धंधे में कई लोग पीढ़ियों से लगे हैं. वे अपने पड़ोस में सालों से दुकान चला रहे हैं. ऐसे में दवाओं की ऑनलाइन बिक्री से उनकी चिंता स्वभाविक है.

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दिल्ली के एक दवा विक्रेता कैलाश गुप्त ने बीबीसी से कहा, "ऑनलाइन फर्म्स सीधे कंपनियों से दवा ख़रीद कर काफ़ी छूट पर उपभोक्ताओं को बेच रही हैं. हम उन क़ीमतों की बराबरी नहीं कर सकते."

हालांकि सबसे बड़ा सवाल ये है कि भारत में अब तक ऑनलाइन कारोबार करने संबंधी नियम-प्रावधान भी नहीं बने हैं.

कैलाश गुप्त कहते हैं कि दवा विक्रेता सरकार से इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण मांग रहे हैं.

भारत में ऑनलाइन दवा बेचने वाली कंपनियों में एक स्टार्टअप है आईएमजी. हालांकि इनके पास दवाओं का अपना स्टॉक नहीं है और वे दवा दुकानों के ज़रिए ही अपना ऑर्डर पहुंचाते हैं.

आईएमजी के प्रशांत दावा करते हैं कि उपभोक्ताओं को सस्ती दवाएं मिलती हैं और सबकुछ प्रीस्क्रिप्शन के आधार पर ही होता है, इसलिए सुरक्षा का ख़तरा भी नहीं है.

वे कहते हैं, "हमारी कंपनी में 35 फर्मासिस्ट काम करते हैं. हम पहले प्रीस्क्रिप्शन चेक करते हैं फिर सीनियर फर्मासिस्ट उसकी वैधता देखते है और हम थर्ड पार्टी के जरिए जो एक कैमिस्ट ही होता है, दवा की आपूर्ति करते हैं."

अगर आप बीमार हैं और दवा की आपूर्ति आपके घर तक हो रही हो, तो हर कोई ऐसा ही चाहेगा. यही वजह है कि ऑनलाइन दवाइयां ख़रीदने वाले लोग भी बढ़ रहे हैं.

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अगर आप दवा ऑनलाइन ख़रीदना चाहते हैं तो फिर आपको प्रिस्क्रिप्शन अपलोड करना होगा, इसे मंज़ूरी मिलते ही आप ऑनलाइन भुगतान कीजिए, दवा आपके घर तक पहुंच जाएगी.

हालांकि दवाइयों के खुदरा विक्रेता इसकी ऑनलाइन बिक्री का विरोध कर रहे हैं. हालांकि इन लोगों की अपनी ख़ामियां भी हैं.

ख़ुदरा विक्रेता बिना किसी प्रिस्क्रिप्शन के भी दवाइयां बेचते रहे हैं.

ऐसे में, सरकार के लिए दवाओं की बिक्री के बेहतर तौर तरीक़े तैयार करना ज़रूरी हो गया है.

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