कीटनाशक कैसे बने 'किसाननाशक'

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देश के किसानों की तकलीफ़ का अंत होता नहीं दिख रहा है. किसान लगातार चौथे बरबाद रबी सीज़न के बीच असहाय खड़ा है.

कृषि क्षेत्र की विकास दर एक बार फिर एक फ़ीसदी के आसपास सिमट सकती है. ख़राब मौसम और फसलों के कमज़ोर दाम के बीच पेस्टीसाइड एक ऐसा कारण बना है जिसने पंजाब सहित देश के कई अन्य हिस्सों में किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया.

वाइट फ़्लाई के हमले की वजह से पंजाब की कपास बैल्ट में फसल तबाह हो गई. असल में इस फसल को बीमारी से बचाने के लिए जिस पेस्टीसाइड का उपयोग किसानों ने किया, वही नकली निकला. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है लेकिन इस बार यह नुकसान एक इलाक़े में इतना ज़्यादा हुआ कि मामला सुर्खियों में आ गया.

कंपनियां नए और महंगे पेस्टीसाइड ला रही हैं लेकिन किसान की आमदनी लगातार कम हो रही है. ऐसे में कम समझ और पैसे की कमी किसानों को नकली पेस्टीसाइड के जाल में फंसा लेती है. यह काम अधिकांश वही डिस्ट्रीब्यूटर करते हैं जो नामी कंपनियों के पेस्टीसाइड बेचते हैं.

एक ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक आठ से नौ फ़ीसदी सालाना दर से बढ़ रही पेस्टीसाइड की खपत अगले पांच साल में 20,000 करोड़ रुपए तक पहुंच जाएगी.

लेकिन पंजाब और दूसरे राज्यों में नकली पेस्टीसाइड की वजह से बर्बाद हुए किसानों का गुनहगार कौन है? सरकार का नियमन और नियंत्रण इतना कमज़ोर है कि हर दोषी पकड़ में नहीं आता. और तो और भ्रष्टाचार की वजह से सरकारी मशीनरी की मिलीभगत से धंधा चलता रहता है.

असल में पंजाब का मामला न तो पहला मामला है और न ही पंजाब पहला ऐसा राज्य है जहां नकली पेस्टीसाइड की वजह से किसानों के साथ धोखा हुआ है. देश भर में पेस्टीसाइड्स बनाने वाली करीब 800 यूनिट हैं और करीब डेढ़ लाख डिस्ट्रीब्यूटर्स का नेटवर्क इनकी बिक्री करता है.

देश के करीब 13,000 करोड़ रुपए के घरेलू पेस्टीसाइड बाजार में कीमत के लिहाज से लगभग 25 फ़ीसदी यानी 3200 करोड़ रुपए और मात्रा के हिसाब से करीब 30 फ़ीसदी पेस्टीसाइड नकली है.

अगले पांच साल में यह हिस्सेदारी 40 फ़ीसदी हो जाएगी. ऐसा खुद देश की एग्रोकेमिकल इंडस्ट्री का मानना है. नकली पेस्टीसाइड की सबसे अधिक बिक्री हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, पश्चिमी बंगाल और महाराष्ट्र में होती है.

दिलचस्प बात यह है कि एग्रोकेमिकल इंडस्ट्री ने नकली पेस्टीसाइड की बिक्री में ऊपर रहने वाले राज्यों में पंजाब को शामिल नहीं किया है लेकिन इस साल सबसे बड़ा नुकसान तो वहां ही हुआ है.

इससे साफ़ है कि आने वाले दिनों में किसानों को पंजाब जैसे कई संकटों का सामना करना पड़ सकता है. असल में इस देश में पेस्टीसाइड का रेगुलेशन इनसेक्टीसाइड एक्ट, 1968 के तहत आता है. इसकी जगह लेने के लिए पेस्टीसाइड मैनेजमेंट बिल, 2008 सरकारी मंजूरी का इंतजार कर रहा है.

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वहीं एक बात साफ है कि नकली पेस्टीसाइड से किसानों को बचाने के लिए कोई ठोस पहल सरकार ने नहीं की है और न ही वह दूसरे विकल्पों को लेकर गंभीर है. यही वजह है कि इस मामले के इतना तूल पकड़ने के बावजूद सरकार के स्तर पर कोई हलचल नहीं दिखती है. सरकार की नाकामी के अलावा किसानों को इनके उपयोग की जानकारी ना होना भी उनके नुकसान का बड़ा कारण है.

अधिकांश किसान डिस्ट्रीब्यूटर्स पर भरोसा करके ही पेस्टीसाइड खरीदते हैं और कीमत में अंतर के बहाने वह नकली पेस्टीसाइड के जाल में फंसते हैं. यहां पर राज्यों और केंद्र सरकार के कृषि विभाग की लापरवाही किसानों के लिए सबसे अधिक घातक साबित होती है.

असल में एग्रीकल्चर एक्सटेंशन नेटवर्क को लेकर सरकारों की लापरवाही किसानों को आधी अधूरी जानकारी के भरोसे छोड़ देती है. इसका नतीजा पंजाब जैसी घटनाओं के रूप में सामने आता है. वहीं जिस तरह से कृषि उत्पादों में तय मात्रा से अधिक पेस्टीसाइड रेजीड्यू मिल रहे हैं, वह उपभोक्ताओं के लिए भी घातक है.

ऐसे में बेहतर होगा कि सरकार किसानों को इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट (आईपीएम) की ओर प्रोत्साहित करे ताकि उसकी पेस्टीसाइड पर निर्भरता कम हो और समय रहते दूसरे विकल्पों का उपयोग कर वह अपनी खेती की लागत भी कम कर सके.

हाल के घटनाक्रम साबित करते हैं कि मौजूदा परिस्थिति में सरकार किसानों को घाटे से उबारने के लिए गंभीर नहीं दिख रही है. ऐसे में फिर किसी राज्य में नकली पेस्टीसाइड या सही पेस्टीसाइड के ग़लत उपयोग से किसी नई फसल के बरबाद होने के बाद किसान आत्महत्या करने को मजबूर नहीं होंगे, इसे नकारा जाना संभव नहीं है.

जहां तक देश में पेस्टीसाइड के उपयोग का सवाल है तो यह आंकड़ा 600 ग्राम प्रति हैक्टेयर है. जबकि यूरोप के फ्रांस जैसे विकसित देश में पांच किलोग्राम प्रति हैक्टेयर और अमरीका सात किलोग्राम प्रति हैक्टेयर पेस्टीसाइड का उपयोग करते हैं. चीन 13 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर और ताइवान दुनिया में सबसे अधिक 17 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर पेस्टीसाइड का उपयोग करता है.

देश में सबसे अधिक 24 फ़ीसदी पेस्टीसाइड उपयोग की हिस्सेदारी के साथ आंध्र प्रदेश सबसे ऊपर है जबकि पंजाब में 11 फ़ीसदी पेस्टीसाइड का उपयोग होता है वहीं हरियाणा में देश के खपत का पांच फ़ीसदी पेस्टीसाइड उपयोग होता है.

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ कुल खपत का 8 फ़ीसदी और महाराष्ट्र 13 फ़ीसदी पेस्टीसाइड उपयोग करता है जबकि गुजरात और कर्नाटक के मामले में यह हिस्सेदारी सात-सात फ़ीसदी है.

लेकिन क्या केवल 600 ग्राम पेस्टीसाइड प्रति हैक्टेयर की ही खपत देश में होती है, इसे लेकर पेंच है. असल में यह देशभर का औसत है जबकि फसलों के आधार पर इसका स्तर बदल जाता है. कई फसलों में इसका उपयोग न के बराबर है जबकि कई फसलें ऐसी हैं जहां पेस्टीसाइड का उपयोग काफी ज़्यादा होता है. उसी अनुपात में किसान की लागत भी बढ़ती है.

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कपास में पेस्टीसाइड पर किसान का करीब 4000 रुपए प्रति एकड़ खर्च होता है. बीटी कॉटन के बावजूद यह खर्च करीब 2000 रुपए प्रति एकड़ आता है. असल में बीटी कॉटन केवल बॉलवार्म से ही फसल की सुरक्षा करता है. पंजाब की घटना के बाद इसको लेकर भी सवाल उठे हैं.

जीएम जैसी महंगी टेक्नोलॉजी पर आधारित महंगा बीज खरीदने के बाद भी फसल की बीमारी से सुरक्षा नहीं होने पर इंडस्ट्री के लोगों की सफ़ाई है कि ये अटैक व्हाइट फ्लाई का था और जीएम कॉटन इस बीमारी से सुरक्षित नहीं है.

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