'बेटी पालकर देखें मोदी जी, तब जानेंगे दर्द'

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एक दिन रात 11 बजे मुझे अपनी बेटी की तकलीफ़ का ध्यान आया.

बातें होती हैं, उसके बाद मन कहीं न कहीं जाता ही है. सफ़दरजंग (अस्पताल) का कुछ ऐसा (वाकया) जो हमने देखा था वो मुझे कुछ ध्यान आया.

मुझे कुछ ऐसा अजीब सा महसूस हुआ. मैंने कलम कागज़ लिया और प्रधानमंत्री को उसी वक्त चिट्ठी लिखी. और दूसरे दिन पत्र मेल कर आया.

उसमें हमने ये लिखा कि आप अपने मन की बात पूरी जनता को सुनाते हैं लेकिन निर्भया के माता-पिता का दर्द आपको दिखता नहीं है?

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हम रोते हैं, आप दहाड़ते हैं.

आप एक बेटी को पालकर तो देखिए कि बेटी का दर्द होता कैसा है.

हमें कोर्ट कचहरी कानून का पता नहीं है, उससे मतलब नहीं है.

हमारी बिटिया को न्याय चाहिए. हमें न्याय चाहिए.

हालांकि वहां से जब हमने (पत्र) मेल किया तो खबर आई कि हमारा शिकायत उन्हें मिल चुकी है लेकिन उसके बाद कोई जवाब नहीं आया.

'सुनिए मेरी बात मोदी जी'

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प्रधानमंत्री जी से अगर हम आज कुछ कहना चाहें तो हम सिर्फ़ ये कहेंगे कि आप जैसे मन की बात कहते हैं, आपके मन की बात जनता सुनती है.

आपने स्वच्छता अभियान को चलाया जिसे सारे भारतवासी अपना चुके हैं, अभी भी अपना रहे हैं.

तो उसी तरह अपने मन की ही बात में महिलाओं की सुरक्षा के लिए सबको प्रेरित कीजिए.

कहिए कि आज के बाद महिलाओं के ऊपर हम कोई अत्याचार नहीं देखना चाहते हैं.

वो भारत का सबसे शक्तिशाली पोस्ट है.

वो एक बार वहां से कह देंगे तो हमें पूरा विश्वास है कि फ़र्क उसी दिन से पड़ना शुरू हो जाएगा और अंत में महिलाओं की सुरक्षा हो जाएगी.

(बद्रीनाथ सिंह से बीबीसी संवाददाता विनीत खरे की बातचीत पर आधारित)

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