पेरिस में विकासशील देशों को क्या मिला?

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पेरिस जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में लंबी बहस के बाद आख़िरकार समझौता तो हुआ लेकिन कई सवाल अपनी जगह पर बने हुए हैं.

जलवायु परिवर्तन पर हुए समझौते के मामले में भाषा भी बहस और मतभेदों की वजह रही.

दो शब्दों - 'किया जाएगा' और 'किया जाना चाहिए' के विवाद ने तो समझौते को क़रीब-क़रीब पटरी पर से उतार दिया था.

इन दोनों के बीच का अंतर भारत जैसे विकासशील देश के लिए काफ़ी मायने रखता है.

पूरी दुनिया की तरह भारत ने भी शनिवार को हुए समझौते का स्वागत किया है.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया, "पेरिस समझौते में ना किसी की जीत हुई और ना ही कोई हारा है. क्लाइमेट जस्टिस की जीत हुई है और हम सब एक हरे-भरे भविष्य के लिए साथ मिलकर काम कर रहे हैं."

लेकिन यह खुशी कुछ ही देर में फीकी पड़ गई. अब सारी बहस समझौते के मायने और 'किया जाएगा' और 'किया जाना चाहिए' के विरोधाभास के ईर्द-गिर्द आ चुकी है.

यह मुद्दा इस ऐतिहासिक समझौते को अपनाए जाने से ठीक पहले के आख़िरी कुछ घंटों में उठा था.

अमरीकी वार्ताकार दल के वकीलों ने पाया कि समझौते के दस्तावेज़ के एक शब्द में हेरफेर हो गई थी.

उस वक्त समझौते की धारा 4 के अंतर्गत 'अमीर देश ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन में कटौती करने के लिए अर्थव्यवस्था में व्यापक लक्ष्य निर्धारित करेंगे', ऐसा लिखा गया था.

अमरीका के विदेश मंत्री जॉन केरी ने साफ़ कर दिया, "या तो इसमें बदलाव किया जाए नहीं तो राष्ट्रपति ओबामा और अमरीका इस समझौते का समर्थन नहीं करेंगे."

इसके बाद इसमें बदलाव कर दिया गया था. अमरीका और फ्रांस के लिए राहत की बात यह रही है कि मामले को लेकर हो-हल्ला नहीं मचा और समझौता आगे बढ़ गया.

यह बदलाव काफी अहम था. क्योंकि 'किया जाएगा' के साथ क़ानूनी दायित्व जुड़ा हुआ है लेकिन 'किया जाना चाहिए' के साथ नहीं.

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उत्सर्जन में कटौती का मुद्दा अब अमीर देशों की प्रतिबध्ता की जगह अमीर देशों की इच्छा पर निर्भर करेगा.

इसी तरह विकासशील और विकसित देशों के अलग-अलग जवाबदेही तय करने की भारत की मांग नहीं मानी गई.

द सेंटर फॉर साइंस एंड एंवायरमेंट के उपनिदेशक चंद्र भूषण का कहना है कि 'ऐतिहासिक जवाबदेही' जैसे अहम शब्द को समझौते के अंतिम प्रारूप से हटा दिया गया है.

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ऐसी चिंता जताई जा रही है कि इससे भारत जैसे देश की महत्वकांक्षा को नुक़सान पहुंचेगा जो कोयला आधारित ऊर्जा की बदौलत अपनी अर्थव्यवस्था बढ़ाने की कोशिश करने की तमन्ना रख रहे हैं.

यह दुनिया के जलवायु परिवर्तन के मद्देनज़र तो ठीक है लेकिन भारत के उन राजनेताओं के हिसाब से अच्छा नहीं है जो हमेशा जलवायु परिवर्तन की जगह आर्थिक प्रगति के मसले को तरजीह देते हैं.

क्लाइमेट फंडिंग को लेकर परिभाषा साफ नहीं हो पाई है. विकसित देशों के द्वारा विकासशील देशों को पैसे तो दिए जाएंगे लेकिन विकसित देश पैसा देने के लिए बाध्य नहीं होंगे.

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