भारत-जापान समझौते से 'चीन नाराज़'

इमेज कॉपीरइट AFP

जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो अबे की भारत यात्रा के दौरान दोनों देश के बीच बुलेट ट्रेन और दक्षिण चीन सागर के लिए समझौते हुए.

चीन इससे चिंतित है और वो भारत से नाराज़ भी है.

चीनी विदेश मंत्रालय ने इसे भारत का हस्तक्षेप क़रार दिया है क्योंकि चीन के अनुसार भारत का दक्षिण चीन सागर से कोई ताल्लुक़ नहीं है.

यही नहीं, चीन का कहना है कि जापान का भी इस इलाक़े से कोई ताल्लुक़ नहीं है क्योंकि जापान पूर्वी चीन सागर में पड़ता है न कि दक्षिण चीन सागर में. अमरीका का भी कोई लेना-देना नहीं है.

हक़ीक़त ये है कि अमरीका और जापान बेहद तेज़ गति से उस इलाक़े के सभी देशों (जो चीन के विरोध में हैं) के साथ संबंध बढ़ाने में लगे हुए हैं.

और अब भारत भी उनके साथ दोस्ती बढ़ा रहा है. ज़ाहिर है कि इसकी वजह से चीन भारत से नाराज़ है.

लेकिन भारत का नज़रिया ये है कि भले समुद्र यहां से बहुत दूर हो लेकिन वो अहम शिपिंग चैनल है. वहां भारत के जहाज़ भी जाते हैं.

भारत वियतनाम, कंबोडिया, मलेशिया जैसे देशों को निर्यात करता है जो इन्हीं समुद्री इलाक़ों से होकर जाता है. तो ऐसे में भारत के जहाज़ को भी रुकावट का सामना करना पड़ सकता है.

इमेज कॉपीरइट Reuters

चीन के दक्षिण चीन सागर में मिलिट्री बेस बनाने से भारत को भी दिक़्क़त हो सकती है.

हालांकि चीन को जापान और भारत के बीच हुए बुलेट ट्रेन समझौते से कोई ख़ास दिक़्क़त नहीं है. क्योंकि चीन और भारत दोनों एक दूसरे के साथ बुुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट में दिलचस्पी रखते हैं.

चीन भी भारत में बुलेट ट्रेन के नेटवर्क में दिलचस्पी दिखा रहा है. बल्कि उसने तो दिल्ली से चेन्नई के बीच बुलेट ट्रेन का प्रस्ताव रखा भी है.

ये प्रोजेक्ट तो जापान के प्रोजेक्ट से से तीन गुना बड़ा है.

ये बात भी सच है कि चीन को पता है कि जापान दोगुना और तिगुना ज़्यादा भाव मांगेगा. जापान का प्रोजेक्ट, ट्रेन और कर्मचारी भी महंगे होते हैं.

और चीन के मामले में ऐसा नहीं है. इसलिए भारत को भी चीन के साथ बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट में दिलचस्पी है.

इमेज कॉपीरइट AP

लेकिन भारत में राजनीतिक मान्यता है कि चीन पर पूरी तरह से निर्भर होना ख़तरे से ख़ाली नहीं है. जैसा कि पावर स्टेशन प्रोजेक्ट में हुआ, कहीं चीन इससे भी हाथ ना खींच ले.

भारत इसको बैलेंस करने के लिए जापान से रिश्ता बढ़ा रहा है. लेकिन ये बात चीन को खटकती है.

एक ओर तो चीन के अख़बार ने जापानी प्रधानमंत्री के दौरे को काफ़ी तवज्जो दी है. वे जापान के हर गतिविधि को संदेह की नज़र से देखते हैं.

लेकिन दूसरी तरफ़, चीन चाहे भारत पर इल्ज़ाम लगा रहा है, लेकिन वह ख़ुद भी जापान के साथ दोस्ती बढ़ा रहा है.

चीन जापान के साथ आर्थिक और वाणिज्यिक कारोबार बढ़ा रहा है. वह जापान से तकनीकी मदद लेने में नहीं हिचकता.

इमेज कॉपीरइट Reuters

पिछले एक साल में जापान घूमने जाने वाले चीनी यात्रियों की संख्या बढ़ गई है.

भारत के हज़ार विरोध के बावजूद चीन पाकिस्तान को परमाणु और दूसरे मसलों में मदद कर रहा है.

पिछले एक साल में जापानी मुद्रा येन का लगातार अवमूल्यन हो रहा है. येन के लगातार गिरने से भारत को ये फ़ायदा हुआ है कि जापानी वस्तु जो काफ़ी महंगी हुआ करती थी, वो भारत के लिए काफ़ी सस्ती पड़ रही है.

इसलिए भारत को चीन की नाराज़गी को राजनीतिक मानते हुए परेशान होने की ज़रूरत नहीं. इसे भारत और जापान के बीच राजनीतिक तालमेल बिठाने की कार्रवाई माना जाना चाहिए.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार