2018 तक हमें 24 घंटे बिजली मिल पाएगी?

भारत में डिस्कॉम्स, ग्राफ़िक्स

अगले तीन साल में पूरे भारत को बिजली मिल पाएगी या नहीं या 24 घंटे बिजली मिलेगी या नहीं ये 'उदय' की कामयाबी पर निर्भर करता है.

'उदय' से 24 घंटे बिजली मिलने का ज़माना शुरू हो सकता है. इसके लिए ज़रूरी है कि राज्य सभी शर्तें मानें जब तक कि वितरण कंपनियां मुनाफ़े में न आ जाएं.

बिजली वितरण कंपनियां कर्ज़ के बोझ तले दबी हैं. इन पर इतना क़र्ज़ है कि उतनी रक़म से देश में 500 किलोमीटर की दूरी के लिए चार बुलेट ट्रेन की लाइनें बिछाई जा सकती थीं.

पांच नवंबर को केंद्रीय बिजली मंत्री पीयूष गोयल ने उज्ज्वल डिस्कॉम एश्योरेंस योजना (UDAY-'उदय') की घोषणा की. इस योजना के चार मुख्य उद्देश्य हैं.

राज्य सरकारें योजना में शामिल होकर अपनी बिजली वितरण कंपनियों के क़र्ज़ को रिस्ट्रक्चर कर सकती हैं. 'उदय' में राज्यों से उम्मीद है कि वो क्षमता का बेहतर उपयोग करेंगे और बिजली चोरी और नुक़सान कम करेंगे.

इसके अलावा वो इस पर भी ध्यान देंगे कि उनकी कुल बिजली क्षमता का एक हिस्सा सौर और पवन ऊर्जा जैसे साधनों से आएगा.

इसके बदले केंद्र सरकार इन राज्यों में बिजली वितरण के बुनियादी ढांचे में सुधार को प्राथमिकता देगी. बिजली की मांग में गिरावट आए इसके लिए ज़रूरी मदद देगी.

मांग से संबंधित तीन क़दम हैं. घरेलू उपभोग और छोटे उद्योगों में सरकार पारंपरिक और सीएफ़एल बल्बों की जगह बिजली की कम खपत और ज़्यादा रोशनी वाले एलईडी बल्बों के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रही है. शहरी निकायों को स्ट्रीट लाइट में एलईडी बल्बों के इस्तेमाल के लिए भी मदद दी जाएगी.

खेती और छोटे उद्योगों को बेहतर गुणवत्ता वाले उपकरण, जैसे पानी के पंप को सब्सिडी पर बेचा जाएगा.

मुख्य ग्रिड पर लोड कम करने के लिए अलग-अलग सरकारी संस्थाओं में सौर ऊर्जा के इस्तेमाल को भी बढ़ावा दिया जा रहा है.

मार्च 2015 के अंत तक सरकारी बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम्स) का बकाया क़र्ज़ 4.3 लाख करोड़ रुपए था. इसके अलावा 3.8 लाख करोड़ का घाटा भी शामिल था. पिछले वित्त वर्ष में ही 60 हज़ार करोड़ का घाटा उनके खाते में जुड़ा था.

ज़्यादातर बिजली वितरण कंपनियां एक से कम के ऑपरेटिंग रेशियो में काम करती हैं यानी उनकी आमदनी से उनके काम की लागत नहीं निकल पाती. आमदनी से ब्याज चुकाने की बात तो भूल ही जाएं, उन्हें अपना काम चलाए रखने के लिए ही लगातार उधार लेते रहना पड़ता है!

कुल बिजली का 32 फ़ीसद हिस्सा चोरी और बिलिंग की खामियों की वजह से बर्बाद हो जाता है. इसमें से ज़्यादातर नुक़सान के पीछे राजनीतिक संरक्षण से होने वाली चोरी और ग़ैरक़ानूनी बिजली कनेक्शन हैं.

लेकिन 'उदय' में सबसे ज़्यादा दिलचस्प बात वित्तीय ढांचे में बदलाव की है. राज्य अपनी बिजली वितरण कंपनियों का 75% क़र्ज़ उठा सकेंगे. यह हो सकेगा 2016-17 से बाद के दो सालों में और इसके बदले सरकारें बॉन्ड जारी करेंगी.

बॉन्ड से जो आमदनी होगी उसका इस्तेमाल कंपनियों का क़र्ज़ निपटाने में होगा. इससे बैंकों को फिर से पूंजी मिलेगी. इनमें से ज़्यादातर बैंक सरकारी हैं और क़र्ज़ उगाही से जूझ रहे हैं.

राज्य सरकारों के बॉन्ड पर ब्याज दर कम मिलेगी. लेकिन जैसे-जैसे बिजली चोरी और नुक़सान में कमी आएगी और आमदनी बढ़ेगी, सरकारें उनकी आमदनी से बॉन्ड की ब्याज चुकाएंगी.

इससे बिजली नियामक आयोगों पर बार-बार बिजली महँगी करने का दबाव भी कम होगा.

इस कोशिश की सफलता इस पर निर्भर करती है कि बिजली वितरण कंपनियां चोरी और नुक़सान में कितनी कमी ला पाती हैं. इसके लिए न सिर्फ़ बढ़िया प्रबंधन बल्कि मज़बूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की भी ज़रूरत है.

अब तक 12 राज्य सरकारों ने 'उदय' में शामिल होने पर सहमति जता दी है. ग़ैर एनडीए-ग़ैर यूपीए पार्टी वाले उत्तर प्रदेश के अलावा इनमें से नौ राज्य भाजपा की या भाजपा समर्थित सरकारें हैं (आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, जम्मू और कश्मीर, झारखंड, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान) और दो में यूपीए की सरकारें (हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड) हैं.

कुछ जानकार आशंका जता रहे हैं कि बैंक अपने क़र्ज़ों के वितरण कंपनी से राज्य सरकार के खातों में जाने से ब्याज दरों में होने वाली कमी के लिए आसानी से तैयार नहीं होंगे.

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हालांकि बैंकों के पास यह विकल्प है कि या तो वो कभी क़र्ज़ की उगाही ही न कर पाएं या उनके क़र्ज़ को चुकाए जाने की गारंटी एक सुरक्षित कर्ज़दार, इस मामले में राज्य सरकार, दे.

इसके अलावा राज्य सरकारों के पास भी विकल्प होगा कि वो बॉन्ड को बैंकों की जगह बीमा कंपनियों, संस्थागत फंड्स जैसे वित्तीय संस्थानों को बेच सकें.

क़र्ज़ के पुनर्गठन की प्रक्रिया फ़रवरी 2016 के अंत में शुरू होगी. वितरण कंपनियों के क़र्ज़ का पहला हिस्सा राज्य सरकार के खातों में पहली अप्रैल 2016 तक जाएगा.

'उदय' महज़ थोड़ी-बहुत वित्तीय मदद देकर मरहम पट्टी करने का मामला नहीं है. इसमें बिजली की सप्लाई और डिमांड के सुधारों पर गौर किया गया है. इसमें राज्यों से वाकई काम में सुधार की गुज़ारिश की गई है.

'उदय' से बहुत हद तक यह तय होगा कि भारत में अच्छे अर्थशास्त्र और अच्छी राजनीति का साथ चल पाता है या नहीं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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