'पागल मामा' का आश्रम है विक्षिप्तों का ठिकाना

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Image caption मानसिक रोगियों के साथ वणकाभाई परमार.

मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों के प्रति समाज में एक ख़ास तरह की भ्रांति है और लोग दूर से निकलने की कोशिश करते हैं.

लेकिन गुजरात के एक ट्रक ड्राइवर को पागलपन के शिकार लोगों की सेवा का ऐसा जुनून पैदा हुआ कि उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी समर्पित कर दी है.

आज गुजरात के गोरसर गांव में एक आश्रम है, जिसमें दर्जनों मानसिक रोगियों की देखरेख और उनका इलाज किया जाता है और ठीक होने पर उनके घर पहुंचाया जाता है.

लेकिन ये सब अचानक नहीं शुरू हुआ. वणकाभाई परमार जब ट्रक चलाते थे, तो सड़कों पर घूमते विक्षिप्त लोगों को देखते ही वो अपना ट्रक रोक देते थे.

वो तब तक वहां से नहीं हटते जब तक कि वो उन्हें नहलाने, बाल और नाख़ून काटने, अपने साथ लाए कपड़े पहनाने से लेकर खाना खिलाने का काम नहीं कर लेते.

गुजरात के जूनागढ़ के जाने माने मनोचिकित्सक डॉक्टर बकुल बुच कहते हैं, “15 साल पहले, मैंने पहली बार सुना था कि पोरबंदर के पास गोरसर गांव में एक आदमी पागलों की सेवा करता है. इसके बाद मैं उन्हें देखने वहां पहुंचा.”

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Image caption डॉ बकुल बुच

वो बताते हैं, “तार से घिरी जगह में बने दो-तीन छोटे कमरों में क़रीब 18-19 मानसिक रूप से विक्षिप्त आदमी औरत थे. एक आदमी उन्हें नहला रहा था, उनके बाल काट रहा था और बड़े प्यार से उन्हें खाना खिला रहा था.”

डॉक्टर बुच ने बीबीसी को बताया कि पूरे ज़िले में इस जगह को पागल मामा के आश्रम के नाम से जाना जाता है.

वो बताते हैं कि यह सिलसिला क़रीब 30 साल तक चला. लेकिन जब वणकाभाई के बच्चे बड़े हो गए और कमाने लगे तो उन्होंने ट्रक चलाना छोड़ दिया.

वणकाभाई ने बताया, "जब पहली बार एक पागल को घर ले आया तो पत्नी ने डांटते हुए कहा कि आपके इस पागलपन के कारण लोग हमें गांव के बाहर कर देंगे."

घर में विरोध के चलते वो उसे अपने खेत में बने कमरे में ले गए और उसका ध्यान रखने लगे.

लेकिन यह सिलसिला यहीं नहीं रुका और समय समय पर विक्षिप्त लोगों को वो लाते रहे.

जब इनकी संख्या बढ़ी तो नज़दीकी गोरसर गांव उन्होंने इन सभी मानसिक रोगियों को एकसाथ रखने की व्यवस्था की.

वो बताते हैं, “संख्या बढ़ने के साथ इन लोगों के लिए खाने का इंतज़ाम जब मुश्किल हो गया तो मैं घर-घर जाकर भोजन मांगने लगा.”

वणकाभाई की लगन ऐसी थी कि आस पास के लोग उन्हें 'पागल मामा' के नाम से पुकारने लगे.

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जब वणकाभाई की मुलाक़ात डॉ बकुल बुच से हुई तो उन्होंने सलाह दी कि इनका इलाज होना चाहिए. ये मानसिक रूप से बीमार लोग हैं और सही इलाज से ठीक होकर अपने परिवार में लौट सकते हैं.

डॉक्टर बुच ने वणकाभाई को समझाया कि इस सेवा का असल मक़सद यही होना चाहिए. उन्होंने इसमें मदद करने का भी प्रस्ताव दिया.

बात पक्की हुई और दोनों ने नए सिरे से अपना काम शुरू किया.

गोरसर और जूनागढ़ के बीच सौ किलोमीटर का फ़ासला है और डॉक्टर बुच महीने में दो बार यहां आते हैं और मानसिक रोगियों का इलाज करते हैं.

पिछले 15 साल में 500 से अधिक मानसिक रोगी अच्छे होकर अपने घर जा चुके हैं.

वणकाभाई कहते हैं, “देश का ऐसा कोई राज्य नहीं है, जहां से आए पागलों को चंगा होने के बाद अपने घर भेजा न गया हो.”

लेकिन इतने लोग आते कहां से हैं?

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इसका जवाब देते वणकाभाई परमार कहते हैं कि पोरबंदर और सोमनाथ दो ऐसे रेलवे स्टेशन हैं, जहां से ट्रेन आगे जाती नहीं है. इन ट्रेनों में जो विक्षिप्त लोग आते हैं, उन्हें स्टेशन पर उतार दिया जाता है.

यहां से कुछ सेवाभावी लोग या फिर ऑटोरिक्शा वाले इन्हें आश्रम तक छोड़ जाते हैं.

अभी हाल तक आश्रम में 54 लोग थे, जिनकी सेवा करने का काम वणकाभाई और इलाज करने का काम डॉक्टर बुच करते हैं.

मामा के पागलपन से गुजरात और भारत सरकार तो प्रभावित है ही, लेकिन कुछ साल पहले नीदरलैंड्स की सरकार ने भी उन्हें काफ़ी सहायता दी थी.

जब नीदरलैंड्स सरकार ने उन्हें सम्मानित करने का निर्णय लिया तो उन्होंने पुरस्कार राशि के बदले मानसिक इलाज के लिये दवाओं की मांग रख दी थी.

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