सारंगी के सौ रंग...

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सारंगी नवाज़ मुराद अली ख़ान देश के चुनिंदा बेहतरीन सारंगी वादकों में से एक हैं. वो मुरादाबाद घराने के मुरादाबाद सारंगिया सिद्दक़ी अहमद ख़ान के पोते व ग़ुलाम साबिर ख़ान के बेटे हैं.

मुराद के जुड़वा भाई फ़तेह अली ख़ान युवा सितार वादक हैं, पर मुराद ने अपनी ख़ानदानी विरासत को आगे ले जाने का फ़ैसला लिया.

मुराद अली अपने घराने की छठवीं पीढ़ी का नेतृत्व कर रहे हैं. हालांकि सारंगी एक मुश्किल वाद्य है, जिसे अंगुली के नाख़ून के पोरों से बजाया जाता है.

पुराने समय में सारंगी घुम्मकड़ जातियों का वाद्य यंत्र था. इसे सारिंदा व पिनाकनी वीणा भी कहते हैं. सारंगी के कई रूप हैं जैसे थार, सिंधी, गुजराती आदि.

मुराद के अब तक कई सोलो और नॉन सोलो एल्बम आ चुके हैं. 1992 में उन्हें ऑल इंडिया रेडियो नेशनल म्यूजिक कॉम्पिटिशन में प्रथम स्थान मिला था.

उन्होंने 'ऑल इंडिया रेडियो' के ए ग्रेड आर्टिस्ट हैं. मुराद 'ख़ामोश पानी', 'लगे रहो मुन्ना भाई', 'लागा चुनरी में दाग' 'खोया खोया चाँद' जैसी फ़िल्मों में भी अपनी सारंगी के सुर बिखेर चुके हैं.

वो 'सारंगी रत्न अवार्ड', 'उस्ताद बिस्मिल्लाह खां पुरस्कार', संगीत नाटक अकादमी का 'युवा रत्न पुरस्कार' व डॉ अब्दुल कलाम द्वारा 'संस्कृति अवार्ड' समेत कई पुरस्कारों से नवाज़े जा चुके हैं.

Image caption मुराद मानते हैं सारंगी को एकल वाद्य का मुक़ाम देने में पंडित रामनारायण, पंडित गोपाल मिश्रा, उस्ताद साबरी खां और सुल्तान खां साहब की मुख्य भूमिका है.
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Image caption सारंगी लकड़ी की बनी होती व इसका निचला हिस्सा बकरे की खाल से मढ़ा होता है. इसमें 29 तार होते हैं तथा मुख्य बाजे में चार तार होते हैं.
Image caption मुराद ने अपने जुड़वा भाई फ़तेह अली ख़ान के साथ मिलकर 'सोल संवाद' नाम से एक बैंड भी बनाया है. मुराद अली बताते हैं ' सारंगी ' का जिक्र रामायण और महाभारत धर्म ग्रंथों में भी मिलता है.
Image caption सारंगी से सौ प्रकार की धुनें निकाली जा सकती हैं इसीलिए इसे सौ रंगी भी कहा जाता है.
Image caption मुराद ने कई विदेशी संगीतकारों के साथ काम किया है व सारंगी के साथ कई नए प्रयोग किये हैं.
Image caption मुग़ल दरबार में सारंगी का नृत्य की संगत में महत्वपूर्व स्थान था.
Image caption आपने अपने दादा की याद में 'सौरंगी फेस्टिवल ' की शुरुआत की थी. जिसने सारंगी को आम दर्शकों के बीच एक नया मुक़ाम दिया.
Image caption सारंगी को बनाने वाले कारीगर भी ख़ास होते हैं. मुराद जिस सारंगी को बजाते हैं वो लगभग 200 साल पुरानी है.
Image caption मुराद बताते हैं यह एकमात्र ऐसा साज़ है जो दिल के करीब रखकर बजाया जाता है जो सीधे सुनने वाले के दिल को छूता है.

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