हेरल्ड मुद्दे का कांग्रेस की राजनीति पर क्या असर?

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पिछले आम चुनावों में हाशिये पर पहुंच गई कांग्रेस पार्टी के लिए नेशनल हेरल्ड मामला किसी संजीवनी से कम नहीं लग रहा है.

पेशी होने के एक दिन पहले तक जमानत न लेने और फिर सोनिया और राहुल के अदालत में पेश होने की ख़ासी रही.

लेकिन सोनिया गांधी को क्या इससे कोई राजनीतिक फायदा मिलेगा?

बीबीसी से बातचीत में राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई कहते हैं, “सोनिया गांधी को इस मामले में दो कारणों से अपना राजनीतिक भविष्य दिखाई दे रहा है. एक तो ये कि इस मामले को लेकर भारतीय जनता पार्टी और सरकार में एक भ्रम की स्थिति बनी हुई है.”

वो कहते हैं, “सुब्रमण्यम स्वामी ने ये इल्जाम लगाया, जबकि उनका कहना है कि ऐसा उन्होंने निजी तौर पर किया है. इसके बाद ईडी के जिस अधिकारी ने कहा था इसमें कोई ठोस मामला नहीं बनता, उसका ट्रांसफ़र हो गया.”

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रशीद किदवई के मुताबिक़, दूसरा कारण ये है कि नेशनल हेरल्ड का पूरा मामला भ्रष्टाचार के मामले से थोड़ा अलग है. यूपीए सरकार के दौरान ही वो अख़बार बंद हो गया था और उसकी तमाम ज़मीनें मुक़दमेबाजी में फंसी हैं.

जानकार ये मानते हैं कि ऐसे में सोनिया गांधी का आकलन हो सकता है कि मुकदमे में उनके ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत नहीं हैं, लेकिन इसका राजनीतिक फायदा उठाया जा सकता है.

और ये तो कांग्रेस ज़ोरशोर से कह ही रही है कि मोदी सरकार राजनीतिक बदले की मंशा से काम कर रही है.

किदवई कहते हैं, “इस मामले का सबसे बड़ा पहलू ये है कि अगर कोई कहता है कि धोखाधड़ी या भ्रष्टाचार हुआ तो पीड़ित पक्ष भी होना चाहिए लेकिन सुब्रमण्यम स्वामी तो पीड़ित नहीं हैं. इसमें कई पहलू हैं, कांग्रेस को न तो क़ानूनन दोषमुक्त किया जा सकता है और न ही दोषी ठहराया जा सकता है.”

इन सब का आकलन करते हुए पूरे मामले का राजनीतिक फायदा उठाने की कांग्रेस की कोशिश है.

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रशीद किदवई उनके मुताबिक़, “कांग्रेस इस समय सबसे बुरी स्थिति में है. संगठन में तरह के स्वर गूंज रहे हैं. एक धड़ा इस बात की पैरवी कर रहा है कि सोनिया कमान संभाल कर रखें, तो दूसरा धड़ा राहुल को आगे लाना चाहता है. लेकिन पेशी के दौरान का नज़ारा बताता है कि दोनों ही धड़े एकजुट हुए हैं.”

लेकिन पेशी के दौरान शक्ति प्रदर्शन के ख़ास मायने हैं. इस दौरान पार्टी के सभी कद्दावर नेता एकजुट नज़र आए और पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी एक साथ दिखी.

रशीद किदवई कहते हैं, “असल में कांग्रेस के लिए यह अस्तित्व की लड़ाई है. वो वैचारिक लड़ाई में लगातार पिछड़ रही है. जिन राज्यों में भाजपा हार रही है वहां भी कांग्रेस की जीत नहीं हो रही है. ऐसे कठिन समय में इस मुद्दे के ज़रिए कांग्रेस के हाथ ऐसा मौका लगा जो पार्टी के लिए ऑक्सीजन की तरह है.”

उनके मुताबिक़, “कांग्रेस इस मुद्दे पर देश में अपने लिए एक सहानुभूति का माहौल बनाना चाहती है. वो ये दिखाना चाहती है कि 10 सालों के राज में राहुल और सोनिया पर सीधे कोई बड़ा इल्जाम नहीं लगा. और ये भी दिखाना चाहती है कि नेशनल हेरल्ड से कैसे कमाई की जा सकती है, एक ऐसा अख़बार जो अपनी ही मौत मर गया.”

कांग्रेस को लगता है कि इस अवसर पर कम से कम अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया जा सकता है ताकि वो सड़कों पर उतरें. ऐसा संघर्ष का माहौल बनाने के लिए एक संदेश देने की ज़रूरत महसूस की जा रही थी, जो 16 मई 2014 के बाद से कांग्रेस में गायब सा हो गया था. कांग्रेस का ये मकसद भी भली प्रकार हल हो रहा है.

(बीबीसी संवाददाता मोहन लाल शर्मा के साथ बातचीत पर आधारित.)

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