'...क्योंकि असली निशाना तो मोदी हैं'

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संसद का शीतकालीन सत्र बिना कुछ ख़ास कामकाज निपटाए ख़त्म होने की कगार पर है.

कई लोगों को लगता है कि कांग्रेस और उसके समर्थक ग़ैर-भाजपाई दल राष्ट्रीय हितों की क़ीमत पर भी संसद में विधायी कामकाज इसलिए नहीं होने दे रहे हैं क्योंकि भाजपा की अगुआई वाले विपक्ष ने भी 15वीं लोकसभा (2009-2014) को लगभग पंगु बना दिया था.

यह पूरी तरह ग़लत भी नहीं है. पीआरएस रिसर्च के आंकड़े बताते हैं कि तब 50 वर्षों में पहली बार संसद इतना कम काम कर पाई. 15वीं लोकसभा गतिरोधों की वजह से अपने निर्धारित कामकाज का सिर्फ़ 61 प्रतिशत तो राज्यसभा महज़ 66 फ़ीसदी कामकाज निबटा सकी.

कांग्रेस के कुछ नेता यह ज़िक्र भी कर रहे हैं कि किस तरह तब लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने ‘संसद की कार्यवाही न चलने देने को लोकतंत्र का एक स्वरूप’ और राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरूण जेटली ने ‘कार्यवाही बाधित करने को लोकतंत्र के हित में’ बताया था.

हालांकि इन दोनों नेताओं की उस दौर की ये उक्तियां उनके समूचे बयान और उसके विषय-संदर्भ से जोड़कर याद की जाएं तो विधायी दांवपेंच से अनजान कोई सामान्य व्यक्ति भी इन कथनों की अहमियत से राज़ी हो जाएगा.

2009-2014 के उस दौर में इक्का-दुक्का अंग्रेज़ी अख़बारों में छपे कुछ ड्राइंगरूम-विचारकों के ‘लोकतंत्र का क्या होगा’ मार्का आलेखों तथा कुछेक चलताऊ संपादकीयों को छोडक़र तब संसद में विपक्ष के धारावाहिक गतिरोधों को आम लोगों की एक तरह से मौन सहमति थी, बल्कि उन गतिरोधों से जुड़े बड़े मुद्दे जनमानस में मंथन की वजह बन गए थे.

तब सत्तारूढ़ यूपीए सरकार देश भर में कहीं भी ‘‘संसद को चलने दो’’ के समर्थन में सड़कों पर प्रदर्शन करने के लिए लोगों को प्रेरित नहीं कर सकी थी. ऐसा क्यों है कि 2009-14 के यूपीए कार्यकाल के मुक़ाबले इस बार संसद में पैदा किए जा रहे गतिरोधों से देश भर में, ख़ास तौर पर अराजनैतिक लोगों में यह भावना घर कर रही है कि ये गतिरोध, यह संसद की कार्यवाही बिन बात बाधित करना क़त्तई देशहित में नहीं है?

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इसलिए कि यूपीए के दूसरे कार्यकाल में संख्याबल से कमज़ोर एनडीए-नेतृत्व वाले विपक्ष के पास देश के संसाधनों की बंदरबांट और उच्च पदों पर भयंकर भ्रष्टाचार मामलों को उनके क़ानूनी और न्याय सहमत अंजाम तक पहुंचाने के लिए संसद की कार्यवाही बाधित करने का ‘अपवादस्वरूप इस्तेमाल किया जाने वाला अस्त्र’ इस्तेमाल करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था.

विपक्ष ‘‘देश की लूट’’ वाले इन मुद्दों पर सिर्फ़ बहस के प्रस्ताव से संतुष्ट हो जाता तो सरकार बातों के जमाख़र्च से उसे बेमानी बना देती तो विपक्ष के स्थगन प्रस्ताव सरकार की सदन में ताक़त से ख़ारिज हो जाते. और ये मसले कौन-से थे जिन पर तब विपक्ष ने संसद को सिर पर उठा रखा था?

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‘तेल के बदले अनाज’ (तत्कालीन विदेश मंत्री नटवर सिंह का इस्तीफ़ा); 1,76, 645 करोड़ रू. का 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, जिसे तब के संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने ‘‘ज़ीरो लॉस’’ कहा था, (संचार मंत्री ए. राजा का इस्तीफ़ा और उनके समेत अन्य अभियुक्तों पर मुक़दमा); टेलिकॉम घोटाले में दयानिधि मारन का इस्तीफ़ा, रेलवे बोर्ड के ठेकों के लिए रिश्वतख़ोरी के मामले में रेल मंत्री पवन कुमार बंसल का इस्तीफ़ा, सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 1.86 करोड़ रू. के कोयला घोटाले की जांच की स्टेटस रिपोर्ट सीलबंद लिफ़ाफ़े में अदालत को दिखाए जाने से पहले उनकी जांच-परख करने के आरोप में विधि मंत्री अश्वनी कुमार का इस्तीफ़ा, शशि थरूर का इस्तीफ़ा.

गतिरोध के कारण भले संसद का एक पूरा सत्र 2जी घोटाले की बलि चढ़ा लेकिन उससे टेलिकॉम स्पेक्ट्रम आबंटन में पार्दर्शिता आई. इसी तरह कोयला घोटाले पर तत्कालिन विपक्ष के ससंद बाधित करने से कोयला खदानों के न्यायसंगत आबंटन का रास्ता खुला और सुप्रीम कोर्ट ने खानों की बंदरबांट रद्द कर नए सिरे से आबंटन के निर्देश सरकार को दिए.

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देश की जनता भी देख रही है कि आज संसद किन और कैसे-कैसे मुद्दों पर ठप की जा रही है. निरे शून्य से नए-नए मुद्दे यूं पैदा किए जा रहे हैं कि जादूगर गोगिया पाशा भी होता तो अश-अश कर उठता. कोई तिल भी नहीं कि उसका ताड़ बना लिया जाए. झूठे दावे और शिकायतें ऐसी बेबाकी से उछाले जा रहे हैं कि सत्यवादी हरिश्चंद्र भी उनको सच मानने को मजबूर हो जाए!

दरअसल मई, 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को मिले ज़बरदस्त समर्थन से गतप्राण कांग्रेस और डरे हुए ग़ैर-भाजपाई क्षेत्रीय दलों को दिल्ली विधानसभा चुनाव और फिर हाल में बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा की भारी हार से उम्मीद की ऑक्सीजन मिल गई है.

जिन मोदी को वे दंगों के नाम पर गुजरात में नहीं रोक पाए वे जनादेश के बूते धड़धड़ाते हुए दिल्ली पहुंचकर उनके सीने पर आ बैठे. न केवल आ बैठे, बल्कि भ्रष्टाचार, मुफ़्तख़ोरी, प्रशासनिक निकम्मेपन पर लगाम कस रहे हैं और आर्थिक-सामाजिक विकास के नए प्रतिमान गढ़ने की जद्दोजहद में लगे हैं.

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एनडीए के छिटपुट नेताओं पर लोग भले नाक-भौं सिकोड़ लें, मोदी आम लोगों की नज़रों में बने हुए हैं. अगर वे नए मानदंड, नए जुमले, नई नीतियां, नए कार्यक्रम स्थापित करते-करते जम गए तो 2019 में कांग्रेस और उसके समर्थक-भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे अधिकतर क्षेत्रीय नेताओं-दलों का क्या होगा? सो, फ़िलहाल देशहित ताक पर, संसद चले न चले, मोदी और देश को विश्व शक्ति बनाने के उनके ऊंचे इरादे तो नाकाम होंगे.

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