हिंदी कविताः 'जब जिस्म ही सारा जलता हो...'

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एक शेर की पंक्ति है- 'जब जिस्म ही सारा जलता हो तो दामने दिल को बचाएं क्या.' असहनशीलता के खिलाफ खड़ी हिंदी कविता का ये असमंजस इस साल जितना उभर कर आया, पिछले कई दशकों में नहीं नज़र आया था.

कैलेंडर के हिसाब से कविता नहीं बदलती. इसलिए साल 2015 की हिंदी कविता की चर्चा बस इस संदर्भ के साथ की जा सकती है कि इस साल कौन सी नई किताबें आईं, किन कविताओं ने ध्यान खींचा और किन प्रवृत्तियों का ज़ोर रहा.

जिन प्रमुख काव्य संग्रहों का ज़िक्र इस साल के खाने में किया जा सकता है, उनमें चंद्रकांत देवताले का ‘ख़ुद पर निगरानी रखते हुए’, अनामिका का 'टोकरी में दिगंत' राजेश जोशी का संग्रह ‘जिद’, मदन कश्यप का ‘अपना ही देश’ और पंकज चतुर्वेदी का ‘रक्तचाप और अन्य कविताएं’ हैं.

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इनके अलावा बुज़ुर्ग कवि कुंवरनारायण का ‘कुमारजीव’ भी इसी साल की कोख से निकला है. जन संस्कृति मंच से वर्षों से जुड़े अजय सिंह के कविता संग्रह ‘राष्ट्रपति भवन में सुअर’ और दलित लेखिका रजत रानी मीनू के काव्य संग्रह ‘पिता भी होते हैं मां’ भी इसी साल की देन है.

साल ख़त्म होते-होते युवा कवि अशोक पांडेय के संग्रह ‘प्रतीक्षा का रंग सांवला’ के आने की खबर भी मिली. वैसे संग्रहों की सूची यहीं ख़त्म नहीं होती और नाम गिनाना एक सीमा के बाद साल के मूल्यांकन में व्यर्थ होता चलता है.

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Image caption सोशल मीडिया पर भी हिंदी कविता तेजी से प्रचलित हो रही है

अगर प्रवृत्तियों की बात करें तो हिंदी कविता में प्रतिरोध के दो स्तर इस साल दिखे. ‘16 मई के बाद’ के नाम से देश के अलग-अलग शहरों में चलाई गई काव्य पाठ शृंखला इस साल भी चलती रही और सोशल मीडिया में ‘मोर्चे पर कवि’ डटे रहे.

कभी हिंदी के युवा कवियों में शुमार किए जाने वाले और बदले हुए दौर से बुरी तरह नाराज़ विमल कुमार ने नरेंद्र मोदी के विरोध में फेसबुक पर कविताओं की झड़ी लगा दी जिनमें कुछ बहुत अच्छी कविताएं भी थीं. यह अलग बात है कि उनके इस साहित्यिक दुस्साहस को अभी तक प्रकाशक का इंतजार है.

इसी तरह बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में पुरस्कार वापसी का सिलसिला भले कथाकार-लेखक उदयप्रकाश ने शुरू किया हो, हिंदी में उसे अशोक वाजपेयी, मंगलेश डबराल और राजेश जोशी जैसे कवियों ने पहले आगे बढ़ाया और बाद में कुछ हिचक के साथ काशीनाथ सिंह भी इसमें शामिल हुए.

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इन दिनों सोशल मीडिया भी कविता की एक अहम जगह है. सोशल मीडिया में ही अपनी अछूती अभिव्यक्ति और अपने ताज़ा बिंबों के साथ ख्यात हुई कवयित्री बाबूषा कोहली को नया ज्ञानोदय ने अपना नवलेखन सम्मान दिया और उनका संग्रह ‘प्रेम गिलहरी दिल अखरोट’ छापा.

दिलीप शाक्य के संग्रह ‘कविता में उगी दूब’ को भी ज्ञानपीठ ने इसी क्रम में छापा. सोशल मीडिया पर सक्रिय और संवेदनशील कवयित्री देवयानी भारद्वाज का संग्रह ‘इच्छा नदी के पुल पर’ भी जल्द ही आने वाला है.

इस साल एक न दिए गए पुरस्कार पर भी विवाद हुआ. युवा कवियों को दिए जाने वाले प्रतिष्ठित भारत-भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार के इस वर्ष के निर्णायक अशोक वाजपेयी ने कहा कि उन्हें 35 वर्ष से कम उम्र के किसी कवि की ऐसी कोई कविता नहीं मिली जिसे यह सम्मान दिया जाए.

इसे लेकर युवा कवियों में ख़ासा आक्रोश दिखा जो हालांकि किसी सार्थक बहस की शुरुआत के बिना बिखर गया. बहरहाल, देश की संभवतः सर्वाधिक सम्मान राशि वाला पुरस्कार इस बार कविता के खाते में आया. इफको ने 11 लाख रुपये का श्रीलाल शुक्ल स्मृति सम्मान जाने-माने कवि अष्टभुजा शुक्ल को देने की घोषणा की.

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Image caption हिंदी कविता के लिए ये शोक का साल भी रहा

हिंदी कविता के लिए यह शोक का भी साल रहा. पिछले कुछ वर्षों से कैंसर से जूझ रहे विलक्षण हिंदी कवि वीरेन डंगवाल ने आंखें मूंद लीं. पीछे छोड़ गए शोकाकुल प्रशंसकों और मित्रों का एक विराट समूह और कुछ बेहतरीन कविताएं जो हमेशा बनी रहेंगी.

उनके युवतर सखा पंकज चतुर्वेदी इन दिनों उन पर संस्मरणों की एक आत्मीय शृंखला लिख रहे हैं जो बतौर कवि और व्यक्ति वीरेन डंगवाल को कुछ और करीब से जानने का मौका देती है.

पिछले ही दिनों जेएनयू के परिसर को बरसों से अपना घर बनाए बैठे औघड़ कवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ भी चल दिए. अक्सर उन्हें संभालने, उनकी कविताएं सहेजने और छपवाने और कभी-कभार उनकी उपेक्षा भी कर बैठने वाले जेएनयू ने अपने इस सगे विद्रोही का शोक मनाया .

और ये भी बताया कि सब कुछ तहस-नहस कर देने वाले इस दौर में भी विद्रोही औघड़ता का सम्मान- कम से कम एक परिसर में- बचा हुआ है.

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