जैन हवाला कांड से कैसे 'बेदाग़' छूटे आडवाणी?

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अपने वित्त मंत्री अरुण जेटली का बचाव करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले हफ़्ते (मंगलवार, 22 दिसंबर) उस जैन हवाला कांड को याद किया जिसके कारण दो दशक पहले भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान की चूलें हिल गई थीं.

क्रिकेट में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे जेटली के साथ मज़बूती के साथ खड़े होते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें लालकृष्ण आडवाणी की तरह ही “पवित्र” बताया और कहा कि जैसे आडवाणी जैन हवाला कांड के आरोपों से बेदाग़ निकल आए थे, उसी तरह डीडीसीए में भ्रष्टाचार के आरोपों से जेटली भी बेदाग़ निकल आएँगे.

नरेंद्र मोदी ने ये बयान कुछ इस तरह दिया जैसे आडवाणी अकेले राजनेता थे जो जैन हवाला कांड की अग्निपरीक्षा से खरे निकल कर आए हों. सच ये है कि इस कांड में उलझे काँग्रेस के विद्याचरण शुक्ल को भी दिल्ली हाईकोर्ट ने आडवाणी की तरह ही बाइज़्ज़त बरी किया था.

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उनके बाद अर्जुन सिंह, शरद यादव, मदनलाल खुराना, नारायण दत्त तिवाड़ी सहित एक के बाद एक सभी नेता बरी कर दिए गए.

पर क्या था जैन हवाला कांड और कैसे आडवाणी इससे “बेदाग़” छूटे?

क्या सीबीआई की जाँच में अंतिम तौर पर साबित हो गया था कि जिन नेताओं और अफ़सरों के नाम जैन डायरियों में दर्ज थे उन्होंने एसके जैन से पैसा नहीं लिया था?

क्या सीबीआई इस सवाल का जवाब तलाश पाई कि एसके जैन नाम के उद्योगपति और उनके भाइयों को आख़िर ऐसी डायरियाँ बनाने की ज़रूरत ही क्यों पड़ी जिनमें एक ख़ास रक़म के सामने ख़ास नाम दर्ज था और कुल 64 करोड़ का भुगतान उन लोगों को किया गया?

क्या सीबीआई ने सभी 115 अभियुक्तों की अलग अलग जाँच करके ये पता करने की कोशिश की कि उनके बैंक खातों में से डायरी में दर्ज तारीख़ के आसपास कितनी रक़म आई या गई?

क्या अभियुक्तों के धन-जायदाद की बारीक जाँच करके पता किया गया कि उसमें कोई बढ़ोत्तरी तो नहीं हुई है?

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क्या जाँच एजेंसियों ने ये पता करने की कोशिश की कि कश्मीरी चरमपंथियों को मिलने वाला पैसा जिस स्रोत से आया, उसी स्रोत से आई दूसरी रक़म किस किस को मिली और कहाँ इस्तेमाल हुई?

हवाला कांड उजागर होने के 22 बरस बाद भी ये सभी सवाल आज भी अनुत्तरित हैं.

सच तो ये है कि सीबीआई हवाला कांड की जाँच करने को तैयार ही नहीं थी. उसने पहले जैन डायरियों को दबाने की कोशिश की. लेकिन जनसत्ता अख़बार में छपने के बाद जब मामला सामने आया तो एजेंसी ने डायरियों को पहले सबूत के तौर पर पेश ही नहीं किया.

सुप्रीम कोर्ट की लताड़ के बाद उसने जाँच शुरू भी की तो अनचाहे मन से.

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सुप्रीम कोर्ट सीबीआई को घोड़े की तरह खींच कर पानी के पास तो ले आया लेकिन पानी पीने पर उसे फिर भी मजबूर नहीं कर सका क्योंकि इस कांड में वामपंथी पार्टियों को छोड़कर लगभग सभी पार्टियों के नेताओं के शामिल होने का आरोप लगा था.

आज से 22 बरस पहले जनसत्ता अख़बार में हमने सबसे पहले जैन हवाला कांड की ख़बर को विस्तार से उजागर किया था.

ख़बर एक लाइन में ये थी कि सीबीआई दो साल से उद्योगपति एसके जैन की ऐसी विस्फोटक डायरियों को दबाए बैठी है जिसमें कई वरिष्ठ सांसदों, मंत्रियों और बड़े अफ़सरों को कथित तौर पर कुल 64 करोड़ रुपए की रिश्वत दिए जाने का ब्यौरा दर्ज है.

जिस तरह आज भी कई सनसनीख़ेज़ ख़बरों का उदगम डॉक्टर सुब्रह्मण्यम स्वामी बनते हैं (मसलन नेशनल हेरल्ड केस), वैसे ही 22 साल पहले 29 जून, 1993 को दिल्ली की एक तपती दोपहर को उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी को अपने निशाने पर ले लिया.

एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके उन्होंने ये बयान जारी किया, “मैं ये साबित कर दूँगा कि एक दलाल और हवाला कारोबारी सुरेंद्र जैन ने 1991 में लालकृष्ण आडवाणी को दो करोड़ रुपए दिए. जैन उस जाल से जुड़ा था जो विदेशी धन को यहाँ ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से रुपए में बदल कर कश्मीर के अलगाववादी संगठऩ जेकेएलएफ़ की मदद करता था.”

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ये जैन हवाला कांड की शुरुआत थी. तब टेलीविज़न कैमरे आज की तरह दिल्ली के चप्पे चप्पे पर नज़र नहीं आते थे. और अख़बारों ने डॉक्टर स्वामी के इस बयान को ज़्यादा तवज्जो नहीं दी.

सिर्फ़ 30 जून के जनसत्ता अख़बार में दो पैराग्राफ़ की ख़बर सुब्रह्मण्यम स्वामी के हवाले से छपी. उसे पढ़कर हमने डॉक्टर स्वामी को फ़ोन किया. उन्होंने मुलाक़ात का समय तो दिया लेकिन जैन डायरियों के बारे में कोई जानकारी देने से इंकार कर दिया, सिर्फ़ इतना कहा कि साउथ एक्सटेंशन में रहने वाले एसके जैन (हवाला कांड के सुरेंद्र कुमार जैन नहीं) और सीबीआई के डीआइजी ओपी शर्मा के पास जानकारी हो सकती है.

ओपी शर्मा के ज़िम्मे हवाला कांड के दो अभियुक्तों – अशफ़ाक़ हुसैन लोन और शहाबुद्दीन ग़ौरी – की जाँच की ज़िम्मेदारी थी. दिल्ली पुलिस ने जाल बिछाकर 25 मार्च, 1991 को एक अशफ़ाक़ हुसैन लोन नाम के एक कश्मीरी युवक को पकड़ा और उसके पास से पचास हज़ार रुपए नक़द, साढ़े पंद्रह लाख रुपए के ड्राफ़्ट और कश्मीरी अलगाववादी संगठन हिज़बुल मुजाहिदीन के कमांडरों के नाम तीन चिट्ठियाँ बरामद करने का दावा किया.

पुलिस ने कहा कि ये सब चीज़ें लोन को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के एक रिसर्च स्कॉलर शहाबुद्दीन ग़ौरी ने दी थीं. लोन के बाद अप्रैल 1991 को ग़ौरी को भी आतंकवाद विरोधी क़ानून के तहत गिरफ़्तार कर लिया गया.

अधिकारियों ने दावा किया कि इन दोनों से पूछताछ के बाद सुरेंद्र कुमार जैन नाम के बड़े व्यापारी की भूमिका सामने आई और जब उनके घर पर छापा मारा गया तो वहाँ से 58 लाख रुपए नक़द, दो लाख रुपए के बराबर डॉलर, 15 लाख के इंदिरा विकास पत्र, दो डायरियाँ और एक नोटबुक बरामद हुई.

इन्हीं को बाद में जैन हवाला डायरियों के नाम से जाना गया.

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Image caption लाल कृष्ण आडवाणी के साथ साथ हवाला केस में विद्याचरण शुक्ल भी बेदाग़ निकले.

अधिकारियों ने दावा किया कि इन छापों से हवाला कारोबार का एक बड़ा तानाबाना सामने आया और पता चला कि जिस स्रोत से विदेशों से लाई गई रक़म कश्मीरी चरमपंथियों को पहुँचाई जा रही थी, उसी स्रोत से लाया गया धन लालकृष्ण आडवाणी, विद्याचरण शुक्ल, अर्जुन सिंह, नारायणदत्त तिवाड़ी सहित दर्जनों महत्वपूर्ण नेताओं और बड़े अफ़सरशाहों तक भी पहुँचाया जा रहा था.

उधर शहाबुद्दीन ग़ौरी की गिरफ़्तारी के दो महीने बाद ही सीबीआई के डीआईजी ओपी शर्मा से इस जाँच की ज़िम्मेदारी ड्रामाई तौर छीन ली गई. फिर उनके घर पर छापा मारकर सीबीआई के अधिकारियों ने उन्हें एसके जैन के एक आदमी से रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ने का दावा किया. उन्हें सस्पेंड कर दिया गया.

ज़ाहिर है ओपी शर्मा नाराज़ थे और इस नाराज़ अफ़सर को ये पता था कि सुरेंद्र कुमार जैन के घर से बरामद हुई विस्फोटक डायरियों में किस किस राजनीतिक हस्ती का नाम दर्ज है. विस्फोटक तैयार था, बस उसमें पलीता लगने भर की देर थी.

तब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री थे और कमल मोरारका कार्मिक मंत्री. जैन डायरियाँ मिलने के बाद हवाला और कश्मीरी अलगाववादियों और नेताओं-अफ़सरों की जाँच करने की बजाए सीबीआई ने पूरे मामले को रफ़ा दफ़ा करने की कोशिश की और छापे में बरामद डायरियाँ और दूसरी चीज़ें सीबीआई के मालख़ाने में जमा करवा दी गईं.

पूरे दो साल बाद इस मामले में तब फिर जान आई जब डॉक्टर सुब्रह्मण्यम स्वामी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि हवाला कारोबारी ने लालकृष्ण आडवाणी को दो करोड़ रुपए दिए.

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इस सूत्र को पकड़ कर ओपी शर्मा से संपर्क किया गया और 17 अगस्त, 1993 को जनसत्ता में डायरियों के हवाले से ख़बर दी गई. इस बात पर अख़बार में पहले असमंजस की स्थिति थी कि डायरियों में दर्ज नेताओं के नाम छापे जाएँ या न छापे जाएँ.

लेकिन फिर ये महसूस किया गया कि नेताओं और अफ़सरों के नाम के बिना ख़बर बेअसर हो जाएगी. जनसत्ता में एक हफ़्ते की उहापोह के बाद आख़िरकार 24 अगस्त, 1993 को पहले पन्ने पर इस ख़बर को छापा गया.

कुछ ही दिन बाद वकील राम जेठमलानी ने अपने घर पर एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस की लेकिन उनका ज़ोर लालकृष्ण आडवाणी की बजाए अर्जुन सिंह का नाम सामने लाने पर था. इस प्रेस कॉन्फ़्रेंस में सीबीआई डीआईजी ओपी शर्मा भी मौजूद थे और वहीं ऐलान किया गया कि हवाला कांड के मामले में अदालत का दरवाज़ा खटखटाया जाएगा.

अक्तूबर 1993 में जब सुप्रीम कोर्ट में अर्ज़ी दी गई तो मामले को दबाए रखने के लिए सीबीआई को कोर्ट ने कड़ी फटकार सुनाई और उद्योगपति एसके जैन की गिरफ़्तारी के आदेश दिए गए. इसके बाद मार्च 1994 को जैन को गिरफ़्तार किया गया उन्होंने सीबीआई को 29 पेज का बयान दिया जिसमें उन्होंने बताया कि किन किन लोगों को उन्होंने पैसा दिया और किन परिस्थितियों में भुगतान किया गया.

इस बयान को सीबीआई ने अदालत में सबूत के तौर पर पेश किया.

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इसी बयान में जैन ने सीबीआई को इतालवी व्यापारी ऑतोवियो क्वात्रोक्की से अपनी मुलाक़ात की बात भी बताई थी. उन्होने कहा कि वो 1982 में क्वॉत्रोक्की से मिले थे और उनके ज़रिए ऊर्जा सेक्टर के 4,000 करोड़ रुपए के ठेके हासिल करना चाहते थे.

उन्होंने ये भी कहा कि वो रिलायंस के धीरूभाई अंबानी की तरह धनी संपन्न होना चाहते थे.

इन डायरियों में 115 नाम थे जिनमें से 92 नामों की पहचान कर ली गई थी. इनमें से 55 नेता, 23 अफ़सर और कम से कम तीन पत्रकार थे. डायरियों के मुताबिक़ फ़रवरी 1988 से मार्च 1991 तक कुल 64 करोड़ रुपए का भुगतान अलग-अलग लोगों को किया गया था.

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इन सबूतों के आधार पर सीबीआई ने 16 जनवरी 1996 को सबसे पहले दो नेताओं के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर की – भारतीय जनता पार्टी के लालकृष्ण आडवाणी और काँग्रेस के विद्याचरण शुक्ल. बाद में 25 और नेताओं के ख़िलाफ़ चार्जशीट दाख़िल की गई.

आडवाणी पर 60 लाख रुपए लेने और शुक्ला पर 39 लाख रुपए लेने का इल्ज़ाम लगाया गया था.

चार्जशीट दाख़िल होते ही 16 जनवरी, 1996 को लालकृष्ण आडवाणी ने लोकसभा से इस्तीफ़ा देने की घोषणा कर दी और कहा कि इस मामले से साफ़ बरी होने तक वो चुनाव नहीं लड़ेंगे.

इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को घोड़े की तरह खींचकर पानी के पास तो ले आई लेकिन पानी पीने पर मजबूर फिर भी नहीं कर पाई.

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तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा ने कई बार सीबीआई के अफ़सरों को लताड़ पिलाई और यहाँ तक कि सरकार के दबाव से मुक्त करने के लिए सीबीआई अफ़सरों को सीधे कोर्ट के निर्देश में काम करने का हुक्म दिया.

हिचकोले खाती जाँच अनमने ढंग से चलती रही मगर आख़िरकार 8 अप्रैल 1997 को हाईकोर्ट के न्यायाधीश मोहम्मद शमीम ने अपना फ़ैसला सुनाया. लालकृष्ण आडवाणी और काँग्रेस के विद्याचरण शुक्ल को साफ़ बरी कर दिया.

पर क्या जाँच एजेंसी और अदालत इस नतीजे पर पहुँची थी कि दोनों नेताओं ने सुरेंद्र कुमार जैन से पैसा नहीं लिया था?

क़तई नहीं. ये साबित करने या न करने की नौबत बाद में आती, पर कोर्ट ने डायरियों को बुक ऑफ़ अकाउंट यानी पक्के खाते मानने से इनकार कर दिया. यानी ये डायरियाँ सबूत के तौर पर स्वीकार ही नहीं की गईं.

भारतीय साक्ष्य क़ानून के मुताबिक़ बिज़नेस के काम के लिए लगातार अपडेट किया जाने वाले पक्के खातों को सबूत के तौर पर स्वीकार किया जा सकता है. पर जस्टिस शमीम का कहना था, “काग़ज़ों के ऐसे पुलिंदे को, जिसमें एक मिनट में काग़ज़ निकाले या जोड़े जा सकते हों, पक्का खाता नहीं कहा जा सकता.”

हाईकोर्ट के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सीबीआई ने अपनी तरह से खानापूरी की और सुप्रीम कोर्ट में अपील की. मगर उसका नतीजा कुछ नहीं निकला.

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सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की अपील को ये कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि जाँच ऐजेंसी ऐसे कोई स्वतंत्र सबूत पेश नहीं कर पाई जिससे ये सिद्ध होता हो कि जैन बंधुओं की ओर से दी गई रक़म उन लोगों ने दरअसल स्वीकार की जिनके नाम डायरियों में दर्ज हैं.

इस फ़ैसले के बाद बाक़ी सभी नेता भी एक के बाद एक करके बरी हो गए और 'पवित्र' साबित हुए.

लालकृष्ण आडवाणी भी इन्हीं 'बेदाग़' और 'पवित्र' लोगों में शामिल थे.

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