'बिना स्वेटर के सर्दी काट रहे हैं रामलला'

अयोध्या में जिस परिसर में दिसंबर 1992 से पहले बाबरी मस्जिद खड़ी थी, वहाँ अब टेन्ट के भीतर विराजमान रामलला के लिए सर्दी के दिनों में स्वेटर और रज़ाई मुहैया कराने की अर्ज़ी दी गई है.

मुख्य पुजारी सत्येंद्र दास ने सरकार से बालक राम के लिए स्वेटर और रज़ाई की व्यवस्था कराने को कहा है.

उनकी शिकायत प्रशासन से है कि सर्दियाँ बीतने को हैं, पर रामलला को गर्म कपड़े मुहैया नहीं करवाए गए हैं.

मुख्य पुजारी ने कमिश्नर के छुट्टी पर होने के कारण जिलाधिकारी अनिल ढींगरा को रामलला के लिए ये व्यवस्था कराने हेतु एप्लीकेशन दी है.

साथ ही यह भी कहा है कि रामलला अपने कपड़ों के लिए किसी दान के मोहताज नहीं हैं, चढ़ावे से होने वाली आमदनी पर्याप्त है.

मुख्य पुजारी सत्येंद्र दास बताते हैं कि यह नौबत विश्व हिंदू परिषद के संरक्षक स्व. अशोक सिंघल के कारण आई वरना पहले भक्त ही भगवान के लिए कपड़े दे जाते थे.

आचार्य सत्येंद्र दास ने कहा, “पहले बर्तन, कपड़े, गहने सब चढ़ावे में आते थे लेकिन 2002 में स्व. अशोक सिंघल, सांसद श्रीशचंद्र दीक्षित (जो यूपी के पुलिस महानिदेशक भी रहे थे) के साथ परिसर में जबरदस्ती घुस आए और वहीं प्रेस कांफ्रेन्स करने की कोशिश की, जिसका विरोध हुआ. उस घटना के बाद प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था और चौकस कर दी. उसी के साथ नकदी के अलावा किसी और चढ़ावे पर रोक लगा दी गई.”

मुख्य पुजारी ने कहा, “अक्सर सिंघल मुझसे फोन करके अपने भेजे दर्शनार्थियों को रामनामी दुपट्टा और प्रसाद देने के लिए कहते थे, लेकिन मैं असमर्थ था. मना करना पड़ता था क्योंकि प्रशासन ने ऐसा कोई प्रावधान नहीं किया था, न इसके लिए फंड था.”

यहां केवल रामलला के सोने जागने, भोग-राग की ही फिक्र नहीं की जाती, बल्कि उनकी तरफ से अदालत में केस की पैरवी भी की जाती है.

1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने से पहले आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद कहते थे कि रामलला ताले में बंद हैं, उनकी जन्मभूमि को मुक्त कराया जाना चाहिए.

अब कह रहे हैं कि भगवान टेन्ट में रह रहे हैं, उनका भव्य मंदिर बनना चाहिए.

यह आस्था की भाषा है जिसमें सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी ईश्वर के लिए आदमी जैसे सुख-दुख का बहुत ख़्याल रखा जाता है.

इसी भाषा में कहा जाए तो इन दिनों जब हिंदू संगठन मंदिर बनाने के लिए सियासत गरमा रहे हैं, तो रामलला अधिगृहीत परिसर में टेन्ट के नीचे बिना स्वेटर के सर्दी में ठिठुर रहे हैं.

सर्दी शुरू होते ही सरकार द्वारा नियुक्त मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास ने रामलला के लिए गरम कपड़ों और रज़ाई की मांग की थी.

बीते 20 दिसम्बर को जब पर्यवेक्षक जज एसके सिंह और टीएस ख़ान परिसर में आए तो यह मसला उठा था.

अदालत में मंदिर की पैरवी करने वाले हरदयाल शास्त्री ने प्रभु को गरम कपड़े देने का प्रस्ताव किया तो मुख्य पुजारी ने यह कहते हुए मना कर दिया कि वे रिसीवर कमिश्नर सूर्य प्रकाश मिश्र की इजाज़त के बगैर वो दान स्वीकार नहीं कर सकते.

अंतत: हुआ ये है कि ईश्वर के बालरूप के लिए सरकारी कामकाज की धीमी चाल के कारण गरम कपड़ों का इंतजाम नहीं हो पाया है. विहिप जैसे संगठनों को भी परवाह नहीं लगती की इस अर्ज़ी पर अब तक कार्रवाई नहीं हुई है.

यहां अधिगृहीत परिसर में हर दिन औसतन 1500-2500 श्रद्धालु रामलला का दर्शन करने आते हैं और डेढ़ से तीन लाख के बीच प्रति माह नकद चढ़ावा आता है जो रामनवमी के महीने में बढ़कर आठ-नौ लाख तक पहुंच जाता है.

खज़ाने में करीब तीन करोड़ रूपए जमा हैं जिससे मुख्य पुजारी समेत नौ कर्मचारियों को मानदेय दिया जाता है, भोग-राग और दूसरी व्यवस्थाएं की जाती हैं. अभी साढ़े ग्यारह लाख खर्च कर रामलला के टेन्ट का नया तिरपाल लगाया गया है.

रामलला की देखरेख के लिए एक मुख्य पुजारी, चार सहायक पुजारी, दो अन्य सेवक, एक भंडारी और एक कोठारी नियुक्त किए गए हैं. पुजारी दो दो घंटे की शिफ्ट में पूजा कराते हैं. प्रशासन हर महीने मानदेय के रूप में 39,000 और भोग-राग के लिए 21,000 रूपये देता है.

मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास को नहीं लगता कि अयोध्या में विहिप के पत्थर मंगाने के बाद रामलला का दर्शन करने वालों की संख्या बढ़ी है.

उनकी अपनी राय है कि यह इतना बड़ा मसला नहीं है जितना इसे तूल दी जा रही है. वो मानते हैं कि विश्व हिंदू परिषद सिर्फ यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है- “अशोक सिंघल के न रहने से राममंदिर आंदोलन खत्म नहीं हो गया है.”

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