जहां बच्चों को बताते हैं मर्दानगी का मतलब

Image caption प्रेमनगर बस्ती

"घर में कुछ भी होता है तो स्त्रियों को उसका दोषी माना जाता है. लड़का पैदा नहीं हुआ, खाना जल्दी नहीं दिया, खाने में नमक ज़्यादा हो गया, कपड़े ढंग से नहीं धुले या खाना बनाने के लिए तेल ज़्यादा इस्तेमाल कर लिया, कभी कभी तो घर में उनके साथ हिंसा होती है."

यह पढ़ कर ऐसा लगता है कि स्त्रियों के अधिकारों और उन पर हो रहे शोषण के बारे में कोई भाषण दे रहा हो.

लेकिन चौंकिए नहीं. यह बातचीत पुणे के बिब्बेवाड़ी इलाके की प्रेमनगर बस्ती के 13-14 साल के कुछ लड़कों के बीच है, जो अपने अध्यापक के सवालों का जवाब दे रहे थे.

शाम के क़रीब 6.30 बज रहे हैं, 8-9 लड़के एक छोटे से कमरे में बैठे हुए हैं और लैंगिक समानता के विषय पर चर्चा कर रहे हैं.

ब्लैकबोर्ड पर एक पुरुष का चित्र चिपका हुआ है. बायीं तरफ की दीवार पर एक महिला का चित्र है और दायीं तरफ की दीवार पर महिला और पुरुष दोनों का चित्र है.

इन बच्चों के अध्यापक, 30 वर्षीय रमेश कोकाटे पूछते हैं, ''असुरक्षित शारीरिक सम्बन्ध कौन ज़्यादा बनाता है?''

Image caption छात्रों के साथ सफेद शर्ट में रमेश कोकाटे

सवाल के जवाब में तीन लड़के उठ कर पुरुष के चित्र के पास चले जाते हैं, एक लड़का स्त्री के चित्र के नीचे और चार लड़के स्त्री/पुरुष के चित्र के नीचे जाते हैं.

इन बच्चों से जब इसका कारण पूछा जाता है तो एक बच्चा कहता है, "पुरुष ज़्यादा असुरक्षित सम्बन्ध बनाते हैं क्योंकि वह शादी के बाद भी बाहर जाकर सेक्स करते हैं."

यह एक झलक है पुणे की एक बस्ती में हर गुरुवार को होने वाली एक कार्यशाला की, जहाँ बच्चों को स्त्री पुरुष संबंधों के बारे में समझाया जाता है.

रमेश बच्चों को बताते हैं, "समाज में मर्दानगी एक हव्वा बना हुआ है. हम लोग सोचते हैं कि महिलाओं को घर के अंदर रखना चाहिए और पुरुष जो चाहे कर सकता है."

फिर लड़कों से वो पूछते हैं कि मर्दानगी के बारे में उनके दोस्तों के बीच क्या सोच है और क्या बातचीत होती है?

Image caption अपनी मां के साथ शुभम कांबले

सोलह साल के शुभम कांबले कहते हैं, "लड़कियों को कमेंट मारना, छेड़ना, झगड़ा करना, गाली बकना और नशा करना मर्दानगी है."

करीब एक घंटे की इस कक्षा में रमेश इन बच्चों से लैंगिक समानता, समाज में पुरुष प्रधानता, घरेलू हिंसा जैसे विषयों पर सवाल करते हैं और फिर उनसे उनके जवाबों पर चर्चा करते हैं.

रमेश कहते हैं, "यहाँ हम इन्हें मानव अधिकार, लैंगिक समानता, रिस्क बिहेवियर के बारे में पढ़ाते हैं. इन बच्चों को लैंगिक समानता के प्रति जागरूक करना ही हमारी इस कार्यशाला का काम है."

वो बताते हैं कि हर गुरुवार यह कार्यशाला लगाई जाती है.

शुभम पिछले चार महीनों से इस लैंगिक समानता की कक्षा में आ रहे हैं. उनका परिवार 10 साल पहले उदगीर से पुणे में आकर बस गया था.

परिवार में उनके अलावा, उनके माता-पिता और बहन हैं. उनके पिता एक दिहाड़ी मज़दूर हैं और माँ आसपास के रिहाइशी इलाके में घर का काम करती हैं.

Image caption अपने घर के बाहर अभिषेक कांबले

सेना में जाने की मंशा रखने वाले शुभम से जब लैंगिक समानता के बारे में पूछा गया तो बोले, "स्त्रियों पर अत्याचार नहीं होने चाहिए, उन्हें पढ़ाई करनी चाहिए और इच्छानुसार रहना चाहिए."

शुभम की माँ उनके व्यवहार के बारे में कहतीं हैं, "पहले बहुत शैतान था, अब शांत हो गया है. मेरा सम्मान भी करने लगा है और अब घर के काम में भी थोड़ी-बहुत मदद करता है."

रमेश लड़कों से पूछते हैं, "क्या आपने कभी सोचा कि दोस्तों के कहने पर अगर हम किसी लड़की से छेड़खानी करते हैं तो उसका उस लड़की पर क्या असर होता है?"

लड़के जवाब में कहते हैं कि उस लड़की के बारे में लोग भला-बुरा कहते हैं और घरवाले भी बोलते हैं कि वह बाहर ही क्यों गई.

तेरह साल के अभिषेक कांबले कहते हैं, "लड़कियाँ बाहर ज़्यादा नहीं घूम सकतीं, उन्हें घर पर ही रहना पड़ता है. मगर मैं चाहता हूँ की मेरी बहनें पढ़ाई करें और बाहर जाकर नौकरी भी करें."

लेकिन जब अभिषेक से पूछा गया कि क्या वह शादी करने के बाद अपनी पत्नी को नौकरी करने देंगे, तो उन्होंने कहा, "नहीं. अगर मेरे पास नौकरी होगी तो वह क्यों बाहर काम करेगी? अगर दोनों बाहर रहेंगे तो घर कौन संभालेगा."

आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले अभिषेक पास के इलाके के एक अंग्रेज़ी माध्यम स्कूल के छात्र हैं जबकि उनकी दो बहनें मराठी माध्यम में पढ़ती हैं.

जब उनकी माँ से पूछा गया कि उन्होंने बेटियों का दाखिला अंग्रेज़ी माध्यम में क्यों नहीं कराया, तो वह कहती हैं, "यह सब फैसले अभिषेक के पिताजी के हाथ में होते हैं."

Image caption अपनी मां और बहन के साथ आशुतोष

वहीं आशुतोष नाम के छात्र पिछले चार महीने से इस कार्यशाला में आ रहे हैं. वो प्रेमनगर बस्ती में ही अपने माता-पिता के साथ रहते हैं.

उनके पिता पेशे से ड्राइवर हैं और माँ अस्पताल में काम करती हैं. उनसे जब लैंगिक समानता के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा, "हमारे समाज में स्त्रियों के साथ हमेश भेदभाव होता रहता है."

आशुतोष कहते हैं, "अगर वह नौकरी भी करती हैं, तो घर का हर काम उन्हें ही करना पड़ता है. लेकिन पुरुषों को यह सब काम नहीं करने पड़ते."

वो कहते हैं, "शादी होने के बाद स्त्रियों को मंगल सूत्र पहनना ही पड़ता है, बिंदी लगानी पड़ती है, यह सब उनके लिए समाज में अनिवार्य किया गया है. अगर महिलाएं यह न करें तो उन्हें सही नहीं समझा जाता. अगर लड़का नहीं पैदा होता तो उन्हें सताया जाता है, यह सब गलत है."

आशुतोष बताते हैं कि उनकी बड़ी बहन भी स्कूल जाती हैं. लेकिन स्कूल से आने के बाद भी वह घर के काम करती हैं.

वह कहते हैं, "मुझे बुरा लगता है कि मेरी बहन को स्कूल से आने के बाद भी काम करना पड़ता है जबकि मुझे ऐसा कभी नहीं करना पड़ता. लेकिन अब मैं उसकी मदद करता हूँ और वह जो बोलती है मानता हूँ."

आशुतोष के साथ जब उनके घर पहुंचे तो उनके घर में उनकी बहन चौके में काम कर रही थीं, पिताजी टीवी देख रहे थे और छोटा भाई बैठा हुआ था.

उनकी मां तब तक अस्पताल से नहीं लौटी थीं.

उनके लौटने पर जब उनकी माँ आशा कांबले से इस बारे में चर्चा की गई, तो उन्होंने कहा, "पहले यह मेरी बात नहीं सुनता था, उल्टा जवाब देता था. लेकिन अब, यह अपने सारे काम खुद कर देता है."

आशुतोष के माता-पिता अपनी बेटी अनिशा की भी तारीफ करते हुए कहते हैं, "हमारी बेटी जैसी कोई नहीं हैं. घर का सारा काम देखती है और स्कूल भी जाती है. खाना भी बहुत अच्छा बनती है."

पिछले छह साल से गैर सरकारी संगठन इक्वल कम्युनिटी फाउंडेशन पुणे की बस्तियों में रहने वाले 13 से 17 साल के लड़कों के बीच लैंगिक समानता के मुद्दे पर काम कर रही है.

इक्वल कम्युनिटी फाउंडेशन की प्रोग्राम मैनेजर अंजना गोस्वामी कहती हैं, "लैंगिक समानता और महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा को अगर खत्म करना है तो पुरुषों की भागीदारी होना बहुत ज़रूरी है."

वो आगे कहती हैं, "इसी वजह से हम छोटी उम्र के इन लड़कों को लैंगिक समानता के प्रति जागरूक करते हैं. ये बच्चे फिर अपनी खुद की राय बनाते हैं."

वो इसकी वजह बताती हैं, "अगर यह लैंगिक समानता के प्रति अभी सजग हो गए तो वो बेहतर भाई, पिता, पति और दोस्त बनेंगे जो महिलाओं को बराबरी का दर्जा देंगें."

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