नेट न्यूट्रेलिटी: अहम सवाल और उनके जवाब- 1

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नेट न्यूट्रेलिटी को लेकर फ़ेसबुक की चौतरफ़ा आलोचना हो रही है. जो लोग फ़ेसबुक के ख़िलाफ़ हैं, उनके मुताबिक़ फ़ेसबुक फ़्री बेसिक्स के ज़रिए नेट न्यूट्रेलिटी के मूल भाव का उल्लंघन कर रहा है.

वहीं फ़ेसबुक की मानें, तो उनका मक़सद लोगों को मुफ़्त इंटरनेट सेवा उपलब्ध कराना है.

पूरे मुद्दे से जुड़े अहम सवालों का पहला हिस्सा पढ़ें-

फ़्री बेसिक्स क्या है?

फ़ेसबुक की इंटरनेट डॉट ओआरजी (www.internet.org) पार्टनरशिप का यह मोबाइल ऐप अपने सहयोगी ऑपरेटर रिलायंस के ज़रिए कुछ चुनिंदा सर्विसिस को मुफ़्त इस्तेमाल की आज़ादी देता है.

रिलायंस का इस्तेमाल कर रहे लोग फ़ेसबुक समेत कुछ चुनिंदा वेबसाइट्स बिना किसी डेटा चार्ज के इस्तेमाल कर सकेंगे (इससे फ़्री बेसिक्स ज़ीरो रेटिंग प्लेटफॉर्म बन जाएगा).

फ़ेसबुक मीडिया प्रचार के ज़रिए इसे भारत में लागू करने के लिए पैरवी कर रहा है. कुछ का मानना है कि इस प्रचार पर फ़ेसबुक अब तक क़रीब 100 करोड़ रुपए ख़र्च कर चुका है.

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नेट न्यूट्रेलिटी क्या है?

सभी वेबसाइट्स और सर्विस के साथ एक जैसा बर्ताव किया जाना, यही नेट न्यूट्रेलिटी है.

सभी आईएसपी किसी का भी पक्ष न लें, न ही किसी ख़ास सर्विस-वेबसाइट्स या ऐप को ब्लॉक करें और हर तरह के कंटेंट के उपयोग की अनुमति दी जाए.

क्या फ़्री बेसिक्स नेट न्यूट्रेलिटी का उल्लंघन है?

फ़्री बेसिक्स कुछ चुनिंदा सेवाओं को बढ़ावा देगा. आशंका है कि उन सबके साथ भेदभाव होगा, जो उनकी पार्टनर सूची में नहीं होंगे (यानी फ़ेसबुक के प्रतिद्वंद्वी).

परिभाषा के अनुसार फ़्री बेसिक्स नेट न्यूट्रेलिटी का उल्लंघन है.

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लेकिन फेसबुक कहता है कि वह नेट न्यूट्रेलिटी का पक्षधर है

सभी लोग नेट न्यूट्रेलिटी के समर्थन में हैं. फ़ेसबुक, एयरटेल और अन्य ऑपरेटर सभी कहते हैं कि वो इसके समर्थन में हैं.

अगर वो ऐसा नहीं कहेंगे तो ये उनकी बेवकूफ़ी होगी. साथ ही वो यह भी कहते हैं ज़ीरो रेटिंग नेट न्यूट्रलिटी का उल्लंघन नहीं करता.

उनके अनुसार भारत को ज़ीरो रेटिंग की ज़रूरत है, जिससे लाखों लोगों को मुफ़्त इंटरनेट मुहैया कराया जा सके. साथ ही उनका कहना है कि 'कुछ भी नहीं से कुछ तो बेहतर है.'

क्या 'कुछ भी नहीं से कुछ तो बेहतर है'?

ये फेसबुक का कहना है. सेव द इंटरनेट (www.savetheinternet.in) के कार्यकर्ता इससे सहमत तो हैं, लेकिन उनका कहना है 'कुछ मिलता' है तो वो सस्ता या पूरी तरह मुफ़्त हो, भले ही उसकी स्पीड धीमी हो (कुछ ऑपरेटर यह सुविधा दे रहे हैं).

या फिर, दिन या हफ्ते में कुछ समय के लिए लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर पाएं. लेकिन 'ज़ीरो रेटेड' स्कीम के तहत केवल उन साइट्स को बढ़ावा देना जो फ़ेसबुक के पार्टनर हैं, ग़लत है.

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क्या फ़्री बेसिक्स अभी भी काम कर रहा है?

नेट न्यूट्रेलिटी के लिए लोगों की चिंताओं और विरोध के बाद दिसंबर 2015 में फ़्री बेसिक्स को ट्राई के निर्देश के बाद फिलहाल रोक दिया गया है.

ज़ीरो रेटिंग क्या है?

इसे टोल फ़्री डेटा या प्रायोजित डेटा भी कहते हैं. इसके तहत ऑपरेटर कुछ चुनिंदा ऐप्स या सर्विस के लिए आपको डेटा चार्ज नहीं करते.

एयरटेल ज़ीरो ऐसी ही स्कीम थी, जिसमें उपभोक्ता को फ़्लिपकार्ट और अन्य पार्टनर साइट्स के इस्तेमाल पर डेटा चार्ज अदा नहीं करना होता था.

फ़ेसबुक का फ़्री बेसिक्स भी ऐसा ही ज़ीरो रेटिंग प्लेटफ़ॉर्म है.

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