पानी की कमी दूर करना कंपनियों के बस में नहीं

अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनी मोन्डालीज़ का एक सेल्स एक्ज़िक्यूटीव महाराष्ट्र के एक गांव में घूम रहा है. धूप खिली हुई है और उसे यहां कैडबरी चॉकलेट की बिक्री को बढ़ाने का काम करना है.

लेकिन ऐसा करना उनके लिए चॉकलेट की तरह मीठा काम नहीं है.

लोगों को ललचाने के लिए इस गांव में 5 स्टार, पर्क और जेम्स जैसे चॉकलेट-बिस्कुट वाले कई बैनर लगे हैं.

जैसे ही वो दुकानदार आनंद तालेकर से बात करते हैं कि वो कैडबरी चॉकलेट को बेचें तो दुकानदार जवाब उनके उत्साह को कम करने वाला था.

Image caption आनंद तालेकर की दुकान

आनंद तालेकर गांव के बस स्टॉप पर एक दुकान चलाते हैं. यह दुकान आसपास के 5000 लोगों की पहुंच में है. लेकिन फिर भी वो वॉशिंग पावडर, शैम्पू, बेबी डाइपर, बिस्कुट और बालों को रंगने का डाई भी बहुत ज़्यादा नहीं बेच पाए हैं.

तालेकर अपने जीवन यापन के लिए स्थानीय लोगों की पर ही निर्भर करते हैं लेकिन इस साल वहां फ़सल अच्छी नहीं रही है और इसलिए बिक्री भी कम हो गई है. वो बताते हैं, "यहां की खेती संकट में है, बारिश नहीं होने के कारण किसान कोई भी फ़सल नहीं उगा पाए हैं. इससे दुकान से होने वाली मेरी कमाई में 35 फ़ीसदी की गिरावट आ गई है".

वो बताते हैं, मैं पैसे बचाने के लिए अब मोटरसाइकिल कि जगह सरकारी बस का इस्तेमाल करता हूं, मोबाइल फ़ोन पर कम बातें करता हूं".

तालेकर भी पहले खेती किया करते थे लेकिन कम उपज के कारण उन्होंने खेती छोड़ दी और पैसे कमाने के लिए कुछ सालों से दुकान चलाते हैं. उनके मां-बाप और पत्नी अब भी पास के ही गांव में खेतों में काम करते हैं.

उधर मोन्डालीज़ कंपनी के अधिकारी जो कि मुंबई के अपने दफ़्तर में बैठते हैं, वो तालेकर की चिंता को बड़े आकार में देखते हैं.

कंपनी के प्रबंध निदेशक चंद्रमौली वेंकटेशन कहते हैं, " भारत में ज़्यादातर कंपनियों के लिए ग्रामीण भारत में व्यापार का फैलाने का एक बड़ा मौक़ा है, इससे लंबे समय के लिए कंपनी का विकास हो सकता है. लेकिन हमारे लिए उन गांवों को पहचानना और प्राथमिकता तय करना सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है जिसके बाज़ार तक हमें पहुंचना है."

भारत के गांवों में 70 फ़ीसदी आबादी रहती है और यहा से देश को 50 फ़ीसदी जीडीपी हासिल होता है.

चंद्रमौली वेंकटेशन कहते हैं, हमने क़रीब 20,000 गांवों के लिए उच्च प्राथमिकता तय की है. इसने हमें अपने राजस्व को बढ़ाने और कम ख़र्च पर व्यापार का अवसर दिया है.

मोन्डालीज़ ने एकबार इन गांवों की पहचान कर वहां की दुकानों पर अपने चॉकलेट बांटने के बाद पाया कि गांवों से होने वाली कमाई और शहर की दुकानों से होनेवाली आय एक जैसी है.

लेकिन अब ऐसा कुछ भी नहीं है. कोई ताक़वर बहुराष्ट्रीय कंपनी भी पानी की कमी का समाधान नहीं ढूंढ सकती है.

भारत के मौसम विभाग ने हाल ही में कहा है कि भारत के 641 ज़िलों में से 309 ज़िले में इस साल कम बारिश हुई है. यह इलाक़ा भारत के आधे हिस्से के बराबर है और इससे लाखों लोग प्रभावित हुए हैं. मौनसून की इस कमी से लोगों को व्यापार में भी बड़ा नुक़सान हुआ है.

लोग ग़ैर ज़रूरी चीजों जैसे चॉकलेट और बिस्कुट पर तो कम खर्च कर ही रहे हैं, किसान भी अब अपने औजारों पर पैसे लगाने से पहले दो बार सोच रहे हैं.

भारत में कई किसान मोटरसाइकिस का इस्तेमाल करते हैं और औरसोसायटी ऑफ़ ऑटोमोबाइल मैनुफ़ैक्चरर के मुताबिक़ पिछले साल के मुक़ाबले इस साल सितंबर तक पांच महीनों के दौरान मोटरसाइकिल की बिक्री में 4.6 फ़ीसदी की गिरावट आई है.

दूसरी तरफ दुनिया की बड़ी ट्रैक्टर निर्माताओं में एक महिन्द्रा ट्रैक्टर्स का कहना है कि इस साल ट्रैक्टर की बिक्री 6 फ़ीसदी बढ़ने की जगह, असल में 5 फ़ीसदी कम हो जाएगी.

लेकिन मॉनसून की कमी के अलावा भी कंपनियों के सामने और भी कई चुनौतियां हैं. कंपनियां अक्सर छोटे शहरों और गांवों में अपने प्रोडक्ट को लेकर लोगों को जागरूक करने का अभियान चलाती हैं.

गांवों में लोग ज़्यादा सामान ख़रीदकर एकबार में ही ज्यादा पैसे ख़र्च नहीं करते हैं और वहां कम क़ीमत के छोटे पैकेट्स जल्दी बिक जाते हैं.

फ़्यूचर ग्रूप के देवेन्द्र चावला कहते हैं कि कंपनियों को गांवों और शहरों के लिए अलग रणनीति बनाने की ज़रूरत है. उनके मुताबिक़, आप हर साल ग्रामीण भारत में विस्तार की उम्मीद नहीं कर सकते, अगर वहां सूखे की समस्या है और लोगों के ख़रीदने की क्षमता कम हो गई है तो बड़ा बाज़ार होने के बाद भी गांवों की क्षमता लंबे समय तक क़ायम नहीं रह सकती."

उधर सितंबर तक पिछले तीन महीनों में भारत का कृषि विकास केवल 2.2 फ़ीसदी की दर से बढ़ा है और इसे लेकर चिंता बनी हुई है.

ख़ैर महाराष्ट्र के उसी गांव की ओर लौटते हैं... यहां निर्मला तालेकर ने अपने बच्चों को दूध देना और नए कपड़े ख़रीदना बंद कर दिया है. अब वो अपने जर्जर खेत से खास फूस को साफ़ करती है और उसका पति एक कारख़ाने में काम करने लगा है ताकि सूखे से प्रभावित अपनी आय को बढ़ा सके.

इसी गांव के एक किसान बबन महान्गले ने कहा, " हमें बहुत ही ज़रूरी चीज़ों के सहारे रहना है, फ़िलहाल तो हम अपने बच्चों के स्कूल की फ़ी देने के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं."

यानि भारत में व्यापार करनेवाले भले ही देशभर में उपभोग के बढ़ने का इंतज़ार कर रहे हों, लेकिन अभी भी कई किसानों की चिंता ख़त्म होती नहीं दिख रही है.

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