'कैप मनुवादी है और पेन है बहुजन'

इमेज कॉपीरइट BAMCEF

कहां बामसेफ़ के संस्थापक सदस्य कांशी राम के पास एक समय अपनी साइकिल में हवा भरवाने के लिए पांच पैसे नहीं थे. ठंड से बचने के लिए दिल्ली में श्मशान के पास उन्हें पचास रुपये में किसी का पहना हुआ कोट खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ा था.

संस्था को स्थापित करने के क्रम में वह ट्रेन के अनारक्षित डिब्बों में सफ़र करते थे, थैले में चप्पलों का तकिया बना कर भूखे पेट सोना पड़ा था उन्हें कई बार और बहुजन समाज को संगठित करने के लिए हज़ारों किलोमीटर पैदल और साइकिल पर गली-गली की खाक़ छाननी पड़ी थी.

उसी बामसेफ (बैकवर्ड एंड माइनॉरिटीज़ एमप्लाइज़ कम्यूनिटीज़ फेडरेशन) ने नागपुर में दिसंबर के आख़िरी सप्ताह (25 से 29 दिसंबर) में अपना 32वां सम्मेलन आयोजित किया.

Image caption बामसेफ के संस्थापकों में से एक कांशीराम

28 एकड़ में फैला 'राष्ट्रीयता ज्योतिबा फूले सामाजिक क्रांति' परिसर, बामसेफ की अपनी संपत्ति है.

इस परिसर को संगठन के लोग कार्यकर्ता एवं नेतृत्व के त्याग की निशानी के तौर पर भी देखते हैं. परिसर के निर्माण के लिए अनेक सदस्यों ने अपनी तनख़्वाह दान में दी तो कुछ ने क़र्ज़ तक लिया.

लोगों का मानना है कि हालांकि पिछले 37 वर्षों में इसके सांगठनिक ढांचे में कई बदलाव हुए हैं फिर भी आज देश में यही एकमात्र ग़ैर राजनीतिक, ग़ैर अनशनात्मक एवं ग़ैर धार्मिक संगठन है जो 1978 में अपनी औपचारिक स्थापना के बाद से लगातार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ी जातियों तथा धर्मान्तरित अल्पसंख्यक समाजों के सरकारी कर्मचारियों को संगठित करने में लगा हुआ है.

इमेज कॉपीरइट BAMCEF

संस्था में कई लोग ‘संरचनात्मक राष्ट्रवाद’ की झलक देखते हैं.

जीवन के 70 से ज़्यादा वसंत देख चुके कार्यकर्ता बड़े उत्साह से बताते हैं कि कैसे कांशीराम– जो संस्था के संस्थापकों में से एक थे – कैडर कैंपों और जनसभाओं में भारतीय समाज को क़लम की तरह मानते थे. कैप वाले खड़े पेन की उपमा देकर वो बताते थे कि पेन का कैप 15 प्रतिशत मनुवादियों को इंगित करता है जिन्होंने 85 प्रतिशत बहुजनों को धन, धरती, सत्ता आदि से वंचित कर दिया है.

वह कहते थे कि मनुस्मृति के आधार पर श्रेणीबद्ध असमान सामाजिक व्यवस्था तैयार की गई जिससे बहुजन समाज को छह हज़ार जातियों में विखंडित कर दिया गया.

इमेज कॉपीरइट PTI

कांशी राम ने कैडर से 'पे बैक टू सोसाइटी' के तहत अपील की थी कि अगर उन्हें अपना उत्थान करना है तो मनुवादी सामाजिक व्यवस्था को तोड़ना ज़रूरी है.

बामसेफ के साथ-साथ डीएस-4 के तले 1981 से सामान्य बहुजनों को संगठित करने का काम शुरू किया गया.

फिर साल 1984 में कांशी राम ने फैसला लिया कि 'राजनीतिक सत्ता ऐसी चाभी है जिससे सभी ताले खोले जा सकते हैं'.

बामसेफ के कई संस्थापक सदस्य कांशी राम के चुने रास्ते से अलग हो गए.

बामसेफ के एक अन्य संस्थापक सदस्य डीके खार्पडे ने इसकी कमान संभाली और कर्मचारी आंदोलन जारी रहा.

इमेज कॉपीरइट BAMCEF

खार्पडे ने बामसेफ आंदोलन को 'बहुजन' पहचान के साथ-साथ 'मूल निवासियों' से भी जोड़ने की कोशिश की.

मूल निवासी संकल्पना यह बताती है कि, ‘मनुवादी ही आर्य-आक्रान्ता है जिन्होंने यहां के 'मूलनिवासियों' को छल से सत्ता-संसाधन से वंचित कर दिया है. उनके आगमन से पहले ‘मूल निवासी’ इस भारतभूमि के स्वामी हुआ करते थे’.

अत: अगर मूलनिवासी समाज को न्याय दिलाना है तो तो फुले-अंबेडकरी विचारधारा के आधार पर मनुवादी सामाजिक संरचना का विखंडन करना होगा.

आज संस्था अपने विचारों के विस्तार के लिए पांच भाषाओं- हिंदी, अंग्रेज़ी, मराठी, पंजाबी एवं गुजराती भाषा में समाचार पत्र निकालती है. संस्था का अपना प्रकाशन विभाग भी है.

हालांकि बामसेफ़ तेज़ी से फैल रहा है लेकिन बहुजन समाज में फैली निर्धनता, असाक्षरता, धार्मिक विश्वास, ग्रामीण परिवेश में सवर्ण समाज पर आश्रय आदि के बीच यह धर्मनिरपेक्ष, तार्किक, एवं प्रजातांत्रिक आंदोलन सामाजिक एवं संरचनात्मक क्रांति जाने में कितना सफल होगा यह तो समय ही बताएगा.

(यह लेखक के निजी विचार हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार