क्या वाकई गुमराह कर रहा है फ़ेसबुक?

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फ़्री बेसिक्स और नेट न्यूट्रेलिटी से जुड़े सवालों की पहली कड़ी में हमने आपको फ़्री बेसिक्स, नेट न्यूट्रेलिटी और फ़ेसबुक के पक्ष के बारे में बताया था.

इस दूसरे और अंतिम भाग में पढ़ें ज़ीरो रेटिंग का नेट न्यूट्रेलिटी पर असर, फ़्री बेसिक्स पर रोक की संभावना और भारत में फ़ेसबुक की साझेदारी और उसकी पहुँच जैसे सवालों के जवाब.

नेट न्यूट्रेलिटी-1: अहम सवाल और उनके जवाब

ज़ीरो रेटिंग नेट न्यूट्रेलिटी का उल्लंघन है?

यही प्रश्न पूरे विवाद की जड़ है. फ़ेसबुक और एयरटेल जैसे ऑपरेटर कहते हैं कि वो नेट न्यूट्रेलिटी के पक्षधर हैं. साथ ही उनका कहना है कि ज़ीरो रेटिंग नेट न्यूट्रेलिटी का उल्लंघन नहीं करता.

अगर नेट न्यूट्रेलिटी की परिभाषा पर ग़ौर करें तो वह कहती है, 'सभी साइट्स और सर्विस के साथ समान बर्ताव होना चाहिए'.

वहीं ज़ीरो रेटिंग इसका उल्लंघन करता है. भले ही ऑपरेटर कुछ साइट्स या प्रतिस्पर्धी सेवाओं की स्पीड न भी कम करें लेकिन इनकी पार्टनर कंपनियों को ख़ास लाभ दिया जाएगा.

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फ़ेसबुक ने किस भारतीय ऑपरेटर के साथ साझेदारी की है?

फ़ेसबुक ने फ़्री बेसिक्स के लिए रिलायंस कम्यूनिकेशन से साझेदारी की है, जो फिलहाल ट्राई के निर्देश के बाद होल्ड पर है. मगर फ़ेसबुक दूसरे ऑपरेटरों को भी आज़मा रहा है.

अग़र आप एयरटेल पर फ़ेसबुक का इस्तेमाल करते हैं, तो उस पर 'फ़्री फ़ेसबुक ऑन एयरटेल' नाम का एक संदेश देखेंगे.

लेकिन अगर आप फ़ेसबुक में ही किसी बाहरी लिंक जैसे यूट्यूब के किसी वीडियो पर क्लिक करते हैं, तो वो आपको दिखाएगा कि आप 'मुफ़्त ज़ोन' छोड़कर जा रहे हैं और इसके लिए आपसे शुल्क वसूला जाएगा. यही है ज़ीरो रेटिंग समझौता.

भारत में फ़ेसबुक कितना बड़ा है?

अक्तूबर 2015 में टीएनएस नाम की कंपनी ने सर्वे किया. इसके मुताबिक़ जून 2015 तक भारत में 30 करोड़ लोग मोबाइल से इंटरनेट इस्तेमाल कर रहे थे.

इसमें से 56 फ़ीसद रोज़ व्हाट्स ऐप और 51 फ़ीसद हर दिन फ़ेसबुक का इस्तेमाल करते हैं.

ऐसे में फ़ेसबुक और व्हाट्स ऐप (यह भी फ़ेसबुक के अधीन है) भारत में इंटरनेट इस्तेमाल करने का एक अहम ज़रिया हैं.

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क्या फ़्री बेसिक्स पर प्रतिबंध लगना चाहिए. क्या कोई विकल्प है?

लोकतंत्र में हर चीज़ पर प्रतिबंध लगाना ठीक नहीं है. बेहतर विकल्प यह होगा कि इस पर निगरानी रखी जाए ताकि तकनीकी अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके.

साथ ही बाज़ार में मौजूद दूसरे सेवा प्रदाताओं को भी इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने की आज़ादी हो, ताकि प्रतिस्पर्धी माहौल बन सके.

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फ़ेसबुक का दावा है कि उसके समर्थन में लाखों लोगों ने ट्राई को लिखा है.

ट्राई के चेयरमैन ने 31 दिसंबर को कहा था कि उन्हें फ़्री बेसिक्स के समर्थन में 14 लाख फ़ेसबुक यूज़र्स की टिप्पणियां मिली हैं लेकिन ''यह वो नहीं था, जिसके लिए ट्राई ने कहा था.''

उसने डिफ़रेंशियल प्राइसिंग के बारे में पूछा था और इस पर लोगों की राय लेने के लिए उन्हें और वक़्त दिया गया. मगर ये 14 लाख टिप्पणियां ट्राई तक कैसे पहुँचे?

दिसंबर के मध्य में फ़ेसबुक ने फ़्री बेसिक्स के लिए समर्थन जुटाना शुरू किया था.

इसके बाद उसने एक ही क्लिक पर अपने साढ़े 12 करोड़ यूज़रों (यहां तक कि अमरीका में भी) को पहले से लिखा एक ईमेल ट्राई को भेजने को कहा, जिसमें 'भारत में डिजिटल समानता और फ़्री बेसिक्स' के समर्थन की बात कही गई थी.

कई का कहना है कि वो डिजिटल समानता के हिमायती हैं, इसलिए उन्होंने बिना अच्छी तरह पढ़े-समझे कि वो किसका समर्थन कर रहे हैं, 'सेन्ड' बटन दबा दिया.

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इसके बाद फ़ेसबुक की इस अभियान के लिए आलोचना शुरू हो गई. आलोचकों ने उसे अपने यूज़रों को गुमराह करने का आरोप लगाया.

इसमें उन्होंने उनका ज़िक्र भी किया जिन्होंने यही मेल भाषा बदलकर भेजा था और कहा था कि वो फ़्री बेसिक्स का समर्थन नहीं करते.

कौन लोग फ़्री बेसिक्स के ख़िलाफ़ हैं और क्यों?

कई नागरिक संगठन इसका विरोध कर रहे हैं. सेव द इंटरनेट संगठन प्रमुखता से इसका विरोध कर रहा है.

इसके अलावा इंटरनेट डेमोक्रेसी प्रोजेक्ट (www.internetdemocracy.in) और पेटीएम जैसी निजी कंपनियां भी इसके ख़िलाफ़ हैं.

ज़ोमेटो के संस्थापक दीपेंद्र गोयल ने ट्वीट कर कहा, "फ़ेसबुक अपने प्लेटफ़ॉर्म का ग़लत इस्तेमाल कर लोगों को भ्रमित कर रहा है. अगर वो सरकार को फ़्री बेसिक्स के लिए तैयार कर लेते हैं, तो वो सरकार से भी ज़्यादा शक्तिशाली बन सकते हैं."

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