2016: कैसी होगी भारत-चीन की आर्थिक स्थिति?

इमेज कॉपीरइट Getty

अर्थव्यवस्था के लिहाज़ से एशियाई देशों के लिए 2015 का साल बहुत अच्छा नहीं रहा. ऐसे में सबकी नज़रें 2016 पर टिकी हुई हैं.

एशिया में आर्थिक नज़रिए से क्या कुछ संभव है, इसे लेकर मेरा आकलन.

चीन

चीन की अर्थव्यवस्था में गिरावट का दौर जारी रहेगा. आधिकारिक तौर पर अर्थव्यवस्था की विकास दर 6.5 फ़ीसदी पर आ जाएगी. इसे चीन की सरकार ने 'स्वीकार्य' बताया है. लेकिन वास्तव में विकास दर इससे भी नीचे जाएगी.

ज़्यादातर आर्थिक अनुमानों के मुताबिक़, यह 5.8 फ़ीसदी से 6.7 फ़ीसदी के बीच रह सकती है. अभी से ही कुछ प्रांतों की रिपोर्ट आने लगी है. इसके मुताबिक़, वे विकास के आंकड़ों को बढ़ा चढ़ाकर पेश कर रहे हैं.

इमेज कॉपीरइट Getty

भ्रष्टाचार पर शिकंजा कसने की कोशिशें जारी रहेगी, इससे क्षेत्रीय बजट प्रभावित होगा.

महंगाई की दर में नरमी देखने को मिलेगी, लेकिन इससे विकास बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं होगा. सरकार सेवा क्षेत्र पर ज़्यादा ध्यान देगी और खपत बढ़ाने पर जोर होगा.

यह सब चीन की सरकार करेगी. उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था वाला देश सर्विस और खपत पर निर्भर होने की दिशा में बढ़ेगा.

इस दौरान देश भर में मजदूरों का विरोध प्रदर्शन बढ़ेगा और ज़्यादातर कंपनियां अपने कामगारों को नौकरी से निकालेंगी.

भारत

भारत की अर्थव्यवस्था बेहतर करेगी और विकास दर के 7.5 फ़ीसदी से ज़्यादा रहने का अनुमान है.

इमेज कॉपीरइट Huw Evans picture agency

पेट्रोलियम पदार्थ का आयातक देश होने की वजह से भारत को तेल की घटती क़ीमतों से फ़ायदा होगा. इससे सरकार के पास सब्सिडी पर ख़र्च होने वाला पैसा बचेगा और वह जनकल्याण के दूसरे कामों पर ज़्यादा खर्च करने की स्थिति में होगी.

सैद्धांतिक तौर पर, इससे देश में खपत बढ़ेगी और यह भारत के विकास के लिए बेहद जरूरी होगा.

केंद्रीय कर्मचारियों की क्रय शक्ति सातवें वेतन आयोग के लागू होने से बेहतर होगी और यह विकास में मदद पहुंचाने वाला होगा.

हालाँकि सब कुछ अच्छा नहीं होगा.

मौजूदा विकास को ढांचागत रूप देने के लिए आर्थिक सुधारों की ज़रूरत है.

गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) का संविधान संशोधन प्रस्ताव अभी भी कांग्रेस के विरोध की वजह से संसद में अटका पड़ा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी को राज्य सभा में बहुमत नहीं है, यह 2016 में सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी.

उन्होंने देश भर लगातार बढ़ रहे असिहुष्णता के आरोपों को भी दूर करना होगा.

केंद्रीय रिज़र्व बैंक के प्रमुख ने भी असिहुष्णता को खुली और गतिशील अर्थव्यवस्था के लिए नकारात्मक बताया है.

जापान

जापानी मुद्रा येन के कमज़ोर होने से निर्यात में प्रतियोगिता बढ़ेगी. अमरीकी फ़ेडरेशन ब्याज दर को बढ़ाना जारी रखेगा, जिससे येन और भी कमज़ोर होगा.

हालांकि अमरीकी अर्थव्यवस्था में सुधार होने से जापानी उत्पादों के ख़रीददार बढ़ेंगे और यह अच्छी बात होगी.

बैंक ऑफ़ जापान भी 2016 में देश की अर्थव्यवस्था को मौद्रिक प्रोत्साहन देगा.

जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे केे सुधारवादी एजेंडे को 'अबेनोमिक्स' कहा जा रहा है. उन पर इसे कामयाब साबित करने का दबाव है. इस दौरान देश में श्रमिक बल मुश्किलें पैदा करता रहेगा.

इमेज कॉपीरइट Getty

जापान की आबादी तेज़ी से बुढ़ापे की ओर बढ़ रही है, यह मानव संसाधन में भी दिखता है.

अबे ने महिलाओं को मानव संसाधन में शामिल करने की कोशिश की. उन्होेंने दफ़्तरों का माहौल भी महिला हितैषी रखने की कोशिश की, लेकिन पुरुषवादी कार्य संस्कृति ने इसे मुश्किल बनाया.

दक्षिण एशियाई देश

दक्षिण एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था बीते साल पटरी पर रही, तो इसकी प्रमुख वजह पिछले दशक में किए आर्थिक सुधार थे.

लेकिन अब राजनीति आर्थिक मुद्दों पर भारी पर रही है, इससे मुश्किलें शुरू हो रही हैं.

इमेज कॉपीरइट Getty

मलेशिया और इंडोनेशिया की मुद्राओं के और कमज़ोर होने का ख़तरा है.

मलेशियाई प्रधानमंत्री नजीब और इंडोनेशियाई प्रधानमंत्री जोको विडूडू की लोकप्रियता में गिरावट आई है. इससे वे सुरक्षात्मक नीतियां अपना सकते हैं.

लेकिन ऐसी नीतियां आर्थिक तौर पर बेहतर नहीं मानी जातीं. इन दोनों नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हुए हैं. यह इनकी मुश्किलों को बढ़ाएगा.

दक्षिण एशियाई देशों को चीनी अर्थव्यवस्था के मंद होने का फ़ायदा होगा. बहुत सारी फैक्ट्रियां चीन से निकलकर कंबोडिया, वियतनाम और म्यांमार तक पहुंचेगी.

इन देशों की आर्थिक विकास दर 6 से 7 फ़ीसदी रहने का अनुमान है. युवा और सस्ते मानव संसाधन होने की वजह से यह दुनिया के लिए अगली बड़ी उत्पादन फैक्टरी साबित हो सकता है.

ऑस्ट्रेलिया

ऑस्ट्रेलिया को 'भाग्यशाली' देश माना जाता है.

लेकिन डोनल्ड होर्ने के इस कथन का दूसरा हिस्सा उतना सकारात्मक नहीं हैं. उन्होंने कहा, “ऑस्ट्रेलिया एक लकी देश है, इसे चलाने वाले दोयम दर्जे के लोग हैं जो लक शेयर करते हैं.”

इमेज कॉपीरइट Getty

वहां नए प्रधानमंत्री को कार्यभार संभाले अभी चार महीने ही हुए हैं. प्रधानमंत्री मैलकम टर्नबुल के सामने देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की चुनौती है.

विकास दर धीमी है और खनन क्षेत्र में नौकरियां कम हो रही हैं. टर्नबुल ने एक अरब ऑस्ट्रेलियाई डॉलर की मदद से देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का लक्ष्य रखा है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार