क्या क्रिकेटरों से 'बेहतर' हैं राजनेता?

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शरद पवार, अमित शाह, अरुण जेटली, फारुख़ अब्दुल्ला, राजीव शुक्ला, ज्योतिर्रादित्य सिंधिया, अनुराग ठाकुर एक घमासान चर्चा में शामिल हुए- जब ऐसा कोई आपको बताए तो आप यही कहेंगे की सौ फ़ीसदी ये व्यक्ति संसद के विंटर सेशन की बात कर रहा है.

लेकिन अगर कोई आपको बताए कि ये सब बड़े नाम इकठ्ठा बैठकर एक ही मुद्दे पर एकमत से काम कर रहे हैं तो आप पक्का तौर चौंक जाएंगे.

कहानी में ट्विस्ट यह है कि ये सब बड़े नाम राजनीति की बात नहीं कर रहे बल्कि भारतीय क्रिकेट नियामक मंडल यानी कि बीसीसीआई की बैठक में शरीक हो रहे थे.

अलग अलग पार्टी के ये बड़े नेता जो एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी है वही लोग बीसीसीआई के कारोबार में कंधे से कंधा मिलाकर काम करते हैं.

ऐसा क्या जादू है भारतीय क्रिकेट में जो इन सब राजनीतिक प्रतिदंद्वियों को एकजुट कर देता है? आख़िर क्यूँ राजनीति के माहिर नेता भारतीय क्रिकेट संघटन में इतनी रुचि से भाग लेते हैं?

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अगर इतिहास की बात करें तो 1928 से 1980 तक बीसीसीआई के सर्वोच्च पद पर या तो संस्थानिक या फिर जानेमाने उद्योगपति ही काबिज हुए. 1980 में पहली बार कोई नेता बीसीसीआई अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठा, वो थे शेषराव वानखेडे.

वे इंग्लैंड से पढ़कर लौटे थे, क्रिकेट का शौक था तो मुंबई क्रिकेट से जुड़ गए. 1963 में मुंबई क्रिकेट संघ के अध्यक्ष बने. राजनेता क्रिकेट में क्या वैल्यू एडिशन ले कर आ सकता है, ये तब देखने को मिला.

उन दिनों क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया बीसीसीआई के संस्थापक सदस्य थे और ब्रेबॉर्न स्टेडियम उनका खुद का मैदान था. 1970 के वक्त एमसीए और सीसीआई में टेस्ट मैच के संयोजन को लेकर झगड़े हो गए.

एमसीए का खुद का स्टेडियम होना जरुरी है ये सोचते हुए शेषराव वानखेड़े काम में जुट गए. मुंबई जैसे शहर के चर्चगेट नरीमन प्वाइंट इलाके में जहां दस फ़ीट जगह नहीं मिलती वहां शेषराव वानखेडेजी ने अपना पुरा अनुभव लगाते हुए पहले स्टेडियम के लिए सरकार से ज़मीन हासिल की और स्टेडियम खडा किया.

वह महाराष्ट्र सरकार में खुद बडे राजनेता थे इसलिए यह संभव हो पाया.

वानखेड़े के बाद तुरंत और एक राजनेता ने बीसीसीआई की राजगद्दी पर हक जमाया वो थे एनकेपी साल्वे. केंद्रीय मंत्री होते हुए एनकेपी साल्वे ने 1982 से लेकर 1985 तक बीसीसीआई के अध्यक्ष पद की ज़िम्मेवारी निभाई.

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Image caption एनकेपी साल्वे भारत में 1983 के वर्ल्ड कप के आयोजन लेकर आए थे.

साल्वे का सबसे बड़ा योगदान था क्रिकेट वर्ल्ड कप इंग्लैंड से बाहर निकालना. पूरा राजनैतिक अनुभव लगाते हुए उन्होंने 1987 में पहली बार इंग्लैंड से वर्ल्ड कप भारतीय उपखंड में लाया.

बाद में माधवराव सिंधिया, रणबीर सिंह महेंद्र और शरद पवार जैसे बडे नेताओं ने बीसीसीआई की राजगद्दी पर अपना हक जमाया.

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राजनेताओं को बीसीसीआई का इतना आकर्षण क्यूँ है ये सवाल सबके मन में पक्का आता होगा. मेरे ख़्याल से बड़े राजनेता भारतीय क्रिकेट में आते हैं क्यूंकि जो ग्लैमर और प्रसिद्धि भारतीय क्रिकेट से मिलती है वो शायद राजनीति को भी नहीं मिलती होगी.

दूसरा कारण यह है की बाक़ी क्षेत्रों में पश्चिमी देशों से भारत थोड़ा पीछे हो सकता है. उसकी तुलना में क्रिकेट एक ही ऐसा क्षेत्र है जिसमें दुनिया भारत के सामने झुकती है.

दुनिया भर की क्रिकेट में बीसीसीआई सचमुच में ‘बडा भाई’ है ये कोई नकार नहीं सकता. बीसीसीआई ने आईपीएल जैसा जबरदस्त प्लेटफ़ार्म बनाया है जिसमें भारत के बड़े बड़े बिज़नेस मैन और बिज़नेस हाऊज़ उत्साह से शरीक होते हैं.

एक जायज सवाल मन में जरूर आता है कि जो काम राजनेता कर सकते हैं वो बड़ा खिलाडी क्यूँ नहीं कर सकते? भारतीय क्रिकेट को सिर्फ़ राजनेता चला सकते है ऐसा बिल्कुल नहीं है.

कनार्टक क्रिकेट की बागडोर अनिल कुंबले और जवागल श्रीनाथ ने संभालने की अच्छी कोशीश की थी. लेकिन ऐसा देखा गया है कि बड़े खिलाडी अपना अहंकार सौ प्रतिशत भुलाकर एकजुट होकर काम नहीं कर पाते.

दो कड़े विरोधी पक्ष के नेता निजी राजनीति के झगड़े बाजू रखकर क्रिकेट में काम कर सकते हैं लेकिन आम तौर पर चार बड़े खिलाडी सबको साथ लेकर आगे जाने का काम लगातार नहीं कर पाते.

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राजनेता और साधारण संघटक के काम करने में क्या फर्क़ होता है इसकी अजीब कहानियां सुनने को मिलती है.

एन श्रीनिवासन, जो बहुत ही काबील संयोजक माने जाते थे, उनको भी बीसीसीआई के सर्वोच्च पद का 'अहंकार' डसने लगा था,.

आम तौर पर चयन समिति टीम का चयन करती है और उसके बाद बैठक का संयोजक, बीसीसीआई अध्यक्ष को फ़ोन करके सिर्फ वो निर्णय पक्का कर देते हैं. ये एक प्रोटोकोल होता है. कोई अध्यक्ष चयन समिति का निर्णय बदलता नहीं है.

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चयन समिति ने बड़ी सोच के बाद महेंद्र सिंह धोनी का डिप्टी विराट कोहली को बनाने का निर्णय लिया. संयोजक ने निर्णय के बाद अध्यक्ष श्रीनिवासन को फ़ोन किया और उत्साह में फ़ोन स्पीकर पर रखा. टीम के चयन पर श्रीनिवासन कुछ नहीं बोले लेकिन विराट कोहली को उप कप्तान बनाने का निर्णय सुनने के बाद ‘‘ये हक चयन समिति को किसने दिया’’, ऐसे गुस्से में आकर बोले क्यूंकी उनको यह निर्णय बिल्कुल पसंद नहीं आया था.

जब संयोजक को लगा कि फ़ोन स्पीकर पर है और सभी चयनकर्ताओं ने श्रीनिवासन की बात सुन ली है तो उन्होंने ग़लती जानकर फ़ोन को उठाकर कान में लगाया.

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सबको साथ लेकर आगे जाने का काम राजनेता कर सकते हैं लेकीन खिलाड़ी अपने मैदान के भूतकाल को भूल नहीं पाते.

मैदान या खेलते वक्त हुई टशन को वो ना भुलते हैं ना माफ़ करते हैं. इससे बिल्कुल उलटा राजनीति में होता है. राजनीति में कोई हमेशा के लिए मित्र या शत्रु नहीं होता.

बीसीसीआई के कारोबार में नेता अपनी निजी खुंदक जेब में लेकर घूमते नहीं.

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मेरे ख़्याल से यही कारण है कि बीसीसीआई में इतने सारे नेता बखूबी साथ में काम करते हैं. बीसीसीआई का पदभार संभालने वाले पहले दो राजनेता शेषराव वानखेडे और एनकेपी साल्वे नागपुर शहर से थे और आज के अध्यक्ष शशांक मनोहर भी नागपुर से है.

फर्क़ इतना ही है कि शशांक मनोहर को ना राजनीति से ना ग्लैमर से लेना देना है. शायद इसी कारण है शरद पवार, अमित शाह, अरुण जेटली, फारुख़ अब्दुल्ला, राजीव शुक्ला, ज्योतिर्रादित्य सिंधिया, अनुराग ठाकुर जैसे बड़े नेताओं के बीसीसीई में होते हुए भी वो अपना काम बिना किसी दबाव से कर रहे हैं.

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