केरलः कम उम्र की लड़कियां निशाने पर

हाल के दिनों के यौन अपराधों पर अगर नज़र डालें तो ऐसा लगता है कि केरल में यौन अपराधियों के निशाने पर कम उम्र की लड़कियां हैं.

पोस्को (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस एक्ट) के अंतर्गत हाल में दर्ज किए गए मामलों से पता चलता है कि असामाजिक तत्व 12 से 15 साल की लड़कियों को वेश्यावृति के मकसद से बहला-फुसलाकर अपने चंगुल में फंसा रहे हैं.

पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक़ 2015 में करीब 1139 मामले केरल में पोस्को के अंतर्गत दर्ज किए गए हैं.

ये सभी वारदात एक खास तरह के पैटर्न से अंजाम दिए गए हैं.

हाल ही में अडूर में एक गैंग रेप का मामला सामने आया था जिसमें दो स्कूल जाने वाली लड़कियों पर नौजवान लड़कों के एक गैंग ने स्कूल के नजदीक ही हमला कर दिया था.

इस घटना से स्कूल के नजदीक ऐसे गैंग की मौजूदगी के बारे में पता चला जो लड़कियों को बहला-फुसलाकर अपना शिकार बनाते हैं.

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पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के गैंग राज्य के कई शहरों में काम कर रहे हैं और पुलिस के पास इनके द्वारा मासूम बच्चों के उत्पीड़न की पुख्ता जानकारी है.

एक प्रमुख स्कूल के नजदीक ऐसे ही दो गैंग के बारे में पता चलने पर पुलिस ने सादे कपड़ों में दो महिला पुलिसकर्मियों को स्कूल के बाहर तैनात किया.

महिला पुलिसकर्मी छात्रों और शिक्षकों से बातचीत कर जानकारी इकट्ठा करती है.

एक महिला पुलिसकर्मी गैंग के काम करने के बारे में बताती हैं, "स्कूल के नज़दीक के बस स्टॉप पर अधेड़ उम्र के ये मर्द अक्सर मंडराते रहते हैं. वे लड़कियों को गहना, मोबाइल फोन और पैसे का लालच देकर फंसाते हैं और आखिरकार ये लड़कियां अनजाने में देह व्यापार के चंगुल में फंस जाती हैं."

पुलिस का कहना है कि 'स्टूडेंट पुलिस कैडट ग्रुप (एसपीसी)' ऐसे मामलों को पकड़ सकती है.

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डीआईजी पी विजयन का कहना है, "एसपीसी से जुड़े छात्र कई सारे माध्यमों की मदद से जागरूकता कार्यक्रम चलाते हैं. यह तरीका उम्र को देखते हुए की वजह से किसी भी दूसरे तरीके से ज्यादा प्रभावकारी है."

डीआईजी ने यह भी जानकारी दी कि पुलिस स्कूली छात्राओं के लिए एक काउंसलिंग सत्र चला रही है.

क्राइम ब्रांच के आईजी एस श्रीजीत मानव तस्करी विरोधी अभियान के प्रमुख है. वो ऐसे अपराध को 'डिसेप्टिव ट्रैफिकिंग' के अंतर्गत रखते हैं.

वो कहते हैं, "केरल में सीधे तौर पर मानव तस्करी के मामले बहुत कम हैं. इसका मतलब है कि अपराधी क़ानून से डरते हैं. इसलिए वो कम उम्र के लड़कियों को फंसाने के लिए कुटिल तरीकों का इस्तेमाल करते हैं."

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पुलिस इस समस्या से निपटने के लिए पहले से ही अभियान चला रही है.

एस श्रीजीत ने बताया, "सभी स्कूल-कॉलेजों में मानव तस्करी के ख़िलाफ़ क्लब बनाए जाने की योजना तैयार हो रही है."

बच्चों के अधिकार के लिए काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता सुनीता कृष्णन बताती है कि सेक्स रैकट चलाने वाले असमाजिक तत्व स्कूल छात्राओं की तस्वीर खींचकर उसे सोशल मीडिया पर डाल देते हैं.

वो बताती है, "एक फेसबुक पेज तो वाकई में ऐसी तस्वीरों से भरा पड़ा है. इसपर ज्यादातर स्कूल जाने वाली लड़कियों की तस्वीरें हैं.

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