दिल्लीः प्रदूषण का पता नहीं, भीड़ कम हुई है

दिल्ली

मैं दिल्ली में ऑड-ईवन फॉर्मूले के लागू होने के पहले और दूसरे दिन काफी दुखी था. अपनी गाड़ी से हर जगह जाने की आदत थी. लेकिन एक सप्ताह बाद मैं इस फॉर्मूले का समर्थन करने लगा हूँ.

मैं रोज़ घर से दफ्तर तक का 15 किलोमीटर का सफ़र अपनी गाड़ी में 30 मिनट से 50 मिनट के अंदर तय किया करता था.

अब केवल पब्लिक ट्रांस्पोर्ट या ऑटोरिक्शा के इस्तेमाल से ये फ़ासला 20 से 25 मिनट में तय कर लेता हूं.

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सड़कों पर गाड़ियों की भीड़ कम नज़र आती है, ट्रैफिक जाम भी क़म हुए हैं. बसें और मेट्रो का इस्तेमाल बढ़ा है.

लेकिन ये योजना प्रदूषण को घटाने के लिए लागू की गई थी. क्या शहर की हवा में प्रदूषण कम हुआ है? क्या अब दिल्ली दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की श्रेणी से बाहर हो सकी है?

दिल्ली सरकार की मानें तो अब तक ये फार्मूला कामयाब रहा है. राज्य सरकार ने जो अब तक आंकड़े जारी किए हैं उसके अनुसार फॉर्मूले के लागू किए जाने के बाद शहर के वायु प्रदूषण में भारी कमी आई है.

दिल्ली के लोगों ने इसे बखूबी अपनाया है. सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग इसकी सराहना कर रहे हैं. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने तो योजना के लागू किए जाने के पहले दिन ही इसकी सफलता का डंका पीटना शुरू कर दिया था.

इस 'कामयाबी' को देखते हुए कुछ लोगों ने कारों पर और भी अंकुश लगाने की सलाह दी है.

वहीं लोगों की ऐसी भी राय है कि प्रदूषण को घटाने के लिए ऑड-ईवन योजना काफी नहीं है.

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विशेषज्ञ कहते हैं कि ऑड-ईवन फॉर्मूले की कामयाबी पर उन्हें कभी शक नहीं था. देखा ये गया है कि आम तौर से रविवार या छुट्टी वाले दिन सड़कों पर गाड़ियों की संख्या में भारी कमी होने के कारण हवा के प्रदूषण में कमी आ जाती है.

इसी तरह जिन इलाक़ों में दिल्ली सरकार हर महीने की 22 तारीख को 'कार फ्री' दिवस मनाती है उन इलाक़ों में प्रदूषण काफी कम हो जाता है.

लेकिन योजना की असल सफलता का दारोमदार इस बात पर होगा कि 15 जनवरी को इसकी समाप्ति के बाद लोग कार पूल करते हैं या नहीं. निजी गाड़ियों के बजाए बसों और मेट्रो का इस्तेमाल जारी रखते हैं या नहीं.

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कुछ विशेषज्ञ तो योजना के शुरू होने से पहले से कह रहे थे कि पहले पब्लिक ट्रांस्पोर्ट सिस्टम और बुनियादी ढांचों को ठीक करो तब ये योजना लागू करो.

दिल्ली में विज्ञान और पर्यावरण केंद्र के विवेक चट्टोपाध्याय कहते हैं कि दिल्ली सरकार को 15 जनवरी के बाद असल चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा.

"बसों और मैट्रो की कैपेसिटी और फ्रीक्वेंसी बढ़ानी होगी. फर्स्ट और लास्ट माइल कनेक्टिविटी ठीक करनी होगी. सड़क के बाईं तरफ बस लेन को साफ़ रखना होगा ताकि बसों की रफ़्तार ठीक रहे".

वह कहते हैं कि सरकार को वाहनों की पार्किंग का इंतज़ाम करना होगा और पार्किंग के दाम बढ़ाने होंगे जो इस समय दुनिया के बड़े शहरों के मुकाबले सब से कम हैं.

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हवा में दो तरह से प्रदूषण फैलता है. एक ज्वलनशील पदार्थों से, जैसे कि पेट्रोल और डीज़ल, जिसका इस्तेमाल गाड़ियां करती हैं. इस श्रेणी में प्रदूषण को फैलाने में वाहनों का योगदान 40 से 45 प्रतिशत होता है. ये ज़हरीले पदार्थों में शामिल होते हैं.

प्रदूषण का दूसरा सब से बड़ा जरिया हैं ग़ैर ज़हरीले पदार्थ जिनमें धूल और गर्द सब से अधिक हैं.

विवेक कहते हैं दिल्ली सरकार को धूल और गर्द को कम करने के लिए भी तुरंत बड़े क़दम उठाने होंगे, "दिल्ली सरकार के पास धूल-गर्द मैनेजमेंट का कोई ठोस सिस्टम नहीं है. इसे प्राथमिकता देनी पड़ेगी."

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प्रदूषण के बढ़ने के ज़हरीले और ग़ैर ज़हरीलों पदार्थों के तमाम ज़रियों को एक साथ मिलाएं तो दिल्ली में प्रदूषण फैलाने वाले ज़रियों में धूल-गर्द के बाद दूसरा नंबर है वाहनों का.

विवेक के मुताबिक़ दिल्ली की हवाओं में पिछले दो महीने से प्रदूषण का भंडार जमा हो गया है जो बारिश या तेज़ हवा के कारण जा सकता है. लेकिन इसमें अधिक बढ़ोतरी न हो इसके लिए प्रदूषण को कम करने के हर क़दम उठाने की ज़रुरत भी है.

वह कहते हैं कि ऑड-ईवन योजना केवल आपातकालीन समय पर लागू की जाती है. मुख्यमंत्री केजरीवाल भी यही कहते हैं. वह 15 जनवरी को इसके ख़त्म होने पर इसका मूल्यांकन करेंगे.

ऑड-ईवन फार्मूला रहे या बंद हो जाए मुख्यमंत्री की इस योजना की सफलता का पता 15 जनवरी के बाद ही चलेगा.

लेकिन हकीकत है कि अरविंद केजरीवाल की इस योजना की चर्चा देश भर में हो रही है और कुछ राज्य सरकारों ने प्रदूषण कम करने के लिए मिलती-जुलती योजनाओं का ऐलान भी किया है.

लेकिन सब से अहम बात ये है कि आम लोगों में प्रदूषण को लेकर जागरूकता आई है.

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