पठानकोट: 'डेढ़-दो घंटों में निपटा देना था'

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पठानकोट एयरबेस पर हुए चरमपंथी हमले पर कार्रवाई को लेकर कई आलोचनाएं सामने आई हैं. क्या सुरक्षाबलों की मौतें कम की जा सकती थीं?

आख़िर चरमपंथियों को क़ाबू पाने और उन्हें ख़त्म करने में इतना वक़्त क्यों लगा?

बीबीसी संवाददाता विनीत खरे ने मोहाली में रिटायर्ड मेजर जनरल राज मेहता से बात की और पूछा क्या नेशनल सिक्योरिटी गार्ड्स को ऑपरेशन की कमान देना सही क़दम था?

आलोचना हो रही है कि जब स्थानीय परिस्थितियों से वाकिफ़ सेना के दस्ते पठानकोट में मौजूद थे तो आखिर एनएसजी को ऑपरेशन की कमान क्यों दी गई? रिटायर्ड मेजर जनरल राज मेहता का कहना था -

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एनएसजी वर्ल्ड क्लास फ़ोर्स है. ये बंधक छुड़ाने के ऑपरेशन में फिर वे चाहे किसी भी तरह का होस्टेज ऑपरेशन हो, सबसे जबर्दस्त है.

इसमें शामिल लोग मूल रूप से सेना की पृष्ठभूमि वाले हैं. कुछ आर्मी से हैं, तो कुछ नेवी से तो कुछ एयरफोर्स से और कुछ सीआरपीएफ़ के. ये बेहद क़ाबिल लोग हैं, खास तरह के ऑपरेशन के लिए.

लेकिन इन्हें जिस ऑपरेशन पर भेजा गया वो ऐसी था ही नहीं. इसका मतलब यह है कि जिस तरह की ट्रेनिंग इनकी है, वो ऑपरेशन के दौरान पूरी तरह काम नहीं आई.

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हमारी जो स्पेशल फोर्स थी, उसमें यह क़ाबिलियत थी कि वे ऐसे ऑपरेशन को अंज़ाम दे पाएं. उनका तो रोज़मर्रा का यह काम है.

चरमपंथी अपने शरीर पर ग्रेनेड रखे रहते हैं और उसका पिन बाहर रहता है. जब उनकी मौत होती है और उनके शरीर से कोई छेड़छाड़ होती है, तो वह फट जाता है.

अब यह बात तो उसे पता होगी, जिसका रोज़मर्रा का यह काम है. एनएसजी के पास तो ऐसी ट्रेनिंग है नहीं.

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जब हम ऐसी बॉडी को हैंडल करते हैं तो पहली बात तो यह है कि इसे दूर से करते हैं. दूसरी बात है कि कवर के साथ करते हैं.

तीसरी बात, बॉडी हिलाने के लिए कांटे के साथ रस्सी फेंकी जाती है और तब हिलाया जाता है. अगर स्पेशल फ़ोर्स ऑपरेशन पर होते तो ऐसी गलतियां न करते.

अगर यह ऑपरेशन 36 घंटा चला तो यह तो बहुत समय हुआ. इसे तो डेढ़-दो घंटों में निपटा देना था.

वाकई यह ऑपरेशन एयरफ़ोर्स का था. इसलिए एयरफ़ोर्स का जो गरुड़ कमांडो है उसके हाथ में ऑपरेशन की बागडोर होनी चाहिए थी.

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क्योंकि एयरफ़ोर्स को स्थानीय क्षेत्र के बारे में पता था. वो वहीं ट्रेनिंग करते हैं. वो एयरबेस के चप्पे-चप्पे से वाकिफ़ थे.

हो सकता है चूंकि वह नई फ़ोर्स है, इसलिए आत्मविश्वास का स्तर उतना न हो या फिर दिल्ली का फ़ैसला होगा कि आप जो करोगे सो करोगे, हम एनएसजी को भेजे देते हैं.

लेकिन इस वजह से बाद में यह हुआ कि वहां पर पंजाब पुलिस भी पहुँच गई. भारतीय फ़ौज भी पहुँच गई. स्पेशल फ़ोर्स भी पहुँच गई. एनएसजी भी पहुँच गई. डीएससी पहले से थी और गरुड़ कमांडो थे ही.

तो इस तरह से कुल छह फ़ोर्स पहुँचीं. इनके बीच में कोई तो एक माई-बाप होना चाहिए था.

इससे भारतीय फ़ौज की छवि पर कोई असर नहीं पड़ा है. किसी भी फ़ौज की छवि चाहे वह आर्मी हो, नेवी हो या एयरफ़ोर्स, सकारात्मक है.

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