झारखंड में प्लास्टिक की सड़कें चकाचक

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देश के कई शहरों में प्लास्टिक के कचरे (प्लास्टिक वेस्ट) की सड़कें बन रही हैं. झारखंड के जमशेदपुर में बनी प्लास्टिक की सड़क चार साल पुरानी होने के बावजूद चकाचक है.

इसके निर्माण में लगी जुस्को यानी जमशेदपुर यूटिलिटी सर्विसेज कंपनी से कई देशों ने इस तकनीक के बारे में जानकारी मांगी है. इनमें इटली, दक्षिण अफ्रिका, नाइजीरिया और साइप्रस जैसे देश शामिल हैं.

जुस्को के जनसंपर्क अधिकारी राजेश रंजन ने बताया कि इन देशों के कुछ विश्वविद्यालयों को व्यावहारिक जानकारी उपलब्ध कराई गई है.

उन्होंने बताया कि जुस्को ने वर्ष 2011 से लेकर अभी तक जमशेदपुर में करीब 50 किलोमीटर लंबी सड़क प्लास्टिक वेस्ट से बनाई हैं जो पर्यावरण के लिए अनुकूल है, लिहाजा इन्हें ग्रीन रोड नाम दिया गया है.

इनके निर्माण में तार कोल के साथ थोड़ी मात्रा प्लास्टिक लिक्विड भी मिलाया जाता है. इससे सड़कों की ऊपरी सतह ज्यादा टिकाऊ बन पड़ती हैं.

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पथ निर्माण विभाग की प्रधान सचिव राजबाला वर्मा ने बीबीसी को बताया कि ऐसी सड़कों के निर्माण में व्यावहारिक दिक्कतें हैं और इसी लिए झारखंड के दूसरे शहरों में इस तकनीक का इस्तेमाल नहीं किया गया.

उन्होंने बताया कि तार कोल लाना आसान और सस्ता भी है. लेकिन झारखंड के आस-पास प्लास्टिक लिक्विड की कोई फैक्ट्री नहीं है जबकि तार कोल की आपूर्ति हल्दिया से आसानी से हो जाती है.

बंगलुरू में चल रही केके प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट के मैनेजिंग डायरेक्टर के अहमद खान ने बीबीसी को बताया कि कई राज्यों में इस तकनीक से सड़कें बनाई जा रही है.

उन्होंने हाल ही में राजस्थान सरकार को इस आशय का प्रस्ताव भेजा है. बंगलुरू म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन के अलावा कोलकाता, रायपुर, दिल्ली, पुणे, इंदौर और चैन्नई जैसे शहरों में भी एजेंसियां इस तकनीक से सड़कें बना रही हैं.

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सेंटर्ल रोड रिसर्च ट्रस्ट और अहमद ने बताया कि इस तकनीक से सड़क निर्माण में 92 फ़ीसदी तार कोल और 8 फ़ीसदी प्लास्टिक वेस्ट का उपयोग किया जाता है. इससे कचरे का निष्पादन तो होता ही है, लोगों को आर्थिक फ़ायदा भी हो रहा है.

उन्होंने बताया कि उनकी कंपनी ने बंगलुरू के कई अपार्टमेंट में कलेक्शन सेंटर खोल रखे हैं. वहां लोग 8 रुपये प्रति किलो की दर से प्लास्टिक वेस्ट बेचते हैं.

प्लास्टिक वेस्ट का उपयोग सड़क निर्माण में करने की तकनीक सबसे पहले त्यागराज इंजीनियरिंग कॉलेज, मदुरै के प्रोफेसर आर वासुदेवन और उनकी टीम ने खोजी.

इसके बाद बंगलुरू के अहमद खान ने इसकी उन्नत तकनीक खोजी. इसका पेटेंट इन्हीं दोनों लोगों के नाम से अलग-अलग रजिस्टर्ड है.

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