अजीत जोगी: कभी शह, कभी मात

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शतरंज का माहिर खिलाड़ी जब अपनी पहली चाल चलता है तो वह अमूमन आगे की दस चालों के बारे में सोच चुका होता है. यही बात अजीत जोगी के बारे में भी कही जा सकती है.

हर खिलाड़ी के मन में जीत का ही सपना पल रहा होता है, लेकिन वह कभी-कभी बुरी तरह हार भी जाता है. यह बात भी अजीत जोगी के बारे में कही जा सकती है.

जनवरी, 1998 में मध्यप्रदेश सरकार के विमान से पूर्व केंद्रीय मंत्री माधवराव सिंधिया, मध्यप्रदेश के सहकारिता मंत्री सुभाष यादव, राज्यसभा के सदस्य अजीत जोगी और मध्य प्रदेश के तत्कालीन युवा कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह राजपूत दिल्ली से रायपुर जा रहे थे.

सुभाष यादव की मां का निधन हो गया था और विमान उन्हें रायपुर के बाद उनके गृहनगर खरगोन ले जाने वाला था. विमान के उड़ान भरने से पहले माधवराव सिंधिया ने कहा, "हमारे साथ दो भावी मुख्यमंत्री सफ़र कर रहे हैं."

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सुभाष यादव तो ज़ाहिर तौर पर तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के ख़िलाफ़ मोर्चा खोले हुए थे और ख़ुद मुख्यमंत्री बनना चाहते थे. दुख की उस घड़ी में भी सुभाष यादव के चेहरे पर मुस्कान आ गई. लेकिन दूसरा मुख्यमंत्री कौन? माधवराव सिंधिया ने उलझन ताड़ ली और कहा, "ये रहे दूसरे. छत्तीसगढ़ के भावी मुख्यमंत्री."

तब किसी को नहीं पता था कि छत्तीसगढ़ अलग राज्य बनने वाला है. अभी अटल बिहारी वाजपेयी की ओर से यह घोषणा होनी बाक़ी थी कि 'अगर छत्तीसगढ़ से भाजपा के सभी प्रत्याशी जीते तो छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बनाएंगे.'

लेकिन अजीत जोगी को पता था कि राज्य बनेगा और वे पहले मुख्यमंत्री होंगे. जब नवंबर, 2000 में राज्य बना तो ऐसा ही हुआ. वह अजीत जोगी के राजनीतिक उत्कर्ष का चरम था.

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लेकिन किसे पता था कि वह अजीत जोगी के राजनीतिक पतन की शुरुआत भी थी. शायद उन्हें भी नहीं.

ऐसी किसी कल्पना की ज़रूरत भी नहीं थी क्योंकि तब तक अजीत जोगी प्रशासनिक अधिकारी और फिर राजनीतिज्ञ के रूप में एक लंबी पारी खेल चुके थे.

मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद उन्होंने कहा, "हां, मैं सपनों का सौदागर हूं. मैं सपने बेचता हूं."

इस बात में कोई शक नहीं कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने योजनाबद्ध तरीक़े से छत्तीसगढ़ में विकास कार्यों की शुरुआत की. लेकिन वे अपना सपना लोगों से साझा नहीं कर सके और धीरे-धीरे उन पर लोगों का अविश्वास बढ़ता गया, एक डर मन में समाने लगा.

इस डर की वजह उनके बेटे अमित जोगी भी रहे, जो इस समय विधायक भी हैं. अमित जोगी लोगों को ठीक उसी तरह लगते रहे हैं जिस तरह एक ज़माने में इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी लगते थे.

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पिता के मुख्यमंत्री रहते हुए ही अमित जोगी पर एनसीपी के प्रदेश कोषाध्यक्ष की हत्या का आरोप लगा. उन्हें लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा तो यह डर स्थाई हो गया.

इतना स्थाई कि चुनाव के समय भाजपा के लोग चुनाव प्रचार के दौरान कहने लगे, "भाजपा को नहीं जिताया तो जोगी फिर मुख्यमंत्री बन जाएंगे"

जोगी परिवार को लेकर कांग्रेसियों के मन में भी बहुत डर भरा रहता है कि पता नहीं वे क्या कर जाएं.

इसलिए बस्तर में जब 2013 में कांग्रेस के नेताओं पर नक्सलियों का हमला हुआ और भाजपा के नेताओं ने इसे जोगी की साजिश करार दिया, तो बहुत से लोगों ने इसे सच मान लिया.

हालांकि इसका असली सच अभी ज़ाहिर नहीं हुआ है.

इस हमले में वीसी शुक्ला और महेंद्र कर्मा समेत छत्तीसगढ़ कांग्रेस के कई शीर्ष नेता मारे गए थे.

जोगी के एकाधिकार का यह आलम था कि उनके एक मंत्री कहा करते थे, "चपरासी से नीचे के सारे तबादले मैं करता हूं, उससे ऊपर के सारे जोगी जी."

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एकाधिकार की इस इच्छा ने उनको और भी बदनाम किया. उपलब्धियों और कारगुजारियों का एक लंबा सिलसिला है, जो उनके साथ साए की तरह चलता है. इसे समझने के लिए अजीत जोगी के जीवन को थोड़े क़रीब से देखना पड़ेगा.

छत्तीसगढ़ में वर्ष 1946 में अजीत जोगी का जन्म हुआ. वह ख़ुद बताते हैं कि वह उन दिनों नंगे पैर स्कूल जाया करते थे. उनके पिता ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था. इसलिए उन्हें मिशन की मदद मिली थी.

वह पढ़ाई लिखाई में तेज़ थे, सो भोपाल में इंजीनियरिंग कॉलेज पहुंच गए. मैकेनिकल इंजीनियरिंग में गोल्ड मेडल हासिल किया और फिर रायपुर इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाने लगे. वहीं से आईपीएस हुए और डेढ़ साल बाद आईएएस.

अजीत जोगी जितने प्रतिभावान रहे हैं, उतने ही उनमें नेतृत्व के गुण भी रहे हैं. इंजीनियरिंग कॉलेज से लेकर मसूरी में प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थान तक सब जगह वे अव्वल आने वालों में से भी रहे और नेतागीरी करने वालों में भी.

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लेकिन प्रतिभा और नेतृत्व से कहीं ज़्यादा उनमें जुगाड़ और तिकड़म भिड़ाने के गुण हैं. उनको क़रीब से जानने वाले कहते हैं कि जब वह तिकड़म भिड़ाने पर आते हैं तो संबंधों, सदाशयता और यहां तक कि क़ानून-व्यवस्था की भी परवाह नहीं करते.

जिन दिनों वह रायपुर में कलेक्टर हुआ करते थे, उन्हीं दिनों राजीव गांधी इंडियन एयरलाइन्स के पायलट थे. संयोग था कि उनका विमान कभी-कभी रायपुर भी आया करता था.

कलेक्टर का स्थाई आदेश था कि जिस दिन पायलट के रूप में राजीव गांधी का नाम आए, उन्हें पहले सूचना मिल जाए. नियत समय पर कलेक्टर अजीत जोगी घर से चाय नाश्ता लेकर हाज़िर होते थे.

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साल 1986 में कांग्रेस को मध्य प्रदेश से एक काबिल व्यक्ति की तलाश थी जो अनुसूचित जाति या जनजाति का हो और जिसे राज्यसभा में भेजा जा सके.

अर्जुन सिंह के निर्देश पर तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दिग्विजय सिंह अजीत जोगी को राजीव गांधी के पास लेकर गए तो, बकौल जोगी, राजीव गांधी ने कहा, "आई नो दिस जेंटलमैन, ही इज फ़ाइन."

वह लगातार 14 बरस तक ज़िलाधीश और डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट रहे. वह दावा करते हैं कि यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है.

अर्जुन सिंह ने उनकी सिफ़ारिश क्यों की? इसलिए कि सीधी में कलेक्टर रहते हुए वह अर्जुन सिंह को साध चुके थे. जैसे कि रायपुर में रहते हुए शुक्ला बंधुओं यानी विद्याचरण शुक्ला और श्यामाचरण शुक्ला को.

तिकड़म में ऐसी महीनता कम ही देखने को मिलती है कि राज्यसभा के कार्यकाल के दौरान रविवार को अजीत जोगी प्रार्थना करने उसी गिरजाघर जाते रहे, जिसमें सोनिया गांधी जाती थीं.

हालांकि वह दिल से कितने ईसाई हो पाए, कहना कठिन है क्योंकि 12वें लोकसभा के चुनाव से पहले उनसे पूछा कि रायगढ़ ही क्यों, तो उन्होंने कहा, "आज सुबह पूजा करते हुए देवी से पूछा तो उन्होंने यही कहा."

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उनकी ईसाइयत उनके लिए मुसीबत का सबब भी रही. इससे उनकी जाति को लेकर भी विवाद हुआ. छत्तीसगढ़ में जोगी जिस परिवार से आते हैं वह दरअसल अनुसूचित जाति में है. अजीत जोगी के पास आदिवासी होने का प्रमाण पत्र है.

आरोप है कि यह प्रमाण पत्र तिकड़म से लिया गया है जिससे कि वह अनुसूचित जनजाति से होने का फ़ायदा ले सकें, बच्चों को आरक्षण आदि का फ़ायदा मिल सके.

अनुसूचित जाति का कोई व्यक्ति यदि धर्म परिवर्तन कर ले तो वह आरक्षण की पात्रता खो देता है. फिलहाल यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है.

अजीत जोगी का कहना है कि हाईकोर्ट ने दो बार उनके पक्ष में फ़ैसला दिया है.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दोनों को तकनीकी रूप से फ़ैसला नहीं कहा जा सकता और इसकी जांच होनी चाहिए. यह जांच छत्तीसगढ़ सरकार के पास लंबित है और उसका फ़ैसला ही नहीं आता.

क्यों नहीं आता, इसका जवाब हाल ही में पैदा हुए विवाद से मिलता है, जब एक कथित टेप में वह, उनका बेटा अमित और मुख्यमंत्री के दामाद एक चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार को पैसा देकर नाम वापस लेने के लिए कथित रूप से चर्चा करते सुनाई पड़ते हैं. हालाँकि जोगी इन आरोपों को ख़ारिज करते हैं.

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कांग्रेस में उनके विरोधी आरोप लगाते हैं कि यह सांठगांठ नई नहीं है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल कहते हैं, "पिछले दस वर्षों से वे हर चुनाव में कुछ सीटों पर रमन सिंह से सौदा करते आए हैं और वहां कांग्रेस उम्मीदवारों को हराते रहे हैं. यही वजह है कि हर बार कांग्रेस हारती रही है. लेकिन ठीक से कलई इस बार खुली है."

आरोपों को राजनीतिक विरोध के रूप में भी देख लें तो अंतागढ़ चुनाव का कथित सौदा कोई पहला नहीं है. मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने भाजपा के 12 विधायकों को तोड़कर कांग्रेस में शामिल कर लिया था और खूब वाहवाही लूटी थी.

लेकिन जब चुनाव में हार गए तो फिर एक बार सौदेबाज़ी की कोशिश की. लेकिन इस बार स्टिंग में पकड़े गए. बाक़ायदा सोनिया गांधी का नाम लेते हुए.

हो सकता है कि कांग्रेस आलाकमान की मंज़ूरी रही हो, लेकिन इसे सार्वजनिक तो नहीं किया जा सकता ना? सो, उन्हें पहली बार 2003 में कांग्रेस से निलंबित किया गया.

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यह उनकी ताक़त ही थी कि वह जल्द ही कांग्रेस में लौट आए. यही ताक़त उन्हें कभी मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलने को उकसाती है तो कभी तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की खुले आम बेअदबी के लिए भी.

चाहे उनके राजनीतिज्ञ न बन पाने का आकलन सच हो, लेकिन इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि अजीत जोगी जैसी लोकप्रिय छवि आज भी किसी नेता की छत्तीसगढ़ में नहीं है.

भाषण देने की कला में उनके क़रीब भी कोई नहीं बैठता. अनुभव में वे पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा पर भी भारी पड़ते हैं.

अजीत जोगी दो बार राज्यसभा सदस्य, दो बार लोकसभा सदस्य, एक बार मुख्यमंत्री रहने के अलावा कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रह चुके हैं. उनकी इच्छाशक्ति और जिजीविषा अपने आपमें एक उदाहरण है.

वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव के दौरान वह एक दुर्घटना के शिकार हुए, जिससे उनके कमर के नीचे के हिस्से ने काम करना बंद कर दिया.

उनके राजनीतिक विरोधी यह मान बैठे कि अब वे ज़्यादा दिनों के मेहमान नहीं हैं. लेकिन दस बरसों से अधिक समय हो गया और वे अपनी शारीरिक कमज़ोरी के बावजूद राजनीतिक रूप से ताक़तवर बने हुए हैं.

इंग्लैंड में जिस अस्पताल में वह 2004 में इलाज के लिए पहुंचे थे वहां के डॉक्टर ने मुझसे ख़ुद कहा था कि वह अब किसी भी सूरत में जीवन भर चल नहीं सकते.

लेकिन अजीत जोगी हैं कि हार ही नहीं मानते. कभी चर्चा होती है कि वे स्टेमसेल के ज़रिए ठीक होने की कोशिशों में लगे हुए हैं तो कभी वे रोबोटिक पैरों से चलने की कोशिश करते हैं.

अजीत जोगी पर गंभीर आरोप लगते रहे हैं. कभी कलेक्टर के पद पर रहते हुए रक्षा दस्तावेज अमरीका को देने का, कभी पेट्रोल पंप के लिए झूठा हलफ़नामा देने का, तो कभी फ़र्जी हस्ताक्षर करने का.

हालांकि वह हर बार बच निकले. वह अपनी बेटी के शव को कब्र से निकालकर इंदौर से अपने गृहग्राम में फिर से दफ़नाने का फ़ैसला कर सकते हैं, कभी छत्तीसगढ़ में आदिवासी नेतृत्व ख़त्म करने के लिए अरविंद नेताम को बसपा में जाने के लिए उकसा सकते हैं तो कभी चुनाव में फ़ायदा पाने के लिए अपने प्रतिद्वंद्वी चंदूलाल साहू के नाम से 11 और उम्मीदवार खड़े कर सकते हैं.

वह चुनाव में जीती पार्टी को तोड़ने का प्रयास कर सकते हैं, तो अपनी ही पार्टी के किसी उम्मीदवार को चुनाव न लड़ने के लिए मना सकते हैं. वह अपने विरोधी की लकीर छोटा करने के लिए राजनीतिक दुश्मनों से भी दोस्ती कर सकते हैं.

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लेकिन इस बार जो मामला सामने आया है उसकी वजह से बेटे अमित जोगी को तो पार्टी से निकाला ही जा चुका है और अब उनके ख़ुद के सर पर तलवार लटक रही है. वह शतरंज के ऐसे खिलाड़ी दिखते हैं जो अपनी ही चाल से अपने आपको मात देता रहा है.

वर्ष 2014 में चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने आरोप लगाया था कि शायद अजीत जोगी नेहरू-गांधी परिवार का कोई राज़ जानते हैं, तभी उनको पार्टी बार-बार हार के बाद भी टिकट देती है.

इसमें कितनी सच्चाई है, यह तो नहीं पता. यह ज़रूर है कि नेहरू-गांधी परिवार और अजीत जोगी के बीच इतनी घनिष्ठता रही है कि उनकी उद्दंडता और अनुशासनहीनता को कांग्रेस बहुत बर्दाश्त करती है और उन्हें ग़लतियों के लिए माफ़ कर देती है. इससे वह लगातार ताक़तवर बने रहते हैं.

क्या इस बार भी ऐसा ही होगा?

(विनोद वर्मा अमर उजाला समाचार पत्र समूह के कन्वरजेंस एडिटर हैं और छत्तीसगढ़ पर केंद्रित किताब ‘गढ़ छत्तीस’ के लेखक भी.)

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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