'डर है पुरुषों को राजनीति से संन्यास लेना पड़ेगा'

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संसद और विधान सभाओं में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण का मुद्दा, फिलहाल ठंडे बस्ते में बंद है. पिछले 20 सालों में तमाम चुनावी घोषणाओं और वायदों के बावजूद, देश के सभी मुख्य राजनीतिक दल रहस्यमय मौन साधे हुए हैं.

राज्य सभा में पारित होने के बावजूद ‘महिला आरक्षण विधेयक’ लोकसभा तक नहीं पहुंचा और सुबह का सूरज नहीं देख पाया. ‘आरक्षण में आरक्षण’ से लेकर राजनीति में महिलाओं की भागेदारी के सवाल पर, अभी तक आम सहमति नहीं बनी है.

सच यह है कि इस संदर्भ में, अधिकांश राजनेता ‘शीतयुद्ध’ सी स्थिति बनाए हुए है. मौजूदा स्थितियों-परिस्थितियों में लगता है कि अगले 100 साल तक, कानून बनने की दूर-दूर तक कोई संभावना नज़र नहीं आ रही.

कहने को सभी दल महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व दिए जाने के पक्षधर हैं और तहे-दिल से समर्थन करते हैं, मगर विधेयक पारित ना करने, टालने या लटकाने और उल्झानें के लिए, सब के पास अनेक पेचीदा ‘तर्क-कुतर्क’ तैयार हैं.

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संसद में महिला आरक्षण पर बहस के दौरान भूतपूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जाने-अनजाने कितना सही कहा था, “महिला आरक्षण विधेयक पास हो या ना हो, हमें इसकी रत्ती-भर भी चिंता नहीं है.’’

तत्कालीन चुनाव आयुक्त श्री एमएस गिल ने सुझाव दिया था, “राजनीतिक दलों को बाध्य कर दिया जाए कि वह अपने यहां महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दें. जो दल ऐसा न करे उसकी मान्यता समाप्त कर दी जाए.”

मगर किसी ने भी इसे नहीं माना. पिछली सरकार के गृहमंत्री ने तो यहां तक कह दिया कि “लोकसभा की 181 सीटें बढ़ा दी जाएं और वह महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी जाएं.” एक नेता ने तो यह सुझाव भी दिया था कि “महिलाओं को सरकारी-गैर-सरकारी नौकरी में 33 प्रतिशत आरक्षण देना चाहिए.” इसी तरह के सैंकड़ों सुझाव, तर्क और विचार हर कोने से आते रहे हैं.

पिछले दिनों महिला संगठन एनएफआईडबल्यू और स्त्रीकाल ने संयुक्त तौर पर 'महिला आरक्षण: कहाँ हैं रूकावटे' विषय पर बातचीत का आयोजन किया.

विभिन्न महिला संगठनों के कार्यकर्ताओं, सामाजिक चिंतकों, क़ानूनविदों, पत्रकारों, आदि ने इसमें भाग लिया, मगर मूल बहस जाति प्रतिनिधित्व, अल्पसंख्यक स्त्रियों के प्रतिनिधित्व, पीछे-छूट गए समूहों, आरक्षण के भीतर दलित-आदिवासी-पिछड़े एवं अल्पसंख्यक समूहों की भागीदारी पर ही उलझी रही. बहस नए सिरे से उठती रही है, लेकिन ठोस परिणाम नहीं निकला.

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यह सही है कि पितृ-सत्तात्मक सोच और पुरुष-वर्चस्व की राजनीति के चलते आरक्षण विधेयक पारित होने में अनेक बाधाएँ हैं. संविधान संशोधन होना है, जिसके लिए आधे से अधिक राज्यों की भी सहमति चाहिए.

राजनीतिक दलों की पहली और मुख्य परेशानी यह है कि अगर महिलाओं को संसद और विधान सभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण दिया गया, तो आरक्षण से 33 प्रतिशत से साधारण रूप में कम से कम 8 प्रतिशत सांसद और विधायक महिलाएँ होंगी. 41 प्रतिशत महिलाएं अगर पार्टी लाइन तोड़ कर एक हो गईं, तो आने वाले दौर में पुरुष नेताओं को राजनीति से ‘संन्यास’ लेकर घर बैठना पड़ेगा.

अनुसूचित और जन-जातियों के सांसदों की पीड़ा यह है कि अगर विधेयक पास हुआ, तो उनके 33 प्रतिशत पुरुष सांसद कम हो जाएंगे और शेष राजनेताओं की हैरानी-परेशानी यह भी है कि महिला आरक्षण के बाद साधारण वर्ग के लिए सिर्फ 52 प्रतिशत सीट ही रह जायेंगी.

इसका मतलब यह भी है कि महिलाएं और दलित सांसद मिल गए, तो सवर्णों की राजसत्ता का क्या होगा?

इससे भी अधिक चिंता का कारण यह है कि अगर हर बार के चुनाव में 33 प्रतिशत सीट ‘रोटेट’ होनी हैं, तो हर चुनाव में 33 प्रतिशत पुरुष नेता राजनीति से बाहर हो जाएंगे या उन्हें किसी दूसरे चुनाव क्षेत्र से लड़ना पड़ेगा और ये जीतना आसान नहीं होगा.

परिणाम स्वरूप 15 सालों में तमाम नेता, राजनीति के लिए ‘प्रवासी’ हो जाएंगे.

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कुल मिला कर मर्दों को अपनी हकूमत के लिए, एक नहीं अनेक संकट और ख़तरे साफ़ दिखाई दे रहे हैं. सो ‘आधी दुनिया’ के आरक्षण पर बहस बनाए रखना मजबूरी है, लेकिन ‘किन्तु-परन्तु’ की राजनीति भी करते रहना जरूरी है.

सत्ताधारी दल महिलाओं के सम्मान, सशक्तिकरण और सुरक्षा के बारे में चाहे जितनी मर्जी अकल्पनीय महत्वाकांक्षी घोषणाएं और योजनाएँ बनाये-मिटाये, लेकिन महिला आरक्षण के मुद्दे जब-जब सामने आयेंगे ‘सर्व-सम्मत्ति’ और ‘आम सहमति’ के ‘यक्ष प्रश्न’ उछालते रहेंगाे.

महिला आरक्षण विधेयक को पारित करवाने के लिए, ना कोई राष्ट्रव्यापी महिला आन्दोलन, प्रदर्शन, धरना या संघर्ष दिखाई दे रहा है और ना कोई सकारात्मक सोच, समझ या नेतृत्व. सिर्फ समाजसेवी महिला संगठनों के भरोसे, ‘महिला आरक्षण विधेयक’ पारित होने से रहा.

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ऐसे अँधेरे समय में आशा की एक किरण दिख रही है. देश की कुछ प्रमुख उत्साही और प्रतिबद्ध महिलाएं विकल्प के तौर पर, राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत ‘महिला राजनीतिक दल’ का गठन और रजिस्ट्रेशन करवाने पर गंभीरता से विचार कर रही हैं.

अगर ऐसा कोई राजनीतिक दल बनता, उभरता और सही दिशा में आगे बढ़ता है, तो निश्चित रूप से राजनीति का चेहरा-मोहरा बदल सकता है. हालांकि यह सचमुच एक बड़ी चुनौती है लेकिन मौजूदा राजनीति के लिए बड़ी चेतावनी भी सिद्ध हो सकती है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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