'फांसी से डरता नहीं बढ़ता है चरमपंथ'

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पठानकोट हमले के पहले चरमपंथियों ने पुलिस अधीक्षक सलविंदर सिंह के साथ राजेश वर्मा का अपहरण कर लिया था. उनसे कहा था कि वे अजमल क़साब और अफ़ज़ल गुरु की फांसी का बदला लेने के लिए आए हुए थे.

इसके अलावा भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों का कहना है कि चरमपंथी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने अफ़ज़ल के नाम पर एक दस्ता बनाया है.

जैश ने एक ऑडियो क्लिप भी ऑनलाइन पोस्ट की, जिसमें पठानकोट हमले से निपटने के लिए भारत का मज़ाक़ उड़ाया गया है.

भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों ने चरमपंथियों के बीच फ़ोन पर हुई बातचीत रिकॉर्ड की है. इस बातचीत से पता चला है कि अफ़ज़ल गुरु के भारत की जेल में बिताए 13 सालों का बदला लेने के लिए जैश ने 13 हमलों की योजना बनाई है.

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अफ़ग़ानिस्तान के मज़ार-ए-शरीफ़ स्थित वाणिज्य दूतावास पर हमले के लिए भी जैश पर शक किया जा रहा है. वहाँ चरमपंथियों ने दीवार पर ख़ून से लिख दिया था, ‘अफ़ज़ल गुरु का बदला.’

कुछ लोगों ने साल 2013 में अफ़ज़ल गुरु की फांसी का सैद्धांतिक रूप से विरोध किया था.

लेकिन मैंने अजमल क़साब और अफ़ज़ल गुरु, दोनों को फांसी दिए जाने का विरोध किया था.

मेरे आलोचक इन चरमपंथियों पर ‘दया’ के लिए इस मुद्दे को उठाकर समय-समय पर मेरी खिंचाई करते रहते हैं.

इनकी फांसी का विरोध करते हुए मेरा तर्क था कि फांसी देने से चरमपंथी गुटों के लिए उन्हें ‘शहीद’ का दर्जा देना आसान होता है. इससे और अधिक लोग चरमपंथी गुटों या उनकी मुहिम से जुड़ने के लिए प्रेरित होते हैं.

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क़साब को फांसी दिए जाने से पहले तत्कालीन रॉ प्रमुख बी रमन ने चेतावनी दी थी कि चरमपंथी बदले की कार्रवाई कर सकते हैं.

इस तरह के हमलों का इतिहास भी रहा है.

साल 1984 में कश्मीरी अलगाववादी मक़बूल बट को फांसी देने से उनका गुट 1989 में जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ़) कश्मीर में प्रमुख चरमपंथी गुट बन गया था.

इतिहास से सबक़ न लेना हमारी आदत बन गई है. हम फ़ैसला लेते समय भावनाओं में बह जाते हैं. चरमपंथियों को फांसी की आवाज़ें हमारे दिमाग़ पर हावी हो जाती हैं.

मनमोहन सिंह की सरकार ने अजमल क़साब और अफ़ज़ल गुरु को फांसी लोगों का ध्यान उस समय के राजनीतिक संकट से हटाने के लिए दी थी. सरकार की इस चाल का असर बस कुछ ही हफ़्तों तक रहा.

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कश्मीर घाटी में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई. बहुत लोगों का मानना था कि अफ़ज़ल गुरु निर्दोष थे.

बात तब और बिगड़ गई जब अफ़ज़ल को फ़ांसी पर चढ़ाने से पहले उनके वकील या परिवार को इस बारे में नहीं बताया गया, उनका शव परिजनों को नहीं सौंपा गया.

हमने इस घटना से कश्मीर में अलगाव के और बढ़ने के बारे में भी नहीं सोचा था.

हिंसा से हिंसा पैदा होती है. जैश-ए-मोहम्मद ने अफ़ज़ल गुरु का भावनात्मक इस्तेमाल किया.

चरमपंथियों को जितने समय तक हो सके और जब तक क़ानून इजाज़त दे तब तक जेल में रखा जाना चाहिए. उन्हें स्वाभाविक मौत तक सलाखों के पीछे रखा जा सकता है.

लेकिन हम फांसी पर चढ़ा देंगे तो चरमपंथी गुट उन्हें 'शहीद' का दर्जा दे देंगे. इस तरह हम एक तरह से चरपंथियों की मदद ही करते हैं.

विमान अपहरण का तर्क दिया जाता है. कहा जाता है कि जैश के प्रमुख मौलाना मसूद अज़हर जेल में बंद थे. उन्हें जेल में रखने की बजाय अगर फांसी दे दी जाती तो विमान अपहरण कांड न हुआ होता.

लेकिन फांसी पर लटकाने का ये सही तर्क नहीं है.

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होना यह चाहिए कि क़ानून में इस तरह के बदलाव करने चाहिए कि अमरीका की तरह यहाँ की सरकार भी चरमपंथियों के साथ किसी तरह की बातचीत न करे.

जब चरमपंथियों को यह पता होगा कि साथियों को छुड़ाने के लिए विमान अपहरण की चाल कामयाब नहीं होगी तो वे इस विकल्प का इस्तेमाल नहीं करेंगे.

इसके बजाय, भारत विमान अपहरण विरोधी क़ानून को और सख़्त करने की योजना बना रहा है.

इसके तहत चरमपंथियों को मौत की सज़ा तक दिए जाने का प्रावधान करने की योजना है.

मैं पक्के तौर पर कह सकता हूँ कि इससे हर हाल में मरने के लिए तैयार चरमपंथियों के हौसले और बुलंद ही होंगे.

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हम चरमपंथियों को पकड़ते हैं और उन्हें मौत देकर अच्छा महसूस करते हैं. इसके बाद और चरमपंथी तैयार होते हैं. हम उन्हें मार कर फिर ख़ुश होते हैं. बस, यह क्रम चलता रहता है.

निश्चित तौर पर जैश अफ़ज़ल गुरू को बहाने के रूप में इस्तेमाल कर रहा है. इसका मतलब यह दिखाना है कि भारत कश्मीरियों के साथ कैसा बर्ताव करता है.

लेकिन अगर यह एक बहाना भी है तो फिर उन्हें ऐसा बहाना बनाने का मौक़ा ही क्यों दिया जाए?

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मौत की सज़ा से चरमपंथ पर कोई अंकुश नहीं लग रहा है.

क़साब और अफ़ज़ल गुरु को फ़ांसी देकर भी गुरदासपुर और पठानकोट के हमले नहीं रोके जा सके.

न ही इन फांसियों से 26/11 के पीड़ितों को न्याय मिला. वे अब भी ज़की उर्रहमान लखवी और हाफ़िज़ सईद को सज़ा मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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