काग़ज़ और क़लम से ज़ख़्मी की जान बचाई

डॉक्टर फ़ैज़ा अंजुम और डॉक्टर सावित्री देवी इमेज कॉपीरइट Faizah Anjum

हैदराबाद से सटे सिकंदराबाद के अपोलो अस्पताल की दो महिला डॉक्टरों ने सड़क पर 'मृत मान लिए गए' एक घायल की जान बचाई है.

डॉ फ़ायज़ा अंजुम और डॉक्टर सावित्री देवी क़रीब तीस डॉक्टरों के साथ रविवार शाम पिकनिक मनाने गईं थीं.

उनकी बस के ड्राइवर ने बताया कि आगे हादसा हुआ है, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई है. इसलिए उसे बस मोड़नी पड़ेगी.

दूसरे डाक्टर रेस्त्रां में चले गए, लेकिन फ़ायज़ा अंजुम और सावित्री देवी वहां गईं, हादसा जहां हुआ था.

वे भीड़ को हटाते हुए घायल के पास पहुँची. लोगों ने घायल व्यक्ति को मृत मान लिया था.

लेकिन डॉक्टर फ़ायज़ा और सावित्री देवी ने उसकी आँखों की पुतलियां देखी तो उन्हें लगा कि वो व्यक्ति अभी ज़िंदा है और उसे बचाया जा सकता है.

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दोनों डॉक्टर उसे बचाने में जुट गईं. वे उन्हें क़रीब बीस मिनट तक कृत्रिम तरीक़े से सांस लेने में मदद करती रहीं. आख़िरकार उनकी सांसें लौट आईं.

डॉक्टर फ़ायज़ा ने बीबीसी को बताया, "हमारे पास कोई भी चिकित्सीय उपकरण नहीं था, सिवाए अपने अनुभव के. हमने लोगों से पेपर मांगा और उसका पाइप बनाकर मुंह से घायल को ऑक्सीजन देते रहे."

फ़ायज़ा ने बताया, "डॉक्टर सावित्री उसे ऑक्सीजन दे रहीं थी और मैं सीने पर सीपीआर दे रही थी. बीस मिनट की कोशिशों के बाद उनकी सांस लौट आई."

उन्होंने बताया, "क़रीब 25 मिनट बाद वहां एंबुलेंस भी पहुँच गई. हमने घायल को एंबुलेंस में शिफ़्ट किया और सेलीन और ऑक्सीजन दी. हम दो किलोमीटर तक एंबुलेंस में उनके साथ रहे."

स्थानीय नरसिंगी थाने के इंस्पेक्टर पी रामचंदर राव ने बीबीसी को बताया, "सड़क पर टहल रहे एक व्यक्ति को राज्य परिवहन निगम की बस ने टक्कर मार दी थी. घायल को उस्मानिया जनरल अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उसकी हालत ठीक है."

सड़क हादसे में मृत मान लिए गए शख़्स की जान बचाने के बारे में फ़ायज़ा कहती हैं, "कई बार हम अस्पताल में पूरी कोशिशों के बाद भी मरीज़ को नहीं बचा पाते हैं. लेकिन उस घायल की जान बचाकर मुझे लग रहा है कि एमबीबीएस की मेरी पढ़ाई सार्थक हो गई."

Image caption हाल ही में आईएएस परीक्षा की टॉपर इरा सिंघल ने सड़क हादसे में लोगों के मदद न करने से जुड़ा एक अनुभव फ़ेसबुक पर साझा किया था.

वो कहती हैं, "हमारे पास सिर्फ़ एक पेन था हमने लोगों से काग़ज़ मांग लिया. इन दो चीज़ों की मदद से ही हम घायल को रिवाइव करने में कामयाब रहे."

फ़ायज़ा और सावित्री ने मरीज़ का नाम नहीं पूछा. वो मरीज़ के बारे में सिर्फ़ इतना ही जानती हैं कि वह तीस साल का युवक था, जिसके आगे पूरी ज़िंदग़ी पड़ी है.

फ़ायज़ा एक-दो दिन में घायल का हालचाल जानने के लिए जाएंगी. वो बताती हैं, "हमने पता किया है, वे फ़िलहाल ख़तरे से बाहर है."

क्या उन्हें घायल के बचने की उम्मीद थी, इस पर फ़ायज़ा कहती हैं, "हम बस हर मुमकिन कोशिश कर रहे थे. अच्छा लग रहा है कि हमारी कोशिश कामयाब हुई."

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक़ भारत में औसतन हर घंटे 16 लोगों की मौत सड़क हादसों में होती है.

साल 2014 में एक करोड़ 41 लाख लोगों की मौत सड़क हादसों में हुई थी. रिपोर्टों के मुताबिक़ तुरंत प्राथमिक चिकित्सा न मिल पाना हादसों में मौतों का एक बड़ा कारण है.

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