जो गायब हैं कैलेंडर में हैं..

इमेज कॉपीरइट MAJID JAHANGIR

"किसी ने मेरे दरवाज़े की रस्सी खींची और मेरे दरवाज़े से ग़ायब हो गया, मेरा दिल डूब गया कि मेरा महबूब आ गया, उसने अपनी बाहें खोलीं और मैंने अपने बाज़ू: आह, मेरे दोस्त वो क्यों नहीं आया?"

कश्मीरी ज़ुबान के मशहूर शायर रसूल मीर के इस शेर के साथ कश्मीर में लापता लोगों के नाम पर बनाए गए कैलेंडर के पहले पन्ने की शुरुआत होती है.

साल 2016 के लिए जारी इस कैलेंडर को एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स ऑफ़ डिसअपीर्ड पर्सन्स (एपीडीपी) ने जारी किया है.

एपीडीपी कश्मीर में लापता लोगों के लिए पिछले दो दशकों से काम कर रही है.

इमेज कॉपीरइट MAJID JAHANGIR

भारतीय सुरक्षा एजेंसियों पर पिछले 27 सालों में कश्मीर के हज़ारों लोगों को कथित तौर पर जबरन ग़ायब करने का इल्ज़ाम है.

इन आरोपों के बारे में सेना से कई बार संपर्क किया गया लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

एपीडीपी के आकड़ों के मुताबिक़ साल 1989 से अब तक भारत प्रशासित कश्मीर में 8000 से लेकर 10000 तक लोग लापता हैं.

लापता हुए ऐसे बारह लोगों की तस्वीरें इस कैलेंडर के बारह पन्नों पर लगाए गए हैं. हर तस्वीर के साथ-साथ हर शख़्स के लापता होने की कहानी भी लिखी गई है.

कैलेंडर का हर महीना एक लापता शख़्स के नाम किया गया है.

एपीडीपी की मुखिया परवीना अहंगर का कहना है कि इस कैलेंडर के ज़रिए लापता लोगों की कहानी हर उस शख़्स तक पहुंचेगी जो इस लड़ाई को ज़िंदा रखना चाहते हैं.

इमेज कॉपीरइट MAJID JAHANGIR
Image caption परवीना का बेटा जावेद अहमद भी पिछले 25 सालों से लापता है.

वो बताती हैं, "इस कैलेंडर को बनाने का मक़सद आम लोगों तक कश्मीर में इन लापता लोगों की बात पहुंचाने की है. साथ ही सरकार से यह पूछना भी इसका मक़सद है कि हमारे बच्चे कहां हैं? "

वो कहती हैं, "हम हर साल ऐसा ही एक कैलेंडर जारी किया करेंगे ताकि सरकार और लोग इस अहम मुद्दे को भूल ना जाए."

परवीना का बेटा जावेद अहमद भी पिछले 25 सालों से लापता है. जावेद अहमद की कहानी और तस्वीर भी कैलेंडर के अगस्त महीने के पन्ने पर मौजूद है.

कैलेंडर में दी गई जानकारी के मुताबिक़ 'जावेद को सेना कथित तौर पर घर से उठा कर ले गई थी' और आज तक वो वापस नहीं लौटा.

इमेज कॉपीरइट MAJID JAHANGIR

परवीना बताती हैं कि अभी तक सुरक्षा एजेंसियों की ओर से कैलेंडर पाने के लिए उनको कई फ़ोन आए हैं.

ब्लैक एंड व्हाइट में तैयार किए गए इस कैलेंडर को फ़ाइन आर्ट्स के कुछ छात्रों ने बनाया है.

कैलेंडर पर हब्बा ख़ातून और उर्दू शायर फैज़ अहमद फैज़, अहमद फ़राज़ और फ़ारसी शायर हाफ़िज़ शिराज़ी के अलावा दूसरे कश्मीरी शायरों के शेर लिखे गए हैं.

कैलेंडर का पहला महीना श्रीनगर की बोट कॉलोनी के रहने वाले अब्दुल हमीद भड्यारी से शुरू होता है.

इमेज कॉपीरइट MAJID JAHANGIR
Image caption गुलाम नबी ने जैसे ही लापता लोगों के इस कैलेंडर को देखा तो वो रो पड़े.

कैलेंडर पर दी गई जानकारी के मुताबिक़ हमीद साल 2000 से लापता हैं.

अब्दुल हमीद पेशे से ऑटो ड्राइवर थे. उनकी बीवी, दो बच्चे और भाई बशीर अहमद आज भी उनका इंतज़ार कर रहे हैं.

कैलेंडर पर अपने भाई की तस्वीर देखकर बशीर अहमद को कुछ उम्मीद जगी है.

वो कहते हैं, "इस कैलेंडर से कम से कम इतना फ़र्क़ तो पड़ेगा कि ये कैलेंडर हर किसी के नज़रों में रहेगा और हर वक़्त ये कैलेंडर मेरे भाई जैसे लोगों की कहानी कहता रहेगा."

इमेज कॉपीरइट MAJID JAHANGIR

वहीं ग़ुलाम नबी साल 2000 से अपने बेटे का इंतज़ार कर रहे हैं जो लापता होने के समय 18 साल के थे.

ग़ुलाम नबी, अब्दुल हमीद को भी अच्छी तरह से जानते थे. ग़ुलाम नबी ने जैसे ही लापता लोगों के इस कैलेंडर को देखा तो वो रो पड़े.

वह कहते हैं, "इस तरह के कैलेंडर के आने से इतना तो होगा कि सबको इस मामले के बारे में पता चलेगा. कुछ ना कुछ तो होगा."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार