नेतृत्व अखिलेश का, सरकार मुलायम भरोसे

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मुख्यमंत्री बनने के क़रीब चार साल बाद अखिलेश यादव इतना साहस जुटा पाए कि वह अपने पिता और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के फ़ैसले के ख़िलाफ़ नाराज़गी ज़ाहिर कर सकें.

इतना ही नहीं, अखिलेश की नाराज़गी के चलते मुलायम सिंह को अपना फ़ैसला वापस लेने को मजबूर होना पड़ा.

25 दिसंबर 2015 को मुलायम सिंह ने अखिलेश के तीन क़रीबी नेताओं को पार्टी विरोधी गतिविधियों की वजह से निकाल दिया था.

अपने चहेते सुनील सिंह साजन, आनंद भदौरिया और सुबोध यादव के निकाले जाने से नाराज़ अखिलेश ने 26 दिसंबर से शुरू हुए सैफ़ई महोत्सव का बहिष्कार कर इसे प्रतिष्ठा का मुद्दा बना लिया.

यह पहला मौक़ा था जब अखिलेश सैफ़ई महोत्सव के उद्घाटन पर नहीं पहुँचे.

पांच दिन बाद जब अखिलेश सैफ़ई गए तो क़यास लगाया गया कि उनके क़रीबियों की वापसी पर पिता-पुत्र में समझौता हो गया है. और वैसा ही हुआ.

दो जनवरी को मुलायम सिंह को सुनील सिंह और आनंद भदौरिया को पार्टी में लेना पड़ा. सुबोध यादव की वापसी पांच जनवरी को हुई.

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सुनील सिंह ने इस बारे में कहा, "कोई न कोई शिकायत रही होगी. समीक्षा हुई होगी. उसके बाद माफ़ कर दिया गया होगा."

परिवार में मतभेद के चलते मुलायम ने तो अखिलेश के क़रीबियों को पार्टी में फिर ले लिया, पर बदले में अखिलेश यादव ने नेताजी के क़रीबी माने जाने वाले मधुकर जेटली को अभी भी मंत्रिमंडल में वापस नहीं लिया है.

जेटली उत्तर प्रदेश प्रवासी भारतीय और बाह्य सहायता प्राप्त परियोजना विभाग के सलाहकार थे और उन्हें राज्य मंत्री का दर्जा मिला हुआ था. अखिलेश ने उन्हें आठ अक्तूबर 2015 को उस पर से हटा दिया था.

मधुकर जेटली के नज़दीकी सूत्रों की मानें तो उन्हें भी जल्द ही वापस ले लिया जाएगा. इनके मुताबिक़ इसका संकेत आगरा में हुए प्रवासी भारतीय दिवस में मिला जहां जेटली को भी बुलाया गया था.

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जेटली वापस सलाहकार बनेंगे या नहीं, यह तो समय बताएगा लेकिन समाजवादी पार्टी में चल रही यादव परिवार के अंदर की राजनीति अखिलेश सरकार की गिनी-चुनी उपलब्धियों पर पानी फेर रही है. और जब पार्टी का मुखिया ही सरकार के काम से नाख़ुश हो तो बाक़ी कोई क्यों ख़ुश होगा?

2012 से अब तक कई बार मुलायम सबके सामने अखिलेश सरकार की बुराई कर चुके हैं. सरकार बनने के चार महीने बाद ही मुलायम ने कह दिया था कि वे सरकार के काम से ख़ुश नहीं हैं.

अक्तूबर 2013 में मुलायम ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि मंत्रियों, विधायकों और सांसदों के ग़लत कामों की सज़ा उन्हें न दें.

नवंबर 2014 में मुलायम ने धीमी गति से हो रहे विकास कार्य पर अखिलेश सरकार की बुराई करते हुए कहा कि उन्हें सिर्फ़ नींव के पत्थर लगाने की ही ख़बर मिलती है, किसी योजना के उद्घाटन की नहीं.

अगस्त 2015 में भी मुलायम ने अखिलेश को डांटा कि वो उनकी बात पर ध्यान नहीं देते हैं.

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पहले भी कई मौक़ों पर मुलायम ने अखिलेश सरकार और उनके मंत्रियों के काम की बुराई की है.

दूसरी तरफ़ अखिलेश के चाचा शिवपाल यादव हैं जिनको उनके चहेते 'विकास पुरुष' मानते हैं.

ऐसे में प्रदेश का विकास अखिलेश यादव कर रहे हैं या शिवपाल ये कौन तय करेगा पता नहीं.

लेकिन एक बात जो सबको मालूम है वो ये है कि अखिलेश अपने चाचा के विभागों सिंचाई और पीडब्ल्यूडी में हस्तक्षेप नहीं कर सकते हैं.

परिवार में चल रही उथल-पुथल के अलावा, प्रदेश के शहरी विकास मंत्री मोहम्मद आज़म खान भी अपने बेतुके बयानों से अखिलेश की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं. लेकिन आज़म ख़ान के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई करने का साहस अखिलेश नहीं जुटा पा रहे हैं.

प्रदेश सरकार के शुरुआत के दिनों में ही आज़म ख़ान ने अखिलेश यादव को संकेत दे दिया था कि उनको हिला पाना मुख्यमंत्री के लिए मुश्किल है. जुलाई 2012 मेरठ से चुने गए विधायक शाहिद मंज़ूर की शिकायत पर आज़म ख़ान से मेरठ ज़िले का चार्ज छीन लिया था.

इस पर भड़के आज़म खान ने ग़ाज़ियाबाद और मुज़फ़्फ़रनगर का चार्ज भी वापस करने की धमकी दी और साथ ही मंत्रिमंडल से इस्तीफ़े की भी पेशकश कर दी. मुख्यमंत्री ने दूसरे ही दिन अपना फ़ैसला वापस ले लिया.

नवंबर 2015 में जब पेरिस में आतंकी हमला हुआ तब आज़म ने बयान दिया कि विश्व शक्तियों के सीरिया पर हमले की ये प्रतिक्रिया थी. जब हर तरफ़ से इस बयान की निंदा हुई तब अखिलेश यादव को भी सफ़ाई देनी पड़ी कि उनकी पार्टी आज़म के बयान की कठोर शब्दों में निंदा करती है.

भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक का मानना है कि मुलायम सिंह ने पक्ष और विपक्ष दोनों की भूमिका को बख़ूबी निभाया है.

पाठक की राय में, "सत्ता के विभिन्न केंद्र तो अभी भी हैं लेकिन विपक्ष की भूमिका निभा कर मुलायम अखिलेश को कई और मुश्किलों से बचा लेते हैं."

पाठक ज़िला पंचायत अध्यक्षों के लिए हुए चुनाव का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि चुनाव की ज़िम्मेदारी तो शिवपाल यादव की थी लेकिन जीत के लिए अखिलेश सरकार की विकास की नीतियों को मिला.

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पाठक ने कहा मुलायम के लिए ऐसा करना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि चुनाव में अखिलेश ही समाजवादी पार्टी का "विज्ञापन" होंगे. अखिलेश की मजबूरी है कि जहां तक संभव हो वो मुलायम के ही इशारों पर काम करें.

पहली बार मुख्यमंत्री बने अखिलेश यादव को सरकार के कई अफ़सर प्रशासनिक कामों में अपरिपक्व बताते हैं.

इन अफ़सरों की मानें तो मुख्यमंत्री सचिवालय एनेक्सी में पंचम तल पर स्थित अपने दफ़्तर यदा-कदा ही जाते हैं. अधिकतर अधिकारियों का मानना है कि नाराज़ अखिलेश की बात भले ही रख ली गई हो, प्रदेश सरकार मुलायम सिंह के भरोसे ही चल रही हैं.

31 दिसंबर को रिटायर हुए आईएएस अधिकारी एस पी सिंह कहते हैं कि सरकार में कई "कंट्रोल सेंटर्स हैं" इसलिए ब्यूरोक्रेसी भी मज़े कर रही है. सिंह ने बताया कि अभी आदेश हुआ था कि सभी प्रमुख सचिवों को ज़िलों का दौरा करना होगा और वहाँ कम से कम एक रात गुज़ारनी होगी. कौन प्रमुख सचिव गया?

ऐसे में करोड़ों रुपये विज्ञापनों पर ख़र्च करने के बाद भी जनता के बीच अखिलेश सरकार की छवि कैसी बनेगी इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

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