तूतीकोरिन तट पर 45 व्हेलों ने दम तोड़ा

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तमिलनाडु के तूतीकोरिन तट पर दिन भर में 45 व्हेल मरी पाई गईं.

यहां काम कर रहे सुगंधि देवदासन समुद्री शोध संस्थान के निदेशक डा. पैटरसन एडवर्ड ने इसकी पुष्टि कर दी है.

उन्होेंने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "कम से कम 45 व्हेल मर गईं. इसके अलावा दूसरी 36 व्हेलों को बचाया जा सका और उन्हें वापस पानी में छोड़ दिया गया. पर वे अभी भी तट के आस पास ही हैं. यह कहना मु्श्किल है कि वे बच पाएंगी या नहीं."

उन्होंने कहा कि पिछली बार इस तरह की घटना 1973 में हुई थी. उस समय यहां 147 व्हेल मर गई थीं.

मौजूदा घटना में मनपद और अलथुलई के बीच पांच किलोमीटर के समुद्री तट पर व्हेल पाई गईं.

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स्थानीय लोग, सरकारी अधिकारी, एक स्थानीय मत्स्य पालन कॉलेज के छात्र और तमाम दूसरे लोगों ने मिल कर इन ह्वेंलों को वापस पानी की अोर धकेलने की कोशिश की. पर बाद में वे व्हेल फिर तट पर आ पंहुचीं.

'मरीन मैमल्स ऑफ़ इंडिया' के लेखक और व्हेल पर काफ़ी अध्ययन करने वाले कुमारन सतसिवम ने बीबीसी से कहा, "यहां यह ज़रूरी है कि तुरंत इन व्हेलों को वापस पानी की ओर धकेल दिया जाए. ऐसा नहीं हुआ तो ये व्हेल फिर संकट से घिरी व्हेल के पास आ जाएंगी. व्हेल एक तरह की आवाज़ पैदा करती हैं, जिन्हें मनुष्य नहीं सुन सकता. पर दूसरी व्हेल सुन कर इकट्ठा होने लगती हैं."

व्हेल 30-40 के झुंड में चलती हैं. उनके समुद्र तट पर आने की कई वजहें हो सकती हैं. यह मुमकिन है कि किसी एक व्हेल ने संकट में फंस कर मदद की गुहार लगाई हो.

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सतसिवम ने कहा, "इसकी व्याख्या करने के लिए कई सिद्धांत हैं. यह मुमकिन है कि व्हेल की कान में इनफ़ेक्शन हो और वे आवाज़ पर निर्भर हों. यदि कान ख़राब हो जाए तो उनके पानी में चलने फिरने की क्षमता बुरी तरह प्रभावित हो सकती है."

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उन्होेंने इसके आगे कहा, "व्हेल का वज़न बहुत ज़्यादा होने के कारण तुरंत वापस पानी में लौट जाना व्हेल के लिए बहुत आसान नहीं होता है. उनका शरीर गर्म हो जाता है. वे तट पर ही मर जाती हैं. उनके शरीर पर लागातार पानी डालते रहना होता है, क्योंकि उनके शरीर का बाहरी स्तर वसा का बना होता है."

सतसिवम के मुताबिक़, व्हेल को बचाना बहुत मुश्किल होता है. उन्हें तुरंत वापस पानी में छोड़ना ज़रूरी होता है. इसके बहुत विकल्प नहीं हैं. कई बार ये व्हेल काफ़ी थक जाती हैं और एक बार फिर तट पर लौट आती हैं.

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