एक्सटेंशन तो मिलेगा पर खुली छूट नहीं

अमित शाह

बुधवार शाम अमित शाह अपने सरकारी बंगले के लॉन में कुछ पत्रकारों से एक सरकारी योजना पर बात कर रहे थे.

माहौल थोड़ा हल्का हुआ तो मैंने पूछा, "अमित जी, भाजपा अध्यक्ष पद के लिए चयन कब होने को है?" जवाब मिला, "जब चुनाव की तारीख घोषित होगी, मैं अपना नामांकन भर दूंगा."

जवाब एकदम संतुलित था लेकिन मेरे साथ-साथ कुछ दूसरे पत्रकारों के चेहरों पर मुस्कान बिखेर गया. क्योंकि भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष अमित शाह को इसी पद पर एक और एक्सटेंशन या दोबारा नामांकन महज़ औपचारिकता ही लगती है.

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वैसे अगर गृहमंत्री राजनाथ सिंह की मानें तो ''शाह फिलहाल राजनाथ द्वारा छोड़े गए स्थान की पूर्ति कर रहे थे और अब भी तीन-तीन वर्ष के दो कार्यकालों के दावेदार हो सकते हैं." यानी अगले तीन साल तक भाजपा की कमान अमित शाह के पास ही रहने की संभावना मज़बूत हो चुकी है.

इधर भाजपा सूत्रों के मुताबिक़ "अमित शाह के नाम पर पहले ही सहमति बन चुकी है और आरएसएस की तरफ़ से भी आखिरकार हरी झंडी दिखाई जा चुकी है."

हालांकि सूत्र बताते हैं कि संघ इस बात से बहुत सहज नहीं है कि प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष एक ही प्रदेश से हों, लेकिन आरएसएस अभी मोदी सरकार की रणनीति पर सीधे हस्तक्षेप करने से बचना चाह रहा है.

आरएसएस इसे बखूबी समझता है कि हाल ही में बिहार चुनाव में भाजपा को करारी शिकस्त मिली है और पार्टी में सीधे दखल देने की कोशिश के संकेत ग़लत जा सकते हैं.

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लेकिन जानकार बताते हैं कि पहले दिल्ली और फिर बिहार में अमित शाह के नेतृत्व पर उठे सवालों से संघ पूरी तरह सचेत भी है और शायद आगामी असम, बंगाल और यूपी चुनावों में ये खुलकर दिख सकता है. भाजपा सूत्र ये भी बताते हैं कि अमित शाह का अध्यक्ष बनना कई दिनों से तय है और इसी के चलते उन्होंने 2017 में होने वाले उत्तर प्रदेश चुनावों के लिए अपनी योजनाएं शुरू भी कर दी हैं.

मिसाल के तौर पर उन्होंने यूपी के लिए तीन लोगों की नियुक्ति की है, जिनमें से दो लोगों को मोदी-शाह खेमे का और एक तीसरे को संघ के निकट बताया जा रहा है.

सुनील बंसल 2014 के आम चुनावों में यूपी में खासे सक्रिय थे और ओम माथुर पहले से नरेंद्र मोदी के क़रीबी रहे हैं.

लेकिन तीसरी नियुक्ति शिव प्रकाश की है, जो राम माधव के साथ भाजपा में शामिल होने से पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में संघ के क्षेत्र प्रचारक थे.

यानी उत्तर प्रदेश में अमित शाह के हाथ में पूरी कमान तो है, लेकिन संघ की नज़र ही नहीं. लोग भी इस प्रक्रिया में शामिल हो चुके हैं, जो शायद शाह उतना पसंद न कर रहे हों.

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इन नियुक्तियों के बाद से यूपी के 51 ज़िलों में भाजपा के नए जिलाध्यक्षों की नियुक्तियां हो चुकी हैं और प्रदेश के जातीय समीकरणों को देखते हुए इनमें से दो दर्जन पिछड़े और दलित वर्ग के हैं.

हालांकि प्रदेश प्रवक्ता चन्द्रमोहन कहते हैं, "चुनाव जीतने के लिए सभी एक दूसरे से हाथ मिलाकर जुट चुके हैं और सपा सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी ख़त्म करने की आवश्यकता है."

लेकिन अभी यूपी भाजपा प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा होनी है और सूत्र बताते हैं इसमें भी अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा को संघ को भरोसे में लेना ही होगा.

रही अमित शाह के भाजपा अध्यक्ष बनने की बात, तो इसका अंदाज़ा इसी बात से लगा लें कि पिछले एक महीने से यूपी में बारी-बारी पहुँचे लगभग एक दर्जन केंद्रीय मंत्रियों को पार्टी से एक आदेश मिला है.

आदेश यह है कि सभी मंत्रियों के लिए अपने दौरे के दौरान रात्रि विश्राम अनिवार्य कर दिया गया है.

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