बोलने की आज़ादी पर भारी साल

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पिछले साल अगस्त के अंत में मैं पटेल समुदाय के आरक्षण की मांग पर हिंसा की कवरेज करने गुजरात गया था. हिंसा में आठ नागरिक मारे गए थे.

पटीदारों के आंदोलन का नेतृत्व युवा नेता हार्दिक पटेल कर रहे थे.

वह पुलिस से बचते हुए, एक ख़ुफ़िया जगह पर पत्रकारों से मुलाक़ात कर रहे थे. माहौल में तनाव साफ़ महसूस हो रहा था.

पत्रकारों की एक टीम ने हमारे साथ हर जगह आकर हमारी मदद की. मैंने पूछा कि क्या आप अपने चैनल के लिए इतनी बड़ी घटना कवर नहीं करेंगे?

जवाब आया- स्थानीय चैनलों के संपादक और मालिकों ने हिंसा की रिपोर्टिंग पर रोक लगा दी है. आगे उन्होंने कहा कि ऐसा उन्होंने राज्य सरकार के दबाव में आकर किया है.

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आंदोलन और हिंसा के दौरान राज्य सरकार ने इंटरनेट और वाईफ़ाई कनेक्शन काट दिए थे. समर्थकों के अनुसार राज्य सरकार नहीं चाहती थी कि आंदोलन की ख़बरें राज्य से बाहर जाएं.

पिछले महीने तमिलनाडु में भी स्थानीय पत्रकारों ने राज्य के बाहर से आए पत्रकारों की खूब मदद की. इस मदद का कारण था मुख्यमंत्री जयललिता का खौफ़.

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उनके समय अब तक 200 पत्रकारों और पत्रिकाओं के ख़िलाफ़ मानहानि के केस दर्ज हुए हैं.

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एक अख़बार के अनुसार राज्य मानहानि मुक़दमों की राजधानी बनकर रह गया है.

साल 2015 'फ्री स्पीच" या बोलने की आज़ादी के लिए एक बुरा साल साबित हुआ, जिस दौरान आठ पत्रकारों और दो बुद्धिजीवियों की हत्याएं हुईं.

उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में स्थानीय पत्रकारों को सर्वाधिक सरकारी नाराज़गी और सेंसरशिप झेलनी पड़ी.

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में जगिंदर सिंह नामक एक पत्रकार की उस समय जलकर मौत हो गई, जब पुलिस उन्हें गिरफ़्तार करने उनके घर पहुँची थी.

जगिंदर सिंह राज्य के एक मंत्री के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाया करते थे.

जगिंदर सिंह की तरह पत्रकार संदीप कोठारी, अक्षय सिंह, राजा चतुर्वेदी और हैदर खान भी प्रशासन, माफ़िया और घोटालों की ख़बरों को बाहर करने में लगे थे. इन सभी पत्रकारों की मौत अब तक पहेली बनी हुई है.

मीडिया पर नज़र रखने वाली ऑनलाइन पत्रिका " द हूट" के अनुसार 2015 में पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों के ख़िलाफ़ राज्य सरकारों ने मानहानि के 48 मुक़दमे दर्ज किए. उन पर हमलों की 30 घटनाएं घटीं और उनके ख़िलाफ़ राजद्रोह के 14 मुक़दमे लगाए गए.

पत्रिका का दावा था कि गए साल में सर्वाधिक सरकारी नाराज़गी मीडिया वालों को उठानी पड़ी.

अगर राज्य सरकारों पर अपने ख़िलाफ़ उठने वाली आलोचना की आवाज़ें ख़ामोश करने के इल्ज़ाम लगे तो केंद्र सरकार पर भी सेंसरशिप के आरोप लगाए गए.

सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने सामूहिक बलात्कार और हत्या की शिकार निर्भया पर बनी डॉक्यूमेंट्री न दिखाए जाने का आदेश सभी चैनलों को दिया, जिसका पालन हुआ और बीबीसी के ख़िलाफ़ एक लीगल नोटिस भेजा गया.

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मंत्रालय ने मुंबई में 1993 के सिलसिलेवार बम धमाकों के आरोपी याकूब मेमन को फांसी दिए जाने पर विशेष प्रोग्राम करने वाले तीन न्यूज़ चैनलों को कारण बताओ नोटिस भेजा, जिसकी काफ़ी निंदा की गई.

2015 में लगभग 20 फ़िल्मों को सेंसर बोर्ड की कैंची का सामना करना पड़ा. कलाकारों ने सेंसर बोर्ड के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की जुर्रत तक नहीं की.

साल 2015 'फ्री स्पीच' और बोलने की आज़ादी के लिए बुरा साल था. वरिष्ठ पत्रकार, कलाकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं को इसका डर है कि 2016 इससे भी बुरा साबित हो सकता है.

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