चरमपंथियों के स्मारक के लिए 15 दिन से हड़ताल

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भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर के पुलवामा क़स्बे में लोग मारे गए चरमपंथियों का स्मारक बनाने की मांग को लेकर पिछले पंद्रह दिन से हड़ताल पर हैं.

बुधवार को प्रशासन और पुलवामा के लोगों के बीच बातचीत के दौरान इस बात पर प्रशासन ने सहमति जताई थी कि स्मारक बनाने की इजाज़त दी जाएगी और गिरफ़्तार युवकों को रिहा किया जाएगा.

लेकिन देर रात प्रशासन ने इरादा बदल दिया. इसके बाद गुरुवार को फिर हड़ताल का सिलसिला शुरू हो गया.

कुछ दिन पहले पुलवामा निवासी लश्कर चरमपंथी उमेश शेख सेना के साथ झड़प में मारे गए थे. इसके बाद पुलवामा में स्मारक लगाने की मांग को लेकर हड़ताल शुरू हो गई.

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पुलवामा के व्यापार संघ के मुखिया बशीर अहमद का कहना है कि इस हड़ताल का आह्वान किसी संगठन ने नहीं किया है.

बशीर अहमद के मुताबिक़ पहले ऐसा स्मारक बनाने की मांग की जा रही थी जिसमें मारे गए चरमपंथियों की तस्वीरों के साथ साथ बंदूक़ की तस्वीर लगाना भी शामिल था. लेकिन बाद में यह प्रस्ताव वापस ले लिया गया.

बशीर अहमद के मुताबिक़ इस बंद की वजह से हर दिन यहां व्यापारियों को लगभग छह करोड़ रुपये का नुक़सान उठाना पड़ रहा है.

पुलवामा क़स्बे में कपड़े की दुकान चलाने वाले फ़िरोज़ अहमद वाणी का कहना है वह अब पुलवामा से निकल कर दूसरे क्षेत्रों में कारोबार करने जाते हैं.

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उन्होंने बीबीसी को बताया, "हर दुकानदार ने बैंक से लोन लिया है. जब दुकानें ही बंद हैं तो हम बैंक को क्या देंगे. मुझे नहीं लगता कि स्मारक लगाने से कोई फ़र्क़ पड़ सकता है. जो मर गए उनके नाम लिखने से कौन सी क़यामत आएगी. हमारा कारोबार बुरी तरह प्रभावित हो रहा है. प्रशासन को अपनी ज़िद छोड़नी चाहिए."

कश्मीर के अलगाववादी नेताओं ने पुलवामा में स्मारक लगाने का समर्थन किया है.

हुर्रियत कांफ्रेंस गिलानी गुट के प्रवक्ता अयाज़ अकबर बताते हैं,"पुलवामा में स्मारक लगाने को लेकर जो चल रहा है उसमें हुर्रियत कांफ्रेंस का सीधे तौर पर कोई हाथ नहीं है. लेकिन जहां तक स्मारक लगाने की बात है तो उसमें किसी को ऐतराज़ नहीं होना चाहिए."

वह कहते हैं, "वहां दर्जनों युवाओं की गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ हमने लोगोंं से कल जुमे की नमाज़ के बाद शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की अपील की है."

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पुलवामा के डिविज़नल कमिश्नर से बार-बार संपर्क करने की कोशिश के बावजूद उन्होंने फ़ोन नहीं उठाया.

पिछले 25 साल में कश्मीर में मारे गए चरमपंथी और सुरक्षा बलों की गोलियों से मारे गए आम लोगों के लिए हर ज़िले में अलग से "मज़ार-ए-शुहदा" बनाए गए हैं.

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