क्या भारत आर्थिक मंदी की तरफ़ बढ़ रहा है?

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हम अपने आर्थिक इतिहास के सबसे विचित्र दौर से गुज़र रहे हैं. वित्त मंत्री ने हाल ही में कहा कि इस साल भारतीय जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) की विकास दर 9 फ़ीसदी के आसपास रहेगी.

एक सच्चाई ये भी है कि मौजूदा केंद्र सरकार अब तक की अपनी इकलौती उपलब्धि का हवाला देते हुए यही कहती रही है कि भारत दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है.

अगर हम सरकारी बयानों पर भरोसा करें तो दुनिया भर की आर्थिक स्थिति संकट में है लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था उसमें किसी शांत द्वीप समूह की भांति स्थिर है.

इसके मुताबिक़ मनमोहन सिंह की ख़राब अर्थव्यवस्था वाला दौर अब बीत चुका है.

हालांकि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद स्टॉक मार्केट में गिरावट आई है, रुपये का अवमूल्यन हुआ है. यही वजह है कि सरकार के आशावादी रुझान और बाज़ार के रुझान में तालमेल नहीं दिख रहा है.

एनडीटीवी के प्रणय रॉय के साथ एक बेहतरीन साक्षात्कार में मोर्गन स्टेनले के रुचिर शर्मा ने भारतीय आर्थिक परिदृश्य के बारे में कुछ अहम बातें कही हैं. उन्होंने वैश्विक बाज़ार के रुझानों का अध्ययन किया है.

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उसके आधार पर एकत्रित आंकड़ों और संकेतों के आधार पर रुचिर ने जो बातें कहीं है, उनमें पहली बात तो यही है कि 2015 के दौरान वैश्विक कारोबार में शून्य प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है.

दूसरी बात ये है कि शून्य प्रतिशत बढ़ोत्तरी अमूमन मंदी के समय होती है, इसका मतलब ये हुआ कि हम लोग मंदी में प्रवेश कर रहे हैं. इसके अलावा एक संकेत ये भी है कि मंदी अमूमन हर आठवें साल आती है और इस तर्क के आधार पर मंदी का आना ही है.

तीसरी बात, भारतीय निर्यात काफ़ी गिरा है और इसमें शून्य से पांच फ़ीसदी कम की वृद्धि दर्ज की गई है. जब निर्यात की दर शून्य से पांच फ़ीसदी कम हो तो भारत की आर्थिक विकास दर कभी आठ फ़ीसदी नहीं हो सकती. (जब भारत की आर्थिक विकास दर 8 फ़ीसदी की रफ़्तार से बढ़ रही थी, तब निर्यात भी सालाना 20 फ़ीसदी से ज़्यादा की दर से बढ़ रहा था.)

चौथी बात ये है कि भारत दुनिया का सबसे व्यापार संरक्षणवादी देश बना हुआ है. मोदी के कार्यकाल में शायद ही कोई आर्थिक सुधार हुआ है.

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दुनिया भर के देशों में, 2015 में व्यापार के नज़रिए से सबसे सुरक्षात्मक क़दम उठाने वाले देशों में भारत दूसरे नंबर पर रहा है. मैं व्यक्तिगत तौर पर इससे अचरज में हूं क्योंकि हम लगातार कई सुधार के बारे में सुन रहे हैं, जिसमें विपक्ष रोड़े अटका रहा है, लेकिन सरकार सुधार के लिए सक्रिय क़दम उठा रही है, इसके बारे में कुछ नहीं सुना है.

पांचवीं बात, भारत की 500 शीर्ष कंपनियों की बिक्री में 2015 में शून्य फ़ीसदी की वृद्धि हुई है. मार्च, 2016 में ख़त्म हो रहे वित्तीय साल के दौरान उन्हें हानि उठानी पड़ सकती है. यह निर्यात में नकारात्मक वृद्धि दर के बाद दूसरा संकेत है जो बताता है कि भारत की विकास दर भी संकट में है.

छठी बात ये है कि सरकार के जीडीपी आंकड़े और कॉरपोरेट के प्रदर्शन में विरोधाभास है. इसके चलते ही भारत सरकार के आंकड़ों की विश्वसनीयता संदेह में है. इसके अलावा मुश्किलों को बढ़ाने वाले दूसरे संकेत भी मिल रहे हैं.

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साख में वृद्धि (नई आर्थिक गतिविधियों को शुरू करने के लिए क़र्ज़ लेने की स्थिति) में भी गिरावट है. भारतीय कॉरपोरेट घरानों पर भारी भरकम क़र्ज़ है और भारत के सार्वजनिक बैंकों के क़र्ज़ में बहुत बड़ी मात्रा गैर निष्पादित क़र्ज़ (नॉन पॉरफॉर्मिंग लोन्स) की है.

हालांकि सरकार अपने आंकड़ों पर यक़ीन कर रही है और कहा है कि वह कुछ चीज़ों पर काम कर रही है, जिसमें टैक्स संग्रह को बढ़ाने की बात शामिल है, यह अनुमान आधारित क़यासों से विश्वसनीय नज़र आता है.

इसके अलावा 2016 में भारत में मौजूद विदेशी संस्थाओं की वृद्धि दर कहीं ज़्यादा क़रीब सात फ़ीसदी रहने की संभावना है. इससे वह तस्वीर उभरती है, जिसे आप विचित्र कह सकते है, जिसका ज़िक्र मैंने शुरुआत में ही किया है.

क्या हमारी आर्थिक स्थिति बेहतर दौर में और इसकी विकास दर नौ फ़ीसदी के क़रीब होगी? या फिर हमारी आर्थिक व्यवस्था ख़राब दौर में है और हम मंदी की तरफ़ बढ़ रहे हैं?

क्या सरकार सुधारों के लिए प्रतिबद्ध है या फिर 2015 की तरह इस साल भी कोई सुधार नहीं होगा?

इन परस्थितियों में एक बात तो तय है कि दोनों बातें एक साथ सही नहीं हो सकतीं. या तो पहली तस्वीर सही होगी या फिर दूसरी.

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ऐसे में एक सवाल तो ये भी है कि सरकार के आंकड़ों और रुचिर शर्मा की बातों में इतना अंतर क्यों है? वित्त मंत्री का भरोसा बाज़ार में भी नज़र क्यों नहीं आ रहा है? क्या यह इसलिए है कि इसमें केवल अंतरराष्ट्रीय पहलुओं का ध्यान रखा गया है, भारत की घरेलू परिस्थितियों का नहीं.

वैसे मुझे सरकार के आंकड़ों को स्वीकार करने में कोई मुश्किल नहीं है. मेरे ख़्याल से यह ऐसा मसला है जिसे प्रधानमंत्री को कहीं सीधे तौर पर संबोधित करने की ज़रूरत है. हर महीने या तो ऐसे आंकड़े आ रहे हैं जो सरकार के आशावादी नज़रिए से मेल नहीं खा रहे हैं या फिर उलझन बढ़ा रहे हैं.

उदाहरण के लिए, ऑटोमोबाइल की बिक्री लगातार बढ़ती रही है लेकिन उसका निर्यात कम होता गया. इसके अलावा औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि को लेकर भी कोई आकलन मौजूद नहीं है.

यहां तक कि तेल की क़ीमतें भी, हमारी सोच के मुताबिक़ कोई अच्छा समाचार नहीं दे रही है. रुचिर शर्मा के मुताबिक़ तेल की क़ीमतों में कोई गिरावट होती है या 30 डॉलर प्रति बैरल की मौजूदा दर भी क़ायम रही तो भी यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए ख़राब ख़बर है और यह बताता है कि आर्थिक मंदी दूर नहीं है.

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मुझे ये स्वीकार करने में ख़ुशी है कि मौजूदा सरकार में उच्च स्तरों पर मनमोहन सिंह के कार्यकाल की तुलना में कम भ्रष्टाचार है. लेकिन मेरे लिए ये मामूली बात है. भारतीयों के लिए सबसे अहम मुद्दा ये सतत विकास दर ही है, जो उन्हें ग़रीबी से निकालने का इकलौता रास्ता है.

अगर एक मज़बूत सरकार और अपने विज़न और उद्देश्यों को लेकर स्पष्ट नेता के होने के बावजूद हम ऐसा नहीं कर पाए, तो हमें बड़ी मुश्किल का सामना करना पड़ेगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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