सड़क पर जाम, हवा में धुँआ और फेफड़े में कैंसर

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प्रयोग कामयाब था? नहीं था? बहस चलती रहेगी. चलते रहना ही बहस का काम होता है.

तो फिर कैसे देखें हम दिल्ली सरकार की कारों पर बंदिश लगाने की कोशिश को, जिसमें सम तारीख़ों पर सम नंबर की और विषम तारीख़ों पर विषम नंबर की कारों को ही चलने की अनुमति मिली?

एकः यह पाबंदी एक आपात स्थिति से निपटने के लिए एक आपाद निर्णय था. दिल्ली में इस तरह की यह पहली कोशिश थी. अब तक वायु प्रदूषण कम करने के सारे निर्णय किसी न किसी नीतिगत आधार पर लिए गए हैं.

चाहे दिल्ली के सार्वजिनक यातायात को प्राकृतिक गैस पर डालना हो या वाहनों से धुँआ निकलने के मानक सख़्त करने हों, हवा का प्रदूषण थामने के सारे ही नियम आज तक सोच समझ कर ही लिए गए हैं. लेकिन इस बार हवा की दुर्गति सभी हदें पार कर गई थी.

पहली बार भारत में किसी सरकार ने यह माना है कि गंदी हवा सार्वजनिक आपदा है. सरकार ने अपनी तरफ़ से हर वह बात दोहराई जो विज्ञान और सामाजिक संस्थाएं कोई 20 साल से कह रहीं हैं.

जैसे कि दिल्ली में हर तीसरे बच्चे के फेफड़े कमज़ोर हैं. दिल्ली में वायु प्रदूषण से संबंधित बीमारियों से हर घंटे किसी एक व्यक्ति की मौत होती है. हमारे शहरों की हवा बीमारी और मौत की चादर लपेटे हुए है.

किसी भी बड़ी आपदा से निपटने के लिए कठिन निर्णय लेने पड़ते हैं. ऐसा एक निर्णय दिल्ली सरकार ने लिया. फिर चाहे न्यायालय के ज़ोर देने पर ही लिया हो, पर सरकार ने इस निर्णय को अपनाया और इसको लागू करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. यह ऐतिहासिक बात है.

दो, चाहे इस निर्णय के नतीजे अच्छे हों या बुरे, इस कार्यक्रम की अहमियत किसी भी तरह कम नहीं आँकी जा सकती. इसका एक बहुत बड़ा सामाजिक पक्ष है जो अख़बारों की सुर्खि़यों और टी.वी. की चिल्ला-चौट में दब जाता है.

शायद यह पहला मौक़ा होगा जब कि दिल्ली में रहने वालों को सार्वजनिक हित में व्यक्तिगत आराम को छोड़ना पड़ा है. दिल्ली ताक़त का केंद्र है. यहाँ शक्ति की ही पूजा होती है. शहर के स्वभाव में ताक़त की ऐंठ रची-बसी है. कमज़ोर लोगों को इतनी हिक़ारत से शायद ही हमारा कोई और शहर देखता हो.

जिसके पास जितनी बड़ी गाड़ी वह सड़क पर अपना उतना ही बड़ा अधिकार मानता है. पैदल चलना, साइकिल पर चलना या बसों में सफ़र करना दिल्ली में हीनता का परिचय देता है.

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इसका एक और मतलब होता हैः जितनी बड़ी गाड़ी, उतना ही बड़ा उसके मालिक का हवा दूषित करने का अधिकार. इस माहौल में दिल्ली सरकार ने गाड़ियों पर किसी तरह का अंकुश लगाया यह बात तारीफ़ के क़ाबिल है. मोटरों में दौड़ने वाले लोगों को अचानक आस-पड़ोस टटोलना पड़ा.

यह शहर के भीड़ और अनजानेपन से भरे वातावरण में परिचय के बीज हैं. जो लोग आपसदारी से किसी आपदा को टाल सकते हैं उनमें अच्छे नागरिक होने की सामाजिकता की उम्मीद होती है. सम-विषम नंबरों का यह प्रयोग प्रदूषण रोकने में पूरी तरह से नाकामयाब ठहराया जाए, फिर भी इसकी सामाजिक सफलता को कोई नकार नहीं सकता. ईमानदारी से तो क़त्तई नहीं.

इसमें एक बड़ा श्रेय जाना चाहिए ‘आप’ पार्टी के नेताओं को. जब ख़ुद मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के लोग मिलजुल कर यातायात करने को तैयार हों, तो इससे सामाजिकता को नैतिक बल मिलता है. हमारे यहाँ नेताओं और साधारण लोगों के बीच लाल बत्ती से चमचमाती खाई बहुत बड़ी हो गई है, इतनी कि शायद ही किसी स्वस्थ समाज में हो. यह किसी बीमार समाज का लक्षण है.

ऐसे माहौल में मंत्रियों के साथ मिल कर जाने की छवि चाहे प्रेस फ़ोटोग्राफ़रों के लिए ही क्यों न हो, वह एक अच्छा लक्षण है. आख़िरी बार आपकी याद में कौन सा यातायात मंत्री बस में शहर धूमता पाया गया होगा?

अब अगर नेता लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने भेजने लगें, और चिकित्सा के सरकारी अस्पताल में ही जाने लगें तो हमारे यहाँ शिक्षा और स्वास्थ व्यवस्था में जो सड़ांध है वह थोड़ी कम हो सकती है.

तीन, इस प्रयोग से हमारी चरमराती यातायात व्यवस्था पर थोड़ा सार्वजनिक ध्यान आया है. हमारे शहरों की सड़कें व्यक्तिगत वाहनों की, ख़ासकर कारों की, बंधक बन गईं हैं. आर्थिक विकास के नाम पर ताबड़तोड़ बिकते ये व्यक्तिगत वाहन सार्वजनिक ज़मीन पर खड़े किए जाते हैं.

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दिल्ली में ज़मीन की क़ीमत के हिसाब से आँकें, तो इन गाड़ियों को खड़ी करने की जगह इन को ख़रीदने की क़ीमत से कई गुना महँगी है. जिन शहरों में बच्चों के खेलने और बुजुर्गों के चलने की जगह न बची हो उनमें व्यक्तिगत वाहनों को सार्वजनिक जगहों पर मुफ़्त में खड़ा करना घोर अन्याय है.

यही गाड़ियां जब सड़कों पर उतरती हैं ढेर सी जगह घेर लेती हैं. बड़ी-बड़ी गाड़ियों में एक अकेला व्यक्ति, या ड्राइवर के साथ बैठे साहब, सड़क पर ऐसे क़ब्ज़ा जमाते हैं जैसे दूसरे सभी लोगों के जमाई हों. इतनी जगह में अगर बसें और साइकिलें हों तो कहीं ज़्यादा लोग, कहीं ज़्यादा तेज़ी से अपने गंतव्य तक पहुँच सकते हैं.

लेकिन नहीं, हर कोई गाड़ी में ही घूमना चाहता है. हर कोई ट्रैफ़िक जाम में अपना योगदान और बढ़ाना चाहता है, वायु प्रदूषण में भी. इसका नतीजा यह है कि हमारी सड़कें अटकी नालियों जैसी होती जा रही हैं. सड़क पर ट्रैफ़िक जाम होता है, हवा में और धुँआ फैलता है, और फेफड़े में और कैंसर होता है.

इस अन्याय को ठीक इसलिए ठहराया जाता है, क्योंकि सार्वजनिक यातायात की हालत बहुत ख़राब है. ऊँचे दर्जे के लोग भीड़ से भरी बसों में जाना घोर असुविधा मानते हैं. और हमारे सार्वजनिक यातायात के साधन सही में इतने बदतर हैं कि उनमें चलना शारीरिक असुविधा और मानसिक त्रास का कारण बन जाता है.

तो फिर सरकारें सार्वजनिक यातायात को दुरुस्त क्यों नहीं करतीं? क्योंकि ताक़तवर वर्ग के लोग, जिनकी आवाज़ सत्ता के गलियारों तक गूँजती है, बस या ऑटो या साइकिल से सफ़र करते ही नहीं हैं. इन्हें कमज़ोर और ग़रीब लोगों भर का साधन बना दिया गया है.

जब तक सत्तावान लोग सार्वजनिक यातायात में ठीक वह नहीं भुगतेंगे जो साधारण लोग भुगतते हैं तब तक सरकारें बसों को ठीक नहीं करेंगी. जब तक ताक़तवर लोग साइकिल से या पैदल शहर की दूरियां नहीं नापेंगे तब तक उन्हें पैडल चलाने वाले के कष्ट समझ में नहीं आएंगे.

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यातायात के शास्त्र को गहराई से समझने वाला कोई भी व्यक्ति आपको बताएगा कि सार्वजनिक परिवहन तब तक अच्छा नहीं होता जब तक कि सभी लोगों को उसको इस्तेमाल करने के लिए बाध्य न किया जाए. दुनिया के सबसे ताक़तवर और सुचारू शहरों में व्यक्तिगत वाहनों पर जितने अंकुश होते हैं उतना ही बढ़िया उनका सार्वजनिक परिवहन होता है.

दुनिया के सबसे चमचमाते शहर जैसे न्यूयॉर्क या लंदन या सिंगापुर या बर्लिन में अपनी गाड़ी रखना बेहद महँगा है. और रईस लोग भी बस और ट्रेन के सहारे फ़र्राटे से अपने गंतव्य तक पहुँचते हैं. भीड़ और बढ़ती आबादी वाले हमारे शहरों में तो यह और ज़रूरी है. जब तक सार्वजनिक परिवहन की समस्या शहर के हर एक व्यक्ति की समस्या नहीं बनेगी तब तक बसों और ट्रामों और मेट्रो की ओर ध्यान नहीं जाएगा.

सम-विषम नबंर के आधार पर अंकुश लगा कर इस ओर दिल्ली सरकार ने एक बड़ा पहला क़दम उठाया है. इस चर्चा से बने माहौल को कुछ अच्छे बदलाव में ढालने की ज़रूरत है. वर्ना हमारे शहरों की गतिशीलता एकदम मिट जाएगी. हर कोई सड़क पर कहीं न कहीं फँसा मिलेगा, अपनी भड़ास दूसरों पर निकालता, जहरीले धुँए का विषपान करता हुआ.

गाड़ियों से निकलने वाले धुँए का बढ़ना एक अप्रत्यक्ष ख़तरा है. यह हमारी आने वाली नस्लों को कमजोर और अपाहिज बनाता जाएगा. हज़ारों-लाखों को मारने वाला यह धुँआ ख़ुद हमारा ही ईजाद किया आतंक है.

इस आतंकवाद को तैयार करने वाले शिविर हमारे ही घरों के चारों ओर फैले हुए हैं. हमें गाड़ियों में दौड़ने की अपनी असीम भूख पर क़ाबू पाना होगा. नहीं तो यह भगदड़ हमें और हमारी आने वाली पीढ़ियों को रौंद डालेगी.

(पर्यावरण और विज्ञान के पत्रकार सोपान जोशी दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान से जुड़े हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)

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