ज़िंदगी की रेस में भारतीय महिलाएं कैसे आगे?

इमेज कॉपीरइट AFP

भारत की 2011 की जनगणना के मुताबिक हर 1,000 लड़कों के मुकाबले देश में 918 लड़कियां पैदा होती हैं. पर 60 साल की उम्र पार होते-होते हर 1,000 मर्दों के मुक़ाबले 1,033 औरतें हो जाती हैं.

सांख्यिकी मंत्रालय की रिपोर्ट, ‘वुमेन मेन 2015’, में पाया गया है कि 60 की उम्र के बाद का ये लिंगानुपात भारत में अब तक का सबसे ज़्यादा है.

सवाल ये कि ये अनुपात इतना कैसे बदल गया है? वो भी तब जब भारत में सामाजिक तौर पर लड़कों को तवज्जो दी जाती हो, उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य को ज़्यादा तरजीह और ज़्यादातर लड़कियां कामकाजी ना हों.

शोध और प्रशिक्षण संस्थान, "पब्लिक हेल्थ फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया’ में वरिष्ठ विशेषज्ञ डॉक्टर प्रिया बालासुब्रमण्यम कक्कड़ ने बीबीसी को बताया कि ये चलन औरतों की लंबी आयु नहीं, बल्कि मर्दों की कम आयु का सूचक है."

उनके मुताबिक, “औरतें लंबे समय तक भी जिएं तो मर्दों के मुक़ाबले उनकी ज़िंदगी कैसी है ये सोचनेवाली बात है.”

वैसे तो दुनियाभर में औरतें, मर्दों से ज़्यादा लंबी उम्र जीती हैं. हार्वर्ड विश्वविद्यालय के मेडिकल स्कूल के शोधकर्ताओं के मुताबिक इसकी एक बड़ी वजह सेक्स हॉर्मोन्स से जुड़ी है.

100 वर्ष की उम्र तक जी गए लोगों पर शोध कर इन्होंने पाया कि पुरुषों में टेस्टॉसट्रॉन की वजह से आक्रामक और प्रतिस्पर्धा वाला बर्ताव ज़्यादा होता है.

ये नुक़सानदायक कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ाता है जिससे दिल की बीमारी या स्ट्रोक होने का ख़तरा बढ़ जाता है.

वहीं महिलाओं में एस्ट्रोजन नुक़सानदायक कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम और अच्छे कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ाती है.

यानी मर्द दिल की बीमारी, दौरे और कैंसर जैसी बीमारियों से मर जाते हैं जबकि औरतें आर्थराइटिस, ऑस्टियोपोरोसिस और डायबिटीज़ जैसी बीमारियों के साथ ज़िंदा रहती हैं.

इमेज कॉपीरइट Getty

प्रख़्यात अंतर्राष्ट्रीय मेडिकल पत्रिका लैन्सेट की ‘ग्लोबल बर्डन ऑफ़ डिज़ीज़’ रिपोर्ट में 188 देशों में 300 बीमारियों का अध्ययन किया गया है.

रिपोर्ट में पाया गया कि पिछले दो दशकों से भारतीय मर्दों के लिए स्वास्थ्य से जुड़ी सबसे बड़ी चुनौती ख़ुद को चोट पहुंचाना है, यानि आत्महत्या और उसकी कोशिश.

मानसिक बीमारियां भारतीय औरतों के लिए भी बड़ी परेशानी के तौर पर उभरी हैं लेकिन ये डिप्रेशन यानि अवसाद का रूप लेती हैं.

‘इम्यूनिटी एंड एजिंग जर्नल’ में छपे शोध में पाया गया है कि मर्दों के मुकाबले औरतों के शरीर में इम्यूनिटी यानि प्रतिरक्षा का स्तर धीरे-धीरे कम होता है.

यानि औरतें इन्फ़ेक्शन और कैंसर जैसी बीमारियों से बचने की बेहतर क्षमता रखती हैं.

ग़ौरतलब है कि दक्षिण एशिया के विकासशील देशों से अलग, दुनिया के विकसित देशों में पैदाइश के व़क्त लड़कों के मुकाबले लड़कियों की तादाद क़रीब-क़रीब बराबर होती है

इसलिए 60 साल के बाद मर्दों की तुलना में औरतों की संख्या काफ़ी बढ़ जाती है.

संयुक्त राष्ट्र की ‘वर्ल्ड पॉपुलेशन एजिंग रिपोर्ट 1950-2050’ के मुताबिक युरोप में ये संख्या सबसे ज़्यादा है और एशिया में सबसे कम.

ख़ास तौर पर दक्षिण एशिया में भ्रूण में बच्चियों को मारने जैसी कुरीतियों के चलते पैदा होने के व़क्त ही लड़क़ों के मुकाबले लड़कियों की तादाद कम होती है.

इसलिए औरतों के प्राकृतिक तरीके से मर्दों से लंबी उम्र तक जीने के गुणों के बावजूद अबतक उनकी तादाद 60 की उम्र के बाद भी कम ही रही है.

इमेज कॉपीरइट AFP

पर मतगणना के ताज़ा आंकड़े हैरान करनेवाले हैं. ‘पॉपुलेशन एजिंग इन इंडिया’ किताब के मुताबिक आज़ाद भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं में बेहतरी के साथ मर्द और औरतों, दोनों की ही लाइफ़ एक्सपेकटेंसी लगातार बढ़ती रही है.

पर 1980 के दशक के बाद ही इसमें औरतों के लिए तेज़ी आई. नतीजा ये कि भारत में बुज़ुर्गों में अब ज़्यादा हिस्सा औरतों का है.

डॉक्टर प्रिया बालासुब्रमण्यम कक्कड़ के मुताबिक इसकी वजह जितनी प्राकृतिक है उतनी ही सामाजिक भी, मसलन रोज़गार और पारिवारिक ज़िम्मेदारी से जुड़ी शारिरीक और मानसिक परेशानियां.

वो कहती हैं, “औरतों के मुकाबले मर्द ये दबाव ज़्यादा महसूस करते हैं, साथ ही उनके सामने शराब, धूम्रपान, नशीले पदार्थों का सेवन, कारें तेज़ चलाना वगैरह से जुड़े जोख़िम भी हैं.”

वजहें जो भी हों, बदलते लिंगानुपात का एक आयाम ये भी है कि बुज़ुर्ग महिलाएं ज़्यादा अकेलेपन से जूझती हैं.

जनगणना के मुताबिक 60 साल की उम्र के बाद, सिर्फ़ 15 प्रतिशत मर्दों की पत्नियों की मौत हो गई थी जबकि 50 प्रतिशत औरतों के पति गुज़र गए थे.

(बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार