पड़ोसियों के गले नहीं उतर रही मोदी की नीति!

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साल 2014 में अपने शपथ ग्रहण समारोह में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्क देशों के प्रमुखों को बुलाया था, तो एक तरह से उन्होंने पड़ोसियों को प्राथमिकता देने की अपनी 'नेबर्स फ़र्स्ट' नीति शुरू कर दी थी.

इसी नीति के तहत वह सबसे पहले भूटान गए और फिर उन्होंने बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका समेत ज़्यादातर दक्षिण एशियाई देशों का दौरा किया.

सवाल यह है कि क्या मोदी की पड़ोसियों को प्राथमिकता की नीति दक्षिण एशिया की बदलती वास्तविकताओं का सामना कर पा रही है.

राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के बावजूद बांग्लादेश के आर्थिक रूप से फिर मज़बूत होने के आसार नज़र आ रहे हैं. श्रीलंका में बीते साल लोकतांत्रिक ढंग से रानिल विक्रमसिंघे प्रधानमंत्री बने और नेपाल में नया संविधान लागू हुआ है.

क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग की दिशा में उल्लेखनीय शुरुआत के बावजूद पड़ोसी देशों के राजनीतिक और सुरक्षा मुद्दों के संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं और इस दिशा में अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है.

उदाहरण के लिए श्रीलंका ने नया संविधान बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. इसमें अल्पसंख्यक तमिल समुदाय के साथ सामंजस्य बनाने पर ख़ास ध्यान देने की ज़रूरत है ताकि एक और गृहयुद्ध की स्थिति पैदा न हो.

श्रीलंका में भारत की स्थिति नेपाल जैसी हो सकती है. जैसे नेपाल के मधेसियों के उत्तर प्रदेश और बिहार से सांस्कृतिक संबंध हैं, वैसे ही श्रीलंका के तमिलों की भी भारत के तमिलनाडु के लोगों से रिश्तेदारी है.

श्रीलंका के तमिलों की राजनीतिक इच्छाओं का ध्यान रखा जाना तमिलनाडु में एक संवेदनशील मुद्दा है. क्या भारत ऐसे किसी हालात में उचित प्रतिक्रिया के लिए तैयार है?

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दूसरा पहलू है सुरक्षा जिसमें भारत को दक्षिण एशिया के नेता के रूप में हाल ही में बड़ा धक्का लगा है.

यक़ीनन अफ़ग़ानिस्तान को एमआई-25 हेलिकॉप्टर देने का समझौता दक्षिण एशिया का सबसे महत्वपूर्ण समझौता है. यह न सिर्फ़ भारत का किसी देश को आक्रामक हथियार देने का पहला अवसर है बल्कि इससे अफ़ग़ानिस्तान की वायुसेना की शक्ति में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है.

लेकिन मज़ार-ए-शरीफ़ में भारतीय वाणिज्यिक दूतावास और पठानकोट में एयरबेस पर हमला अपनी अहम परिसंपत्तियों की सुरक्षा कर पाने में भारत की कमज़ोरियां उजागर करते हैं.

चरमपंथ विरोधी व्यवस्था के लिहाज़ से भारत आज एक नेता कम शिकार ज़्यादा लगता है.

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अगर हम नेपाल की बात करें तो 2014 में प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा 17 साल में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली नेपाल यात्रा थी. तब उन्होंने वहां ऊर्जा उत्पादन और आधारभूत सरंचना निर्माण के लिए एक अरब डॉलर (68 अरब रुपये से अधिक) की सहायता देने की घोषणा की थी.

अक्टूबर, 2014 में दोनों देशों ने ऊर्जा व्यापार समझौता (पीटीए) पर हस्ताक्षर भी किए थे जिसका उद्देश्य ऊर्जा व्यापार में सहयोग बढ़ाना था.

नेपाल के भूकंप के दौरान सबसे पहले सहायता भेजने वाले देशों में से भारत था. हालांकि नेपाल का नया संविधान बनने के बाद वहां बने राजनीतिक संकट पर उचित प्रतिक्रिया देने की बात पर भारत असमंजस में नज़र आया.

हालांकि भारत सरकार ने नेपाल के संविधान पर अपनी नाख़ुशी ज़ाहिर करने में देरी नहीं की और कहा कि इसमें ज़्यादा लोगों को प्रतिनिधित्व होना चाहिए. और तो और संविधान में संशोधन के लिए सात मांगें भी पेश कर दीं.

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नेपाल ने इस प्रतिक्रिया को संविधान का विरोध कर रहे अपने दक्षिणी ज़िलों के लोगों के प्रति दबे-छुपे हुए समर्थन के रूप में देखा. नेपाल के तराई इलाक़े की 40 फ़ीसदी आबादी वाले मधेसी और थारू समुदाय, संविधान का यह कहकर विरोध कर रहे हैं कि उन्हें दरकिनार करने की कोशिश की गई है.

विरोध कर रहे मधेसियों ने भारत-नेपाल सीमा के व्यापारिक मार्ग बीरगंज सीमा चौकी को बंद कर दिया जिससे नेपाल का 60 फ़ीसदी विदेशी व्यापार होता है. इससे भारत से नेपाल जाने वाले ईंधन और सामग्री की आपूर्ति प्रभावित हुई और नेपाल में बड़ा संकट खड़ा हो गया.

नेपाल ने इसे भारत की 'अनाधिकारिक नाकेबंदी' बताते हुए सयुंक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में शिकायत दर्ज कर दी.

ऐसा लगता है कि यह पूरा द्विपक्षीय संकट इस समझ के फेर से पैदा हुआ कि भारत अपनी शक्ति दिखाने के लिए उस पक्ष (मधेसियों) का समर्थन कर रहा है जो संविधान का विरोध कर रहा है.

'चिंताओं को तुरंत ज़ाहिर' करने के बजाय भारत को नेपाली नेताओं के साथ अनौपचारिक बातचीत करनी चाहिए थी कि ऐसे संविधान का क्या असर होगा जिसे उसके लोगों ने आधे-अधूरे मन से स्वीकार किया है.

'चिंताओं' के बजाय भारत के संदेश का मुख्य आधार नेपाल का 'एकीकरण' और इसके लिए ख़तरा बनने वाली शक्तियां होना चाहिए था.

भारत नेपाल को यह बताने में नाकाम रहा कि आबादी के एक हिस्से के नाराज़ होने से अलगाव का विचार ज़ोर पकड़ सकता है और यह पहाड़ी-मैदानी लोगों के बीच क्षेत्रीय तनाव की वजह भी बन सकता है.

लेकिन इस नीति के सकारात्मक पहलू भी हैं.

उदाहरण के लिए बांग्लादेश को लें. इस्लामिक कट्टरपंथ की चुनौतियां बढ़ने के बावजूद बांग्लादेश में आर्थिक प्रगति की काफ़ी संभावनाएं नज़र आती हैं.

ब्लूमबर्ग का अनुमान है कि बांग्लादेश की आर्थिक वृद्धि वर्ष 2016 में 6.6 प्रतिशत विकास दर के हिसाब से होगी और यह 7.4 प्रतिशत की गति से बढ़ने वाले भारत के बाद दूसरे स्थान पर रहेगा.

भारत और बांग्लादेश के बीच हाल ही में किए गए समझौतों से बांग्लादेश की वैश्विक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनने की इच्छा का पता चलता है.

यात्रियों, लोगों और मालवाहक वाहनों के नियमन के लिए बांग्लादेश, भूटान, भारत और नेपाल के बीच मोटर वाहन अनुबंध (एमवीए) पर हस्ताक्षर एक महत्वपूर्ण कदम है. लागू होने के बाद इस समझौते से दक्षिण एशिया में अंतर-क्षेत्रीय व्यापार के 60 प्रतिशत और दुनिया के साथ व्यापार में 30 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की संभावना है.

हालांकि मोदी की पड़ोसियों को प्राथमिकता की नीति से आर्थिक मोर्चे पर तो कुछ उम्मीद नज़र आ रही है, लेकिन दक्षिण एशिया में सुरक्षा को लेकर बड़ी चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं. यही वजह है कि इस क्षेत्र में राजनीतिक और सुरक्षा की चुनौतियों का सामना करने के लिए उचित व्यवस्था बनाना ज़रूरी है.

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