परमाणु भट्ठियों की बात अंजाम तक पहुँचेगी?

  • 25 जनवरी 2016
फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद और नरेंद्र मोदी नर्तकों के साथ इमेज कॉपीरइट Reuters

फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद भारत के गणतंत्र दिवस पर ख़ास मेहमान बन कर आए हैं.

इससे जुड़ा सम्मान, परेड और सांकेतिकता वगैरह तो अपनी जगह हैं, पर अहम सवाल यह है कि उनके एजेंडे में भारत कहां फिट बैठता है?

इस दौरान जो व्यावहारिक काम जल्द हो सकता है, वह लड़ाकू हवाई जहाज़ों और परमाणु भट्ठियों पर सौदे के लिए समझौते. इसके लिए लंबे समय से बातचीत चल रही है.

इन दोनों मुद्दों पर ही लगभग 30 अरब डॉलर के समझौते हो सकते हैं.

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Image caption फ्रांस भारत को लड़ाकू विमान बेचना चाहता है

लेकिन यदि ये बातचीत और लंबी चलती है तो समझौते को अंतिम स्वरूप देने में काफ़ी वक़्त लग सकता है और अंत तक समझौता टल सकता है.

ये दोनों ही समझौते ओलांद के लिए काफ़ी अहम हैं. इन समझौतों के ज़रिए वे अपने देश में राजनीतिक रूप से ताक़तवर व्यापारी समुदाय के साथ खड़े दिख सकते हैं.

इसके अलावा हज़ारों हुनरमंद लोगों को रोज़गार भी मिल सकता है.

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फ्रांस के राष्ट्रपति ने क़सम खाई थी कि 'यदि वे देश का विकास करने में नाकाम रहे, रोज़गार के मौके नहीं बना पाए और देश को पटरी पर वापस लाने में सक्षम साबित नहीं हुए' तो अगला चुनाव नहीं लड़ेंगे.

इसलिए रोज़गार, निवेश और विकास में बढ़ोतरी उनके ख़ुद के राजनीतिक भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है.

ओलांद के शासनकाल में बेरोज़गारी 9.7 फ़ीसदी से बढ़ कर 10.1 प्रतिशत हो गई है, जिसका बुरा असर युवाओं पर कुछ ज़्यादा ही पड़ा है. ऐसे में आश्चर्य नहीं कि उन्होंने इसी महीने आर्थिक आपातकाल का ऐलान किया है.

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Image caption फ्रांस भारत को ज़्यादा से ज़्यादा रक्षा उपकरण बेचना चाहता है.

यदि वे सुरक्षा और ऊर्जा के मामलों में ये दोनों समझौते करने में कामयाब रहे, तो वे यह भी पता लगा पाएंगे कि भारत रोज़गार की चुनौतियों से कैसे निपट रहा है.

दरअसल, रोज़गार के मामले में भारत और फ्रांस की समस्याएं एक समान हैं. दोनों ही देशों में कड़े श्रम क़ानून हैं, ट्रेड यूनियन काफ़ी ताक़तवर हैं, जो उद्योगपतियों को आसानी से आगे नहीं बढ़ने देते हैं. साथ ही, कर्मचारियों में ज़रूरी हुनर की भी कमी दिखती है.

टीमलीज़ सर्विेसेज़, मा फ़ोई रैंडस्टैड और कुछ अन्य भारतीय कंपनियों ने ताक़तवर नियामक संस्थाओं और हतोत्साहित करने वाली राजनीतिक-आर्थिक स्थितियों के बीच भी रोज़गार के मौके पैदा किए हैं.

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बेहतर होगा कि ओलांद हुनर के विकास और रोज़गार के मौके पैदा करने के काम में लगे भारतीय अफ़सरों के साथ बैठने के लिए कुछ समय निकालें.

ऐसा करने से वे अपने साथ फ़ायदेमंद समझौतों के अलावा कुछ अच्छे आइडियाज़ भी लेकर फ्रांस लौट सकेंगे.

भारत और फ्रांस के सामने आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियां एक समान हैं. लेकिन दोनों जिस तरह के ख़तरों का सामना करते हैं, उनके चरित्र में काफ़ी अंतर है.

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फ्रांस के लिए ख़तरा उसकी विदेश नीति से अंसतुष्ट उसके अपने नगारिकों का गुस्सा है. भारत के लिए ख़तरा सीमा पार से आता है.

इसलिए हालांकि पेरिस पर हुए हमले और 26/11 के हमलों के बीच काफ़ी समानता दिखती है, वो हमले किस तरह हुए, इसमें काफ़ी अंतर है.

लिहाज़ा, भारत और फ्रांस चरमपंथ रोकने के लिए सहयोग के मुद्दे पर बातचीत कर सकते हैं, वे ख़ुफ़िया जानकारियों की अदला बदली भी कर सकते हैं. इस मुद्दे पर वे बहुत आगे नहीं जा सकते, इसकी एक सीमा है.

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Image caption कुडनकुलम परमाणु बिजलीघर

इसी तरह यूरोज़ोन संकट से निपटने में भारत फ्रांस की मदद बहुत ज़्यादा नहीं कर सकता.

बीते कुछ सालों में फ्रांस ने हिंद महासागर इलाक़े के सुरक्षा मामलों में अपनी भूमिका बढ़ाई है.

ला रीयूनियन और मायोट द्वीपों पर क़ब्ज़ा होने और दूर दूर तक फैले विशाल एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन की वजह से फ्रांस हिंद महासागर में ख़ुद को एक बड़े खिलाड़ी के रूप में देखता है.

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Image caption भारत के गणतंत्र दिवस परेड की रिहर्सल में फ्रांसीसी सैनिक

ज़िबूती और अबू धाबी में इसके सैनिक अड्डे भी हैं. वह इनके ज़रिए अफ़्रीका, मध्य पूर्व और अफ़ग़ानिस्तान में हस्तक्षेप कर सकता है. इसके उलट, मलक्का जलडमरूमध्य के पूरब में फ्रांस की ताक़त काफ़ी सीमित है.

पश्चिम हिंद महासागर के इलाक़े में भारत की अहमियत महत्वपूर्ण है. ला रीयूनियन में तो भारतीय मूल के काफ़ी लोग रहते हैं. इसलिए समुद्र के इस हिस्से पर प्रभाव बढ़ाने को लेकर दोनों देशों के बीच एक तरह की होड़ भी है.

दूसरी ओर समुद्री परिवहन में छूट के मुद्दे पर भारत और फ्रांस के बीच पूर्वी हिंद महासागर इलाक़े में सहयोग बढ़ रहा है.

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दोनों देशों के सत्ता प्रतिष्ठान रणनीति और साझा सैन्य अभ्यास के मुद्दे पर पहले से ज़्यादा बातचीत करना चाहते हैं.

फ्रांस के लिए यह ज़रूरी है कि 21वीं सदी में अंतरराष्ट्रीय ताक़त बन कर उभरने के लिए वह दिल्ली से नज़दीकी का रिश्ता रखे.

फ्रांस ने दूरदर्शिता दिखाते हुए साल 1998 में ही भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी की पहल की थी.

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फ्रांस ने शीतयुद्ध युग से अब तक हमेशा ही पश्चिम के बढ़ते दबाव को कम करने में भारत की मदद की है. उसने सुरक्षा, अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा, इन सभी मुद्दों पर ज़रूरत पड़ने पर भारत की बेहिचक सहायता की है.

यह ज़िम्मेदारी मोदी सरकार की है कि वह इस रिश्ते को और मज़बूत करे और फ्रांस को बड़ा साझेदार बनाए.

(ये लेखक के निज़ी विचार हैं. नितिन पई स्वतंत्र संस्था तक्षशिला इंस्टीच्यूट के सह संस्थापक और निदेशक हैं.)

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