भारत में पनीर को कौन लेकर आया..

भारत में कौन-कौन से व्यंजन और खाना बनाने की तकनीकें बाहर से आई हैं?

पढ़ें पहली कड़ी - अपना क्या था भारत के पास खाने को

यह बात अलग है कि आज ये सब भारतीय खाने का अहम हिस्सा हैं. जानें दूसरी कड़ी में इन्हीं तकनीकों और व्यंजनों के बारे में.

तंदूर: अगर खाने पकाने की कोई एक तकनीक और उपकरण है जिससे 1000 तरह के खाने पकाए जा सकते हैं, तो वह तंदूर है. इसे पुराने ज़माने में तोनीर कहते थे.

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इसमें संदेह नहीं कि तंदूर मुग़लों के समय भारत में काफ़ी लोकप्रिय था और ख़ासतौर पर जहांगीर के वक़्त एक से दूसरी जगह ले जाने वाले हल्के तंदूर विकसित हुए.

लेकिन पहला तंदूर, जिसका ज़िक्र प्राचीन यात्रावृतांतों और किताबों में है, वह ज़मीन के नीचे होता था और तुग़लकों के रसोईघर में कबाब और नान बनाने में इस्तेमाल होता था.

चंग़ेज़ ख़ान ने पहली बार इसका परिचय तुर्कों और अरबों से करवाया और बाद में यह भारत आया.

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ज़मीन के नीचे का यह तंदूर आर्मीनियाई तोनीर की याद दिलाता है. यह आज के ओवन की तरह काम करता था.

इस नज़रिए से यह मुग़ल नहीं बल्कि आर्मीनियाई हैं, जिन्होंने हमें तंदूर दिया.

इससे बिल्कुल इनकार नहीं कि मुग़लों ने बाद में इसे अफ़ग़ान तंदूर के साथ मिलाकर नया स्वरूप दिया और सांझा चूल्हा बनाने में मदद की जो एक पंजाबी तंदूर है.

धीमी आंच पर खाना पकाना: धीमी आंच पर खाना पकाने की लोकप्रियता का श्रेय मुग़लों और निज़ामों को जाता है.

मगर प्राचीन भारत के मंदिरों में पकने वाले खाने से साबित होता है कि यह खाना पकाने की एक प्राचीन कला थी, जो द्रविड़ और आर्यों की देन थी.

वो इसका इस्तेमाल बिना तेल-मसालों वाले व्यंजन बनाने में करते थे.

वाकई खाना बनाने की इस विधि का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर नागा और अहोम राजाओं ने किया था. तो मुग़लों का इसमें क्या योगदान था?

इस बारे में खानपान विशेषज्ञ जिग्स कालरा का कहना है, "मुग़लों ने इसमें भाप से पकाने की कला शामिल की और इसका इस्तेमाल कर उन्होंने बिरयानी बनानी शुरू की. यह था उनका योगदान. पहले चावल को उबाल लिया जाता था. फिर उसे भाप पर पकाया जाता था."

पनीर: आमतौर पर माना जाता है कि पनीर बनाने की कला हमें पुर्तगालियों ने सिखाई है.

पुर्तगाली जो पनीर बनाते थे, वो संदेश और रसगुल्ला बनाने वाले छेना की तुलना में थोड़ा खट्टा होता था.

हालांकि पुराने रिकॉर्ड से पता चलता है कि पनीर उत्तर भारत में पुर्तगालियों के आने से बहुत पहले अरबों के साथ आ चुका था, जो ईरान से मसालों की तलाश में भारत आए थे.

तब भेड़ के दूध से बने पनीर को पनीर तबरीज़ कहते थे.

तो फिर इतिहास के पन्नों में 'अकबरनामा' से पहले पनीर के पकवान का ज़िक्र क्यों नहीं है. यह उतना ही रहस्यमयी है जितना जहांगीर से पहले केसर के बारे में कोई ज़िक्र न होना है, जबकि केसर सिकंदर के साथ भारत आया था.

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सॉस: अगर आप सॉस की बात करें तो आप ब्रिटेन और फ्रांस के लोगों का धन्यवाद दे सकते हैं, जो इसे भारत लाए.

इससे पहले भारत में चटनी का प्रचलन था, जो मुग़लों के समय और बेहतर रूप में सामने आया.

फ्रांस के दूत पहली बार भारत के राजदरबारों में सॉस लाए. उससे पहले तक भारतीय खाने सिर्फ़ मसालों की बदौलत बनते थे.

सॉस का बाद में उपयोग असम के बौद्ध आदिवासी समुदाय मोग्स ने शुरू किया, जिन्हें खाना बनाने की कला विकसित करने का काम सौंपा गया था और उन्होंने आख़िरकार डाल बंगला पाक शैली का विकास किया और एंग्लो-इंडियन पाक शैली में योगदान दिया.

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वाइन और दूसरे पेय: अगर हम मानें कि भारत में वाइन फ्रांसीसी और पुर्तगाली लाए, तो यह पूरी तरह सच नहीं होगा.

भारत में शराब बनाने की कला तो नंद के समय से भी पुरानी है. चंद्रगुप्त मौर्य और हेलेन की शादी के समय के एक वृतांत में सुनरी नामक एक अदिवासी समुदाय का उल्लेख है.

वाइन (तब इसे सोम कहते थे) बनाने में उसे महारथ हासिल थी.

भारत के बारे में प्लिनी की व्याख्या में ताड़ी, चावल से बनी शराब और एक लोकप्रिय पेय पदार्थ फुग्गा का ज़िक्र मिलता है.

फुग्गा जौ को सड़ाकर बनने वाला एक मादक पेय पदार्थ था.

फ्रांसीसियों और पुर्तगालियों ने इसमें यह योगदान दिया कि उन्होंने शराब बनाने के मक़सद से अंगूर की खेती शुरू की.

नूरजहां जहांगीर के लिए फलों की मदद से उनका पसंदीदा शर्बत तैयार करवाती थीं, जिसमें अफ़ीम मिला होता था.

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शर्बत बनाने की कला: बर्फ़ तो हमेशा से भारत में थी, पर ये मुग़ल थे जो हिमालय से इसे मैदानी भाग में लाए.

वो गर्मी के दिनों में महल के कमरे ठंडा रखने में इसका इस्तेमाल करते थे.

लेकिन बर्फ़ का इस्तेमाल सिर्फ़ फलों और नूरजहां के गुलाब ताज़े रखने के लिए ही नहीं होता था बल्कि इसका इस्तेमाल फलों के गुच्छों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर रखने के लिए भी होता था.

इसे क्रीम के साथ खाने के लिए पेश किया जाता था.

वास्तव में ये आज की फ्रूट क्रीम का एक शुरुआती रूप था. जब दही को फल के साथ मथकर एक मीठा व्यंजन बना तो उसे शेफ़ विलियम हैरल्ड ने 'फ्रूट क्रीम' नाम दिया.

यह भारत में नहीं मिलता था और फ़ारस के राजा दारा के दरबार से भारत आया.

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