'कदम सही लेकिन चुनौतियां कई'

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देश में लगातार दो साल से सूखे की स्थिति के बीच केंद्र ने नई फसल बीमा योजना को मंजूरी दे दी है.

यह योजना इस साल खरीफ सत्र से लागू होगी. फ़सल बीमा योजना के बारे में किसानों की जानकारी को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं. क्योंकि तमाम

तरीके के प्रचार अभियान के बावजूद बहुत कम किसान ही इसका फ़ायदा उठा पाते हैं. फ़सलों की बीमा से संबंधित यह योजना कोई नई नहीं है लेकिन इस योजना के ज़्यादा फ़ायदेमंद होने

का सरकार दावा कर रही है. इसके तहत किसानों को अनाज और तिलहनी फसलों के बीमा संरक्षण के लिए अधिकतम दो प्रतिशत और होर्टिकल्चर और कपास की फसलों के लिए अधिकतम पांच प्रतिशत तक प्रीमियम रखा गया है.

नई योजना मौजूदा राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (एनएआईएस) की जगह लेगी. सरकार का दावा है कि पिछली बीमा योजनाओं में कई तरह की खामियां थीं जिन्हें नई योजना में दूर किया गया है. लेकिन जानकारों की नज़र में कितनी असरदार होगी ये योजना, ये सवाल बड़ा अहम है.

पूर्व कृषि मंत्री सोमपाल शास्त्री कहते हैं कि जब तक किसानों को इकाई मानकर कोई योजना नहीं चलाई जाएगी तब तक इसका वास्तविक लाभ उन्हें नहीं मिल सकेगा.

दरअसल फसल बीमा योजनाओं के बारे में ख़ुद किसानों को ही कम जानकारी होती है. जानकारों का कहना है कि न तो किसानों को इस बारे में ठीक से बताया है और न ही इसके लिए उन्हें प्रोत्साहित किया जाता है.

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बताया जा रहा है कि नई योजना से पूर्वी उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड जैसे इलाकों के किसानों को ज़्यादा फ़ायदा होगा. लेकिन इन इलाकों के किसान इसके बारे में कितना जानते हैं और क्या इससे पहले उन्होंने

फ़सलों का बीमा कराया है, ये जानने के लिए जब बीबीसी ने इलाहाबाद के एक गांव में कुछ किसानों से बात की तो तस्वीर कुछ और ही उभरकर सामने आई. किसानों का कहन था कि न तो उन्हें इस बारे में कभी कुछ बताया गया और न ही उन्होंने इसमें कभी कोई दिलचस्पी ली.

किसानों का ये भी कहना था कि नई योजना के बारे में उन्होंने टीवी, रेडियो और अखबारों में सुना ज़रूर है लेकिन इसका लाभ कैसे मिलेगा इस बारे में वो कुछ नहीं जानते. उधर सरकार के इस फ़ैसले को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं और कहा जा रहा है कि इसे राजनीतिक लाभ पाने के मकसद से लाया जा रहा है.

हालांकि राजनीतिक विश्लेषक और लखनऊ में टाइम्स ऑफ इंडिया के वरिष्ठ पत्रकार सुभाष मिश्र कहते हैं कि राजनीतिक फ़ायदे को दरकिनार नहीं किया जा सकता

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लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इसके पीछे सिर्फ़ यही कारण है. सुभाष मिश्र कहते हैं कि सरकार को इन योजनाओं के बारे में ठीक उस तरह से बताना पड़ेगा जैसे कि राजनीतिक पार्टियां अपने एजेंड और अपनी उपलब्धियों के बारे में प्रचार करती है.

दरअसल हाल ही में कुछ राज्यों में हुए पंचायत चुनावों में भाजपा की स्थिति ठीक नहीं थी. ज़्यादातर जगहों पर उसे हार का सामना करना पड़ा है. वैसे भी ये कहा जाता रहा है कि भाजपा का असर शहरी मतदाताओं पर ज्यादा है और ग्रामीण

मतदाताओं पर कम. जानकार कहते हैं कि शायद इस वजह से भी भाजपा किसानों से नज़दीकी क़ायम करने की कोशिश कर रही हो. जानकारों का ये भी कहना है कि वजह चाहे जो हो, लेकिन यदि योजना की सही और समुचित जानकारी किसानों को दी गई तो लाभ मिलना तय है.

कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा सरकार के इस कदम को अच्छा बता रहे हैं लेकिन उनका कहना है कि इसके साथ कई चुनौतियां भी हैं.

वो कहते हैं, "सबसे बड़ी चुनौती यह है कि किसान को मौसम से होने वाले नुकसान को प्रति यूनिट के आधार पर नहीं आंका जाता. किसी प्राकृतिक वजहों से पूरे गांव को होने वाले नुकसान के औसत के आधार पर किसान का नुकसान भी आंका जाता है.''

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