भारत रंग महोत्सव, 21 दिन में 80 नाटक

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दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में फिर नाटकों का मेला लगा है.

अठारहवें भारत रंग महोत्सव का आयोजन एक से 21 फ़रवरी तक दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में होगा. इसमें 21 दिन में अस्सी से अधिक नाटकों का मंचन, लगभग तीन सौ एंबीएंस प्रस्तुतियां और पाकिस्तान समेत दस से अधिक देशों की भागीदारी होगी.

भारंगम में 'आज के लिए आज का थियेटर' और थियेटर में उभरते ट्रेंड पर सेमिनार के अलावा मास्टरक्लास भी होगी. इसमें वरिष्ठ रंगकर्मी नौजवानों को थिएटर के बारे में बताएंगे. इस दौरान 'लीविंग लीजेंड' में कला जगत के दिग्गज़ अपने अनुभव बांटेगे.

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Image caption रतन थियम द्वारा निर्देशित 'मैकबेथ' का एक दृष्य.

इस महोत्सव का उद्घाटन रतन थियम द्वारा निर्देशित 'मैकबेथ' से होगा. इस सत्र को संस्कृति मंत्री महेश शर्मा के साथ-साथ नाना पाटेकर भी संबोधित करेंगे. इसका सेटेलाइट संस्करण भुवनेश्वर, गुवाहाटी, त्रिवेंद्रम और जम्मू में आयोजित किया जाएगा.

रंग महोत्सव के निदेशक वामन केंद्रे के मुताबिक़ इस बार 'भारंगम' में भारतीय रंगमंच की विविधता को समेटने और युवा रंगकर्मियों व क्षेत्रीय रंगमंच को बड़ा प्लेटफ़ॉर्म देने का गंभीर प्रयास हुआ है.

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Image caption अभिषेक मजूमदार के नाटक का एक दृष्य.

इस साल की थीम 'रंगमंच के जादू की फिर से खोज' में क्या दर्शक शामिल होंगे?

इस सवाल पर एनएसडी परिसर को सजा रहे परिकल्पक जयंत देशमुख को विश्वास है कि सड़क पर लगे विशाल पोस्टर्स, परिसर की भीतरी साज-सज्जा लोगों को भी आकर्षित करेगी.

उनका मानना है कि इस जादुई माहौल में आने के बाद लोग ऑडिटोरियम तक भी आएंगे.

वो इब्राहिम अलकाज़ी द्वारा पुराने किले में बनाया गया 'अंधा युग' के सेट की रेप्लिका भी बना रहे हैं.

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भारंगम के अब तक के सफ़र पर एनएसडी के पूर्व निदेशक रामगोपाल बजाज कहते हैं, ''बहुत कुछ हुआ है और बहुत कुछ होना बाक़ी है. ऐसा नाट्यग्राम होना चाहिए जिसमें महीने भर का उत्सव हो, एनएसडी से अलग एक ऐसा निदेशालय बने जो देश भर में महोत्सवों का आयोजन करे. इसके लिए नई सरकार को पहल करनी चाहिए.''

क्या 'भारंगम' में भारतीय रंगमंच की प्रतिध्वनि मिलती है? इस सवाल पर बेंगलुरु में रंगकर्म कर रहे अभिषेक मजूमदार कहते हैं कि दुनिया में इतने तरह का थियेटर भारत के अलावा कहीं नहीं है. इसलिए कोई एक फ़ेस्टिवल कभी भी सब कुछ शामिल नहीं कर सकता, लेकिन कोशिश होनी चाहिए कि हर राज्य की उपस्थिति हो.

वहीं एनएसडी के स्नातक और युवा नाटककार पुंज प्रकाश भारंगम में पारदर्शिता का अभाव देखते हैं.

वो कहते हैं, ''नाटकों के चयन में पद, प्रभाव, पहुंच और व्यक्तिगत पसंद-नापसंद का घालमेल होता है. एक ही निर्देशक के नाटकों को बार-बार शामिल करने की जगह देशभर के नए निर्देशकों को मौक़ा देना चाहिए. पुराने को सहेजें लेकिन नई पौध को भी मौक़ा दें.''

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Image caption मानव कौल

भारंगम में प्रस्तुति के बारे में अभिनेता और निर्देशक मानव कौल कहते हैं, ''भारंगम में प्रस्तुति करना उतना अलग नहीं है लेकिन बतौर दर्शक यह आपके अनुभव को समृद्ध करता है, क्योंकि एक ही जगह पर कई प्रकार का रंगमंच देखने को मिलता है. लेकिन ऐसे सरकारी उत्सव छोटे शहरों में होने चाहिए.''

दुनियाभर में किस तरह का थियेटर होता है, उसके बारे में लोगों को बताना बहुत ज़रूरी है.

ऐसे थियेटर दिल्ली-मुंबई में तो होते रहते हैं, इसलिए हर साल अलग-अलग शहरों में भारंगम होना चाहिए. इसके लिए आपके पास पैसा भी है और संसाधन भी.

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टेलीविज़न और तकनीक़ के बढ़ते प्रभाव, मानवीय अभिव्यक्ति और जीवंतता की निरंतर होती कमी से चिंतित प्रसिद्ध निर्देशक प्रसन्ना कहते हैं, ''ड्रामा स्कूल अपने विद्यार्थियों को यह विश्वास दिलाता है कि यदि आपके पास कमानी जैसा आडिटोरियम नहीं हो तो आप अपने गांव में थियेटर नहीं कर सकते, भारंगम ऐसे रंगमंच का उत्सव बन गया है, इसका आत्म खो गया है.''

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