ये '#@#%' सिर्फ मार-पीट और ड्रग्स में शामिल हैं

मंगलवार को बेंगलुरु में एक अफ़्रीकी महिला के साथ कथित तौर पर मार पीट और बदसलूकी के मामले की जांच पुलिस कर रही है.

पुलिस अधिकारी इस बात का भी पता लगा रहे हैं कि क्या तंज़ानिया की 21 वर्षीय इस छात्रा के साथ होने वाली घटना नस्ली भेदभाव का मामला तो नहीं?

जांच का नतीजा कुछ भी निकल कर आए इस सच को हम नकार नहीं सकते कि यूरोप और अमरीका में भेदभाव का शिकार होने वाले भारतीय ख़ुद अपने देश में अफ्रीक़ियों के साथ खुल कर भेदभाव करते हैं.

दिल्ली और मुंबई में मेरे कई अफ़्रीकी दोस्त हैं. वो भारत से बहुत प्यार करते हैं लेकिन भारत उन से प्यार नहीं करता, उन्हें गले नहीं लगाता. क्यों?

क्योंकि वो काले हैं? और उनके प्रति भारत में एक सोच बनी हुई है कि वो हिंसात्मक, आक्रमक रुख़ रखने वाले लोग हैं जो भारत में केवल 'ड्रग्ज़' की तस्करी में लगे हैं. और हाँ ये भी सोच आम है कि उनकी महिलाएं यहां वैश्यावृत्ति में जुटी हैं.

इसीलिए जब हम अफ्रीकियों के साथ भेदभाव करते हैं तो अक्सर हमें इसका एहसास ही नहीं होता. मुंबई में एक मासूम सी, सीधी साधी लड़की ने अफ्रीकियों की तरफ इशारा करते हुए एक बार मुझ से कहा कि 'ये कालिया सिर्फ मार-पीट और ड्रग्ज़ में शामिल रहते हैं'.

कालिया, नीग्रो, कल्लू और हब्शी कुछ ऐसे शब्द हैं जो भारतीय अफ्रीकियों के लिए इस्तेमाल करते हैं ठीक उसी तरह से जैसे गोरी नस्ल के लोगों में भेदभाव करने वाले लोग उन्हें 'मंकी' यानी बन्दर कहके बुलाते हैं

साम्बो डेविस नाइजीरिया के हैं और मेरे मित्र भी हैं. वो कहते हैं कि अफ्रीका से आए लोगों को अब पता चल गया है कि उन्हें कालिया या कल्लू कहा जाता है.

लेकिन साम्बो डेविस इन शब्दों का उतना बुरा नहीं मानते जितना भेदभाव और उनके ख़िलाफ़ पुलिस के बर्ताव का. उदाहरण के लिए उन्हें भारतीय अक्सर किराए पर घर नहीं देते. पुलिस उन्हें आए दिन तंग करती है. साम्बो डेविस तो बग़ैर कोई जुर्म किए हवालात की हवा खा चुके हैं. बाद में पुलिस ने उनसे 'सॉरी' कहा और रिहा कर दिया.

सोमालिया से आकर भारत में आबाद होने वाले अफ्रीकियों की संख्या भी अच्छी ख़ासी है. सोमालिया के एक मुस्लिम नागरिक ने एक बार मुझसे कहा कि दिल्ली के मुसलमान भी उनसे भेद भाव करते हैं 'जो इस्लाम के सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है.' वो कहते हैं मस्जिदों में उतना ज़ाहिर नहीं होता लेकिन मोहल्लों में साफ़ महसूस होता है कि उनके साथ क्यों भेदभाव किया जाता है.

मुंबई की साफ़ त्वचा वाली शीबा रानी ने नाइजेरिया के 'कालिये' साम्बो डेविस से शादी तो कर ली लेकिन रोज़ ताने सुनती रहीं. वो कहती हैं, "जब भी मैं मॉल और दुकान जाती हूँ तो वहां मौजूद लोग कहते हैं अरे देखो इसने नीग्रो से शादी की है. इसका चरित्र कैसा होगा! शायद ये वैश्या भी हो सकती है."

शीबा का वो समाज जो गोरी चमड़ी की दीवाना है, उसकी शादी में दरार डाल दी है. मैंने हाल में सुना कि अब दोनों अलग रहते हैं. डेविस भारत के समाज को इसका ज़िम्मेदार मानते है. उनके दो बच्चे भी हैं. क्या भारतीय समाज उन्हें अपनाएगा?

नाइजीरिया का मेरा एक दोस्त भारत प्रेमी था. वो उन अफ़्रीकी लोगों की मदद किया करता था जिन्हें पुलिस या समाज तंग करता था. उन्हें एक गोरी भारतीय लड़की से बहुत प्रेम हो गया. लड़की ने जब अपने परिवार वालों से उसे मिलाया तो मामला वहीं ख़त्म हो गया. मेरे दोस्त ने कहा था कि भारतीय लड़कियां 'डेट' करती हैं लेकिन शादी नहीं करना चाहतीं.

मेरा वो दोस्त अब इस दुनिया में नहीं रहा. हाल में दिल्ली में उसकी मौत हो गयी. उसकी शादी के अरमान अधूरे रह गए और वो भारत में भेदभाव पर किताब भी पूरी न कर सका.

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