देश के विकास के लिए अपना घर छोड़ेंगे?

खनन कार्य

दस साल पहले यानी 2006 में मशहूर गायिका लता मंगेशकर ने कहा था कि यदि मुंबई के पैडर रोड पर उनके मकान के सामने फ़्लाईओवर बनाया तो वह देश छोड़ देंगी.

उन्होंने पहले कहा कि 'इससे उनकी आवाज़ पर बुरा असर पड़ेगा,' बाद में कहा कि 'वहां होने वाली खुदाई से दूसरे कई मकानों की नींवें हिल जाएंगी'. आख़िर फ़्लाईओवर नहीं बना.

इस हफ़्ते मुझे कोयला खनन से जुड़ी कुछ बातों का पता चला, जिन्हें मैं आपसे साझा करना चाहता हूँ. विकास की बड़ी परियोजना के मुद्दे पर हम कितने ठीक हैं, इससे जुड़ी दो-एक बातें आपको पता चलेंगी.

मेरी सहकर्मी अरुणा चंद्रशेखर एक रिपोर्ट पर काम कर रही हैं. हम खनन से जुड़े उन क़ानूनों पर नज़र डालते हैं जो नागरिकों की निजी जायदाद की हिफ़ाज़त करते हैं.

साल 2014 में भूमि अधिग्रहण करने पर मुआवज़ा और पुनर्वास से जुड़ा क़ानून बना.

इसमें कहा गया है कि "सरकार और निजी साझेदारी में बनने वाली परियोजनाओं के लिए ज़मीन लेने पर कम से कम 70 फ़ीसदी लोगों की मंजूरी ज़रूरी है. निजी परियोजनाओं के लिए कम से कम 80 प्रतिशत लोगों की रज़ामंदी होनी चाहिए."

मुझे लगता है कि यह ठीक है.

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क़ानून में यह भी कहा गया है कि "अनुसूचित क्षेत्रों में ज़मीन लेने के लिए ग्राम सभा की अग्रिम मंज़ूरी ज़रूरी" है. इसके अलावा 'समाज पर असर का मूल्यांकन' भी होना चाहिए.

इसका मतलब यह है कि परियोजना के पहले कोई निष्पक्ष एजेंसी यह अध्ययन करे कि परियोजना की वजह से उस इलाक़े के लोगों की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और जीवनयापन के उपायों पर क्या और कितना असर होगा. इसमें प्रभावित होने वाले समुदायों से मिलकर अध्ययन किया जाए.

यदि आपको लगता हो कि यह ठीक है तो आपको पता होना चाहिए कि कोयला खनन के लिए ली जाने वाली ज़मीन पर यह नियम लागू नहीं होता.

ख़ासकर, ज़मीन के मालिकों से कोई बातचीत नहीं की जाती. ज़मीन लेने से पहले उनकी रज़ामंदी लेना ज़रूरी नहीं है. परियोजना के प्रभाव के मूल्यांकन की तो कोई बात ही नहीं है.

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लता मंगेशकर की आपत्ति के बाद यह जानना दिलचस्प होगा कि प्रभाव का एक छोटा स्वरूप क्या होगा.

खनन के इलाक़ों में स्कूल दोपहर बाद तीन बजे से चार बजे तक बंद रहते हैं क्योंकि वहां होने वाले विस्फोटों से स्कूल के मकान हिलने लगते हैं.

अब हम अनुसूचित और दूसरे पारंपरिक वनवासी (वन अधिकार मान्यता) एक्ट पर नज़र डालें.

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इस क़ानून में "अनुसूचित जनजाति और जंगल के दूसरे वासियों के ज़मीन के अधिकार" को माना गया है.

इसके तहत "जंगल में रहने वाले लोग जिस ज़मीन पर निर्भर हैं और जिस ज़मीन को उन्होंने खेती लायक बनाया है, उस पर वे निजी हक़ का दावा कर सकते हैं."

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इसके अलावा "कोई समुदाय भी गांव के जंगल, धार्मिक और सांस्कृतिक जगहों और पानी के स्रोतों पर भी दावा कर सकता है".

इस नियम में यह भी कहा गया है कि "गांव की पंचायत और दूसरे निकायों को यह निर्णय करने का हक़ है कि जंगल की चीज़ों पर किसका अधिकार हो".

आदिवासी मामलों के मंत्रालय का मानना है कि "सरकार इस क़ानून के ज़्यादातर प्रावधानों को नज़रअंदाज़ करती है."

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Image caption बहुराष्ट्रीय कंपनी पॉस्को का विरोध

इसके अलावा पर्यावरण (संरक्षा) क़ानून भी है.

इसके तहत व्यवस्था है कि एक ख़ास आकार की परियोजना पारित करने के लिए इससे प्रभावित होने वाले समुदायों से सार्वजनिक तौर पर राय लेने के बाद ही परियोजना को हरी झंडी दिखाई जाए.

अरुणा चंद्रशेखर कहती हैं, "सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन कभी भी नहीं किया जाता." इसकी एक वजह यह है कि सरकार के लिए यह पता लगाना ज़रूरी नहीं है कि यह मूल्यांकन कितना सही है.

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सरकार जिस एक क़ानून का पालन करती है और जिसके आधार पर ज़मीन लेती है, वह है 'कोल बियरिंग एरियाज़ एक्ट'.

इसके तहत सरकार अपने गज़ट में एक आदेश छापती है. आपने पिछली बार कब सरकारी गज़ट पढ़ा था?

ख़ैर, अगर 30 दिनों में इसके ख़िलाफ़ लिखित आपत्ति दर्ज न की गई तो प्रक्रिया शुरू कर दी जाती है. इसके तहत "ज़मीन पूरी तरह से केंद्र सरकार के अधीन" होती है.

देश के कुल खनन के दोतिहाई हिस्से पर कोल इंडिया लिमिटेड का नियंत्रण है.

एक संसदीय समिति ने ये नीतियां देखते हुए कहा है, "आदिवासी समुदायों की पहुँच आधिकारिक गज़ट तक नहीं होती है कि वे समझ सकें कि उनकी ज़मीन का अधिग्रहण जनहित में किया जा रहा है."

छह फ़रवरी को छपी ख़बरों में कहा गया कि अडानी समूह दो अरब डॉलर की लागत से कोयला पर आधारित बिजलीघर झारखंड में लगाएगा.

मेरा मानना है कि यह जान बूझकर किया जाता है. इस देश का औद्योगिक विकास आदिवासियों की ज़मीन हड़पकर ही किया जाता है.

मेरा मानना है कि इसमें मध्यम वर्ग की भी मिलीभगत है. हम में से कौन अपना फ़्लैट विकास के लिए छोड़ देगा?

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हमारा कुलीन वर्ग बहुत अधिक ज़रूरत वाले फ़्लाईओवर का निर्माण भी रुकवा सकता है.

हम इस पर ज़ोर देते हैं कि कमज़ोर लोग अपनी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ हमारे लिए त्याग करें. इसके बाद राज्य के ख़िलाफ़ हिंसा हो तो हमारी समझ में वह न आए.

ज़मीन हड़पने की इस नंगी कोशिश जानने से 'माओवादी' शब्द का एक बिल्कुल दूसरा अर्थ समझ में आता है. और इसी तरह 'विकास' शब्द का दूसरा अर्थ भी पता लगता है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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