सबरीमला: जिन बातों की मीडिया में चर्चा ही नहीं

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Image caption सबरीमला मंदिर, केरल

केरल के सबरीमला मंदिर में दस से 50 साल की उम्र की महिलाओं और लड़कियों के प्रवेश पर लगी रोक को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर आठ फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हो रही है.

यंग लॉयर्स एसोसिएशन ने साल 2006 में यह याचिका दायर की थी. इस याचिका पर तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ सुनवाई करेगी.

इसी साल 11 जनवरी को अदालत ने मंदिर की व्यवस्था देखने वाले ट्रावनकोर देवास्वम बोर्ड से कहा था कि वह बताए कि आख़िर किस आधार पर इन महिलाओं और लड़कियों को मंदिर में दाखिल होने की इजाज़त नहीं है.

पढ़ें दूसरा पक्ष- सबरीमला में महिलाएँ: 'औरत की देह पर पाबंदियों का अंत नहीं'

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों पर मुख्यधारा की मीडिया में काफ़ी कुछ लिखा गया है, पर विश्लेषणों में संतुलन की कमी रही है.

उम्मीद तो यह की जाती थी कि प्रतिष्ठित मीडिया हाउस अपने पाठकों और दर्शकों को यह बताएं कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां क़ानून पर चल रहे विचार-विमर्श का हिस्सा हैं. यह अंतिम फ़ैसला या इस बारे में कोई संकेत क़तई नहीं है.

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मीडिया ने लोगों को यह नहीं बताया कि यह मामला सिर्फ़ महिलाओं के अधिकार का ही नहीं है.

संविधान की धारा 26 में सभी धार्मिक प्रतिष्ठानों को भी कुछ मौलिक अधिकार दिए गए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने 1957 से अब तक अपने कई महत्वपूर्ण फ़ैसलों में इसकी पुष्टि भी की है.

दूसरे शब्दों में, सुप्रीम कोर्ट के सामने मुद्दा यह है कि महिलाओं और धार्मिक प्रतिष्ठानों के मौलिक हक़ों के बीच संतुलन क़ायम होने की ज़रूरत है.

इसका मतलब यह है कि धारा 25 और धारा 15 में महिलाओं को दिए गए पूजा करने के मौलिक अधिकार और धारा 26 में मंदिर को दिए गए धार्मिक प्रथा मानने के अधिकार के बीच संतुलन बनाना ज़रूरी है.

मीडिया से इस मुद्दे पर शोध करने की उम्मीद की जाती है. यदि उसने शोध किया होता तो उसे पता होता कि सोमवार को जो मुद्दा सुप्रीम कोर्ट के सामने है, केरल हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच ने 1991 में ही उसका निपटारा कर दिया था.

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Image caption सबरीमला मंदिर, केरल

दस से 50 साल की उम्र की महिलाओं और बच्चियों को सबरीमला मंदिर में घुसने पर रोक लगाने के आधार और इसके इतिहास की गंभीर पड़ताल के बाद केरल हाई कोर्ट ने फ़ैसला दिया था.

हाई कोर्ट ने अपने विस्तृत और तर्कपूर्ण फ़ैसले में कहा था कि मंदिर की ओर से लगाई गई रोक असंवैधानिक नहीं है, क्योंकि यह महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले भेदभाव या महिला विरोध पर आधिरत नहीं है.

केरल हाई कोर्ट ने यह फ़ैसला इंडियन फ़ेडरेशन ऑफ़ वूमन लॉयर्स की दलीलें सुनने के बाद दिया था.

इस संगठन के विचार सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वालों के विचार जैसे ही थे.

हाई कोर्ट ने मंदिर के कामकाज को सही ठहराते हुए उसे साफ़ और कड़े निर्देश दिए कि फ़ैसले को सही अर्थों में लागू किया जाना चाहिए.

केरल हाई कोर्ट के फ़ैसले और दिशा-निर्देशों को 1991 से अब तक किसी ने चुनौती नहीं दी है. इसलिए ये दिशा निर्देश मंदिर में अब भी लागू हैं.

लोकतंत्र में क़ानून का राज चलता है और किसी भी प्रतिष्ठान की तरह मंदिर भी क़ानून के तहत हाई कोर्ट के आदेशों का पालन करने को मजबूर है.

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Image caption सबरीमला मंदिर, केरल

इसलिए, यदि कोई मंदिर से यह उम्मीद करता है कि वह हाई कोर्ट के निर्देशों का पालन न करे, तो दरअसल वह उसे क़ानून तोड़ने को कहता है.

भेदभाव करने वाले और पीछे की ओर ले जाने वाली प्रथाओं के लिए किसी भी आधुनिक, लोकतांत्रिक और उदार समाज में कोई स्थान नहीं है.

लेकिन हमें यह भी समझना चाहिए कि धर्म और अाध्यात्मिकता को आधुनिक धर्मनिरपेक्षता और उदारवादी सोच के आधार पर ही नहीं चलाया जा सकता है. आस्था तो आख़िर आस्था ही है.

भारत बहुत बड़ा देश है, जिसका इतिहास लंबा और काफ़ी समृद्ध रहा है. इसे ध्यान में रखते हुए भेदभाव और विविधता के बीच के महीन और महत्वपूर्ण अंतर को समझने की ज़रूरत है.

हिंदू धर्म उन कुछ धर्मों में से है जिसमें देवियों का सम्मान किया जाता है और उनकी पूजा की जाती है. शक्ति परंपरा इसमें अहम है.

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Image caption महिलाएं महाराष्ट्र के शनि शिगणापुर मंदिर के चबूतरे पर चढ़ पूजा नहीं कर सकतीं.

ऐसे मंदिर भी हैं, जहां महिलाओं के घुसने पर पाबंदी है. पर ऐसे मंदिर भी हैं, जहां सिर्फ महिलाएं ही पुजारी बन सकती हैं और कुछ दिन तो पुरुषों को मंदिर के आसपास फटकने तक की इजाज़त नहीं होती है.

केरल के मान्नारासला श्री नागराज मंदिर में केवल महिलाएँ ही पुजारी हो सकती हैं. इसी तरह अट्टुकल भगवती मंदिर देवी का मंदिर है और सालाना त्योहार के दिन केवल महिलाएँ ही वहाँ होने वाली गतिविधियों में भाग लेती हैं.

इसी तरह चाकुलतु मंदिर में देवी की पूजा होती है और सालाना त्योहार के दिन नारी पूजा होती है, जब पुरुष पुजारी 10 दिन तक व्रत रखने वाली महिलाओं के चरण धोते हैं.

भारत में इतनी विविधता है.

इसलिए, जो लोग वाकई सुधार चाहते हैं, उन्हें धार्मिक प्रथा को समझने की कोशिश करनी चाहिए. सिर्फ़ पुरुष सत्ता और महिला विरोध के दूसरों से लिए गए पूर्वाग्रह पर आधिरत विचारों को रटने से वास्तविक सुधार नहीं हो सकता.

(ये लेखक के निजी विचार हैं. जे साई दीपक दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं.)

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