जिसकी सफलता ने पिता का पसीना सुखा दिया

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कहते हैं कई बार सफलता आपके जीवन में बहुत धीमे से आती है और आपको, आपके माता-पिता, दोस्तों और परिजनों सबको चौंका देती है.

लेकिन बिहार के खगड़िया ज़िले के सन्हौली गाँव के वात्सल्य सिंह के माता-पिता को इसमें कोई संदेह नहीं था कि उनका बेटा एक दिन उनका जीवन प्रकाश से भर देगा.

वात्सल्य सिंह इस समय आईआईटी खड़गपुर में आख़िरी वर्ष में हैं, लेकिन माइक्रोसॉफ़्ट के लिए उनका चयन हो गया है और उन्हें क़रीब एक करोड़ 20 लाख रुपए के सालाना पैकेज पर नौकरी मिली है.

इस ख़बर ने दूर गाँव में वेल्डिंग की दुकान चलाने वाले चंद्रकांत सिंह चौहान का वर्षों पुराना सपना सच कर दिया है.

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बीबीसी के साथ विशेष बातचीत में चंद्रकांत सिंह ने कहा, "उससे ऐसी उम्मीद थी. इसलिए एक साधारण दुकान चलाते हुए उसकी इच्छाओं को पूरा करता रहा मैं. ये ख़बर सुनकर जितना पसीना बहाए थे, वो सब सूख गया है. अब इतनी शीतलता महसूस हो रही है, जिसे मैं शब्द में बयां नहीं कर सकता."

चंद्रकांत सिंह चौहान बताते हैं कि जब उनके लड़के ने यह शुभ सूचना दी, वे अपनी वेल्डिंग की दुकान में काम कर रहे थे. वे कहते हैं, "बेटे ने फ़ोन किया और कहा कि पापा नौकरी लग गई. एकबारगी तो सन्न से रह गए कि जिस शब्द को सुनने के लिए वर्षों से लालायित थे. उसके बाद आँख से आंसू गिरने लगा कि आज तो वो मुकाम हासिल हुआ."

आईआईटी खड़गपुर में अपनी सफलता से ख़ुश वात्सल्य कहते हैं कि वे सातवें या आठवें आसमान पर नहीं बल्कि ज़मीन पर हैं और आगे भी ज़मीन पर ही रहने का इरादा है.

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बीबीसी के साथ बातचीत में वात्सल्य ने बताया कि कोटा जाकर इंजीनियरिंग की तैयारी करने का सोचने के बाद भी आर्थिक स्थिति ने उन्हें परेशान किया था, लेकिन उनके पिता ने उनकी हरसंभव मदद की.

वात्सल्य बताते हैं, "मैंने अपने लिए अपने पिता की लगन और उनका परिश्रम देखा है. मुझे इससे काफ़ी प्रेरणा मिलती थी और आज मैं जो कुछ भी हूँ, उन्हीं की बदौलत हूँ."

वात्सल्य ने 10वीं तक की पढ़ाई गाँव से ही की है. लेकिन वे गाँव के स्कूल की पढ़ाई से संतुष्ट नहीं थे. इंजीनियरिंग करना उनका सपना था, जिसके लिए उन्होंने कोटा का रुख़ किया. पहली बार उनकी रैंकिंग अच्छी नहीं आई. लेकिन फिर उनकी मेहनत रंग लाई और उनकी रैंकिंग 382वीं आई और वे आईआईटी खड़गपुर पहुँच गए.

आर्थिक तंगी के बारे में उनके पिता कहते हैं, "मैं बहुत छोटा वर्कशॉप चलाता हूँ. जिसमें ग्रिल, गेट, शटर, स्टील, अलमारी वेल्डिंग का काम होता है. इससे आर्थिक स्थिति मज़बूत नहीं हो पाती है. लेकिन मुझे भरोसा था कि मेरा बेटा कुछ बड़ा करेगा. इसलिए कठिनाइयों के बावजूद हमने उसे कोटा भेजा."

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वात्सल्य का कहना है कि वे भले ही अक्तूबर में अमरीका जाकर माइक्रोसॉफ़्ट में नौकरी करेंगे, लेकिन उनका मक़सद भारत में रहकर नौकरी करना है. लेकिन वे अपने कुछ सपने भी पूरे करना चाहते हैं.

वात्सल्य कहते हैं, "मैंने फ़ुल बॉडी चेकअप शब्द पहले सुना नहीं था. पहले मुझे अपने माता-पिता का फ़ुल बॉडी चेकअप कराना है. मैं अपने माता-पिता को वर्ल्ड टूर पर ले जाना चाहता हूँ. मैं अपने परिजनों के साथ-साथ समाज के लिए भी कुछ करना चाहता हूँ."

दूसरी ओर वात्सल्य के पिता चंद्रकांत सिंह कहते हैं कि आर्थिक स्थिति बेहतर होने से ज़िंदगी में बदलाव तो आ ही जाता है.

वे कहते हैं, "मैं अपना बिजनेस नहीं छोड़ सकता. उससे मेरा बहुत अधिक लगाव है. इसी के बलबूते हम अपने बच्चों को जो भी दे पा रहे हैं, देते हैं."

वात्सल्य कहते हैं कि उन्हें पढ़ाने का भी बहुत शौक है और वो अपना समय कई बच्चों को पढ़ाने में लगाते हैं. उनकी योजना अपने आईआईटी के दोस्तों के साथ मिलकर एक स्कूल खोलने की है.

वात्सल्य अपने माता-पिता के साथ-साथ अपने शिक्षकों का भी आभार व्यक्त करना नहीं भूले.

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