बात बात पर क्यों भड़क जाते हैं बेंगलुरुवासी?

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एक सड़क दुर्घटना के बाद एक विदेशी छात्रा को एक भीड़ क़रीब-क़रीब निर्वस्त्र कर देती है. ख़ासे ट्रैफ़िक की वजह से एक एंबुलेंस एक 13 वर्षीय बच्चे को अस्पताल लेकर नहीं पहुँच पाती है. उद्योगपति सरकार को बुनियादी ढांचा सुधारने की सलाह देते हैं.

भीड़ के हिंसक व्यवहार की सबसे अजीब बात यह है कि यह सब एक ऐसे शहर में हो रहा है, जो समाज के हर वर्ग और लोगों को अपने यहां पनाह देने में सबसे आगे है.

ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या भारत की तकनीकी राजधानी और देश का दूसरा सबसे कॉस्मोपोलिटन शहर बेंगलुरु ढह रहा है?

एक अर्थशास्त्री, एक रिटायर्ड अफ़सर और एक ब्रांड विशेषज्ञ निजी बातचीत में एक शब्द - 'टिंडरबॉक्स' का इस्तेमाल करते हैं. इसका मतलब है कि एक चेंबर में कई चीजों को मिलाकर विस्फ़ोटक स्थिति बनाना.

और इन कारणों से परिवहन, घरों के बिना योजना के निर्माण, आर्थिक गैरबराबरी से लेकर क़ानून-व्यवस्था की कमी तक के मसले शामिल हैं.

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शहर में व्यापक रूप से प्रभावी प्रबंधन के अभाव में लोगों में बेचैनी और तनाव है और वे हमेशा ही बहुत जल्दी फट पड़ते हैं जिससे रोड रेज के मामले बढ़ते जा रहे हैं. इनमें तंज़ानियाई छात्रा का ताज़ा मामला भी शामिल है.

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज़ (एनआईएएस) के प्रोफ़ेसर नरेंद्र पानी कहते हैं, "आप विस्फ़ोटक स्थिति पैदा कर रहे हैं, क्योंकि आप परिवहन की मांग को समझने को तैयार नहीं हैं. रोड रेज के मामले, घरेलू-बाहरी के मुद्दे, नशे में गाड़ी चलाने के मामले आदि, सभी अराजकता को चिंगारी देते हैं क्योंकि आपके पास कार्यस्थलों से घरों की दूरी कम करने की कोई योजना नहीं है."

प्रोफ़ेसर पानी कहते हैं, "देश के सबसे तेज़ी से बढ़ते शहर में सार्वजनिक क्षेत्र के निगमों के ज़माने में बेहतर विकास दर थी. आपूर्ति बढ़ाने पर ध्यान ज़्यादा रहा. शहर के विस्तार के बाद अब आधारभूत ढांचा तैयार किया जा रहा है. लेकिन जब तक आपूर्ति मांग को पूरा करती, मांग सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर चुकी होती है."

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पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव के जयराज कहते हैं, "अगले पांच साल में हमें सूखे का सामना करना पड़ेगा क्योंकि 1980 से हम 120 किलोमीटर दूर से पानी ला रहे हैं. शहर के आश्चर्यजनक विस्तार की वजह से अब पानी है ही नहीं. अब हमें राज्य की राजधानी को ही स्थानांतरित करने की ज़रूरत पड़ सकती है."

समाज विज्ञानी शोखा रघुराम कहती हैं, "शहर की जनसंख्या का स्वरूप बदल रहा है. सम्पन्नता की असमानताएं भी बढ़ रही हैं. झुग्गियों के बच्चों को भी अच्छी क्वालिटी के स्कूलों में जाना चाहिए. अगर आप एकदम ज़मीनी स्तर से समानता नहीं लाते हैं तो आप किसी भी शहर के सभी लोगों को एक साथ लाने की उम्मीद नहीं कर सकते. कुछ लोगों की उपलब्धियों और बहुत से लोगों के नुक़सान की बात करना बेमानी है."

अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में समाजशास्त्री प्रोफ़ेसर चंदन गौड़ा कहते हैं, "हर शहर में छेड़खानी या चोरी या सड़क दुर्घटना की वजह से भीड़ के हिंसक होने के मामले होते हैं. अफ़्रीकियों के मामले में इसे रंगभेद के रूप में देखा जाता है. इस भेदभाव को इससे भी बल मिला है कि हमलावरों को यकीन है कि कानून ख़ास तरह के अपराधों, जैसे रोड रेज को सह लेता है."

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तंज़ानियाई छात्रा पर हुए हमले और क़रीब चार साल पहले उत्तर-पूर्व के लोगों के यहां से भागने जैसे मामलों को लेकर ब्रांड कंसल्टेंट हरीश बिजूर कहते हैं, "मैं खुद से ही कहता हूँ, यह बेंगलुरुआई हरकत क़तई नहीं है."

बिजूर कहते हैं, "इस तरह की घटनाएं लोगों को रुककर यह सोचने और यह अहम सवाल पूछने पर मजबूर करेंगी कि क्या सब कुछ ठीक है भी? निवेशक हमेशा से ही स्थिर माहौल चाहते हैं. एक बड़े शहर में हर कोई हर किसी को खुलकर गले लगाता है. लोग यह सवाल पूछने वाले हैं कि क्या यह बड़ा शहर है भी और क्या इसका नज़रिया ठीक भी है- सांस्कृतिक और समाजिक रूप से? मुझे लगता है कि इन सवालों के जवाब मिलने ही चाहिए."

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लेकिन प्रोफ़ेसर पानी कहते हैं, "कोई भी व्यक्ति सही सवाल पूछने को तैयार नहीं दिखता. यहां तक कि समस्याओं को देखने की कोशिश भी नहीं की जाती. आपके पास एक मेट्रो ट्रेन है जो शहर के बाहरी इलाक़ों को छूती भी नहीं है. जबकि सारा ट्रैफ़िक वहीं है. दरअसल, शहर के केंद्र में आबादी घट रही है."

जयराज कहते हैं, "इसकी वजह से लोग सड़कों पर भिड़ रहे हैं. लोग क्षुब्ध हैं. ट्रैफ़िक के भयानक दबाव और जाम की वजह से वह हमेशा बेचैन और ग़ुस्से में रहते हैं. और काम के दबाव की वजह से लोग सभ्य नागरिकों की तरह बर्ताव नहीं कर पाते. लेकिन एक व्यक्ति के रूप में बेंगलुरुवासी रंगभेदी नहीं हैं."

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