क्या हिंदुत्व को चुनौती मिल रही है?

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रोहित वेमुला की आत्महत्या या कहें कि सांस्थानिक हत्या क्या भारत के उच्चशिक्षा कैंपसों में घट रही कुछ असाधारण चीज़ों का परिणाम है.

रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद बीजेपी महासचिव पी मुरलीधर राव ने विश्वविद्यालय कैंपस में बीफ़ फ़ेस्टिवल से लेकर महिषासुर शहादत दिवस मनाए जाने के उदाहरण के साथ कहा कि कुछ संगठन इन कैपसों में भारत को तोड़ने और समाज को बांटने की गतिविधियों में लगे हैं.

ऐसा क्या घट रहा है कि सत्तारूढ़ हिंदुत्ववादी पार्टी को बेचैनी हो रही है? सत्ता को प्रभावित करने वाला हिदुत्ववादी संगठन (आरएसएस) अपने मुखपत्रों से लगातार अपनी चिंताएं ज़ाहिर कर रहा है.

हिंदुत्व का उत्साह और प्रतिक्रान्ति
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इसे थोड़ा तफ़सील से समझने के लिए वर्तमान ‘नरेंद्र मोदी’ सरकार के गठन के बाद हिंदुत्व के उत्साह में आए उछाल के ग्राफ को समझना होगा. नवंबर 2014 के अंतिम सप्ताह में दिल्ली में हुई विश्व हिंदू कांग्रेस में दुनिया भर से आए हिंदू विचारक नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘पूर्ण हिन्दू राज’ का सपना साकार होते देख रहे थे.

वहां अंग्रेज़ी में बांटे जा रहे पर्चों में पांच मायासुरों से सावधान रहने का आह्वान किया जा रहा था- मैकाले, मार्क्सवाद, मिशनरी, मैटीरियलिज़्म (भौतिकवाद), और मुस्लिम चरमपंथ.

यह हिंदू उत्साह बाद के दिनों में ‘लव जिहाद’ के ख़िलाफ़ मुहिम से लेकर दादरी में बीफ़ खाने की आशंका में मंदिर से ऐलान कर एक व्यक्ति की हत्या तक में दिखा.

यह विभिन्न केंदीय मंत्रियों के बयानों में और शिक्षा के भगवाकरण के प्रयासों में भी दिखता है. हिंदुत्व की अलग–अलग जमातें आज़ादी के बाद इतनी सक्रिय कभी नहीं थीं. सबसे ज़्यादा दूरगामी असर वाला प्रयास हिंदुत्व के धुर विरोधी डॉ. आंबेडकर को ‘आत्मसात’ (पचा) कर लेने का हो रहा है.

सैद्धांतिक शब्दावली में इसे प्रतिक्रांति (काउंटर रेवॉल्यूशन) का दौर कहा जा सकता है. क्रांति के प्रभावों को ख़त्म कर पुरानी व्यवस्था कायम करने का दौर.

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आज संविधान आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था के कारण समाज में तेज़ी से बदलाव आ रहा है. वंचित समूहों की सत्ता, संस्कृति और आर्थिक केंद्रों में भागीदारी बढ़ रही है. जबकि अब तक पीछे जा रही ‘वर्चस्ववादी’ धारा सत्ता के प्रत्यक्ष–परोक्ष समर्थन से उनके ख़िलाफ़ पूरे जोश के साथ सक्रिय है.

पहले भी आए हैं ऐसे दौर

ऐसा नहीं है कि ‘प्रतिक्रांति’ का यह प्रत्यक्ष दौर इतिहास में पहली बार घटित हो रहा है. इसके पहले भी यह दौर पुष्यमित्र शुंग के शासन काल में पहली सदी के आसपास आया. तभी वर्ण–जाति और लिंग आधारित भेदभाव को क़ानूनन और धार्मिक वैधता देने के उद्देश्य से मनुस्मृति जैसी क़ानून संहिताएं लिखी गईं.

बहुत से इतिहासकारों के मतों के अनुसार यह दौर धार्मिक खून–खराबे का भी था, जब बौद्ध अनुयायियों को राज्याश्रय प्राप्त क़त्लेआम का शिकार होना पडा.

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नवीं सदी में भी यह देश एक ऐसे ही दौर का गवाह बना, जब आदि शंकराचार्य के नेतृत्व में हिंदुत्व की स्थापना हुई. उस दौर में आगे जाकर बुद्ध को विष्णु का अवतार बनाया गया. 12वीं सदी में गीतगोविंद जैसी रचनाओं ने इस अवतारवाद को लोकप्रिय बनाया.

सवाल है कि क्या एकतरफ़ा प्रतिक्रांति की प्रक्रिया संपन्न हो रही है और वर्णाश्रम आधारित उग्र हिंदुत्व सफलतापूर्वक वापसी कर रहा है?

प्रतिक्रांति को चुनौती

उत्तर है नहीं. इस उत्तर की पुष्टि विश्वविद्यालय कैंपसों में हो रही घटनाओं से होती है. विश्वविद्यालयों के रास्ते ज्ञान की सत्ता पर पूरी तरह वर्चस्व के बिना यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकती. जबकि वंचित समूहों से आए समतावादी विद्यार्थी समूह इस प्रक्रिया का न सिर्फ़ सक्रिय विरोध कर रहे हैं, वरन अपनी परंपरा को प्रतिष्ठित करने की मुहिम में भी लगे हैं.

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देशभर के उच्च शिक्षा संस्थानों में दलित–पिछड़े समूहों से आए विद्यार्थियों की भागीदारी बढ़ी है. इन समूहों के विद्यार्थी ज्ञान के उत्पादन, वितरण के पारंपरिक ढांचे को चुनौती दे रहे हैं. अपने अतीत को फिर रच रहे हैं. इस क्रम में खानपान की लोकतांत्रिकता के पक्ष में ‘बीफ़ और पोर्क’ फ़ेस्टिवल आयोजित हो रहे हैं.

जेएनयू से 2009 में शुरू हुए ‘महिषासुर शहादत दिवस’ का आयोजन देशव्यापी बनाया जा रहा है . हैदराबाद के इंग्लिश एंड फ़ॉरेन लैंग्वेज यूनिवर्सिटी में ‘असुर सप्ताह’ के आयोजन हुए, तो हैदरबाद की ही ओस्मानिया यूनिवर्सिटी में ‘नरकासुर’ की जयंती मनी.

इतिहास के दुहराव की कोशिशें

आलोचक प्रोफ़ेसर चौथीराम यादव कहते हैं ''पुनरुत्थानवादी शक्तियां पहले भी साम-दाम, ख़ून–खराबे का हथियार इस्तेमाल करती रही हैं. शुंगकाल में बौद्धों का क़त्लेआम, नवीं सदी के बाद दक्षिण में विरोधी मताबलंबियों का क़त्लेआम, बनारस में पलटूदास की हत्या, महाराष्ट्र संत तुकाराम की हत्या या फिर राजस्थान में मीराबाई की हत्या पुनरुत्थानवादी ताक़तों के ख़ूनी प्रयासों के ऐतिहासिक उदाहरण हैं.''

चौथीराम के अनुसार ये शक्तियां तीन स्तरों पर काम करती हैं- विरोध. दुष्प्रचार और आत्मसात करने के स्तर पर.

नए जोश से भरी हिंदुत्ववादी शक्तियां अभी इन तीनों स्तरों का एकसाथ इस्तेमाल कर रही हैं. शिक्षण संस्थानों में सक्रिय समतावादी विचारधारा का विरोध और दुष्प्रचार और डॉ. आम्बेडकर जैसे चिंतकों को आत्मसात करने का त्रिस्तरीय कार्यक्रम संचालित कर रही हैं.

आम्बेडकर को आत्मसात करने के लिए 1956 में उनके हिंदू धर्म से बाहर होने और अपने अनुयायियों को 22 प्रतिज्ञाओं से बांधने के उनके आयोजन को अपने में मिला लेना आसान होगा क्या?

हिंदुत्व के जोश को विश्वविद्यालय कैपसों से फुले-आम्बेडकर-पेरियार में विश्वास रखने वाले विद्यार्थी–शिक्षक समूहों से चुनौती मिल रही है.

हिंदुत्व की विचारधारा ‘मायासुर’ जैसे अपनी शब्दवाली और धारणा से बाहर आने को तैयार नहीं और वंचित समूह ‘असुर’ परंपरा में अपने को ढूंढकर इतिहास की पुनर्व्याख्या में लगे हैं.

इस बार प्रतिक्रांति की प्रक्रिया को मिलने वाली चुनौती महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक है.

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