उल्का-पिंड से हुई बस ड्राइवर की मौत?

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कुछ दिन पहले तमिलनाडु के वेल्लौर शहर के एक इंजिनियरिंग कॉलेज के परिसर में आकाश से कोई चीज धमाके के साथ गिरी.

इस धमाके ने ज़मीन में गड्ढा कर दिया. बगल की इमारतों के खिड़की के शीशों में दरारें पड़ गईं. पार्किंग में खड़े बसों के शीशे टूट गए और कथित तौर पर इस जगह के क़रीब खड़े एक बस ड्राइवर की मौत हो गई.

इस घटना का कोई चश्मदीद गवाह मौजूद नहीं था लेकिन धमाका सुनने के बाद कॉलेज के प्रिंसिपल वहां पहुँचे लोगों में पहले थे.

प्रिंसिपल जी बास्कर ने 'द हिंदू' अख़बार को बताया था, "मैं उस वक्त दफ़्तर में था. हमने एक मिनट तक कॉलेज की इमारत को थरथराते महसूस किया. सभी छात्र और फैकल्टी मेंबर बाहर आ गए और हमने धूल का एक गुबार देखा. यह धमाका इतना बड़ा था कि पानी का टैंक फट गया और पानी पीने गया बस ड्राइवर मारा गया."

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने कहा कि ड्राइवर आकाश से गिरे उल्का पिंड की वजह से मारा गया है लेकिन वैज्ञानिक इस दावे को लेकर संशय में थे.

जांच कर रहे एक दल ने कहा भी कि यह पत्थर शायद ही उल्का पिंड हो. इस पत्थर को लेकर विरोधाभासी रिपोर्टें आ रही हैं.

कुछ लोगों का कहना है कि पुलिस ने '10 किलो का एक छोटा सा ऊबड़खाबड़ सा और सीसे की तरह दिखने वाला काला पत्थर बरामद किया है.

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Image caption भारत के तमिलनाडु राज्य के वेल्लौर शहर में गिरा उल्का-पिंड.

जबकि कुछ लोग 'हाथ में आ सकने वाले एक छोटे से नीले रंग के नुकीले कठोर पत्थर' के होने की बात कर रहे हैं.

वैज्ञानिकों ने गड्ढ़े की जांच की, मिट्टी खोदी और पत्थर को जांच के लिए ले गए.

नासा के स्पेस साइंस डिवीज़न के उल्का पिंड और क्षुद्रग्रह विशेषज्ञ डेरेक सीअर्स ने वेल्लौर में गिरे इस पत्थर की तस्वीर देखी है.

उनका कहना है, "यह तस्वीर कुछ भी कह सकने के लिए पर्याप्त नहीं है पर मुझे लगता है कि अगर कोई पत्थर से मारा गया है, तो वह बड़े आकार का होगा?"

उनका यह भी कहना है कि अगर तस्वीर में दिखने वाला गड्ढा उल्का पिंड की वजह से बना, तो हो सकता है इसके टुकड़ों के सीधे सिर पर लगने से मौत हो जाए. लेकिन ऐसा कोई टुकड़ा वहां नहीं मिला.

डॉक्टर सीअर्स सबसे महत्वपूर्ण बात कहते हैं कि वैज्ञानिकों को पहले यह पता करने की ज़रूरत है कि यह पत्थर वाकई एक उल्का पिंड है.

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कभी-कभी यह इतना आसान होता है कि सिर्फ 'पत्थर को देखकर' पता किया जा सकता है.

अधिकतर उल्का पिंडों की बनावट अलग किस्म की होती है और वातावरण की गर्मी की वजह से उस पर विशेष तरह की एक काली परत चढ़ी रहती है.

डॉक्टर सीअर्स का कहना है, "आपको इसकी बनावट को लेकर थोड़ा सजग होना होगा क्योंकि उल्का पिंड की बनावट काफ़ी अलग होती है और कुछ पर पारदर्शी परत होती है."

विशेषज्ञ का कहना है कि उल्का पिंड को आमतौर पर परखने का सबसे उम्दा तरीका उसे "चक्की पर रखकर और रगड़कर उसकी चमक देखना है."

इसलिए भारत के वैज्ञानिकों को शायद पत्थर की पतली परत परखने की ज़रूरत होगी, इतनी पतली कि जिसके "आरपार आप देख सकते हों."

तब वे इसके अंदर मौजूद खनिज और उसकी बनावट तय कर पाएंगे. यह सिर्फ़ उल्का पिंड होने की ही पुष्टि नहीं करेगा बल्कि उसके किस्म का भी निर्धारण करेगा.

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वैज्ञानिकों का कहना है कि उल्का-पिंड का गिरना आम बात है पर ज़्यादातर यह समुद्र या बिना प्रदूषण वाले क्षेत्र में गिरता है.

डॉक्टर सीअर्स का कहना है, "शहर या क़स्बे में इसका गिरना एक असाधारण घटना है."

डॉक्टर सीअर्स वाकिफ़ हैं कि "1000 साल से भी पहले चीन में उल्का पिंड गिरने से पांच-छह लोग मारे गए थे."

हालांकि यह रिकॉर्ड विश्वसनीय नहीं है. एक अपुष्ट दावे के मुताबिक़ भारत में भी करीब 200 साल पहले एक आदमी की मौत हुई थी.

क्लीवलैंड्स केस वेस्टर्न रिज़र्व यूनिवर्सिटी के प्लैनेटरी साइंस के प्रोफ़ेसर राल्फ़ हार्वे के मुताबिक़ इतिहास में 'उल्का पिंड से होने वाली मौत' हमेशा अप्रामाणिक रही हैं.

नासा ने बाद में इस पत्थर के उल्कापिंड होने से इनकार किया है.

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तो पिछले हफ़्ते तमिलनाडु में आसमान से गिरने वाली चीज क्या हो सकती है?

डॉक्टर सीअर्स जैसे वैज्ञानिकों का मानना है कि संभव है कि यह किसी हवाईजहाज से गिरा कोई पदार्थ होगा.

दूसरी संभावना इसके स्पेस जंक होने का है. स्पेस जंक क्रिसमस से ठीक पहले वातावरण में प्रवेश करता है पर इसके ज़मीन पर गिरने की संभावना संदेह के घेरे में हैं.

लेकिन शनिवार को भारत में हुई घटना के बारे में 'द हिंदू' की रिपोर्ट से कुछ संकेत मिलते हैं.

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि यह इस इलाके में "10 दिनों में दूसरी घटना थी." 26 जनवरी को गांव वालों ने दावा किया था कि "उन्होंने आसमान से एक जलती हुई चीज़ खेत में गिरती देखी थी. इसने मैदान में तीन फ़ीट का गड्ढा कर दिया था."

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